जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गुरुवार को केंद्र सरकार के उस निर्देश की कड़ी आलोचना की, जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह श्लोक बजाने को अनिवार्य किया गया है। उन्होंने इसे धर्म की स्वतंत्रता पर खुला हमला बताया। उन्होंने कहा कि यह अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। यह तब हुआ जब केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने राष्ट्रगान वंदे मातरम के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें कहा गया है कि जब किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान और वंदे मातरम दोनों बजाए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम के आधिकारिक संस्करण के सभी छह श्लोक प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
X पर एक पोस्ट में मदानी ने लिखा कि केंद्र सरकार का एकतरफा और दबावपूर्ण निर्णय, जिसमें 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान घोषित किया गया है और इसके सभी श्लोकों को सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और समारोहों में अनिवार्य किया गया है, न केवल भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर एक स्पष्ट हमला है, बल्कि अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कम करने का एक सुनियोजित प्रयास भी है। मुसलमान किसी को भी 'वंदे मातरम' गाने या बजाने से नहीं रोकते; हालांकि, गीत के कुछ श्लोक ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो मातृभूमि को देवता के रूप में चित्रित करते हैं, जो एकेश्वरवादी धर्मों की मूलभूत मान्यताओं के विपरीत हैं। चूंकि एक मुसलमान केवल एक अल्लाह की पूजा करता है, इसलिए उसे यह गीत गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25 और सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का स्पष्ट उल्लंघन है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान को कमजोर करता है और सच्ची देशभक्ति के बजाय राजनीति को दर्शाता है। पोस्ट में आगे लिखा था कि इस गीत को अनिवार्य बनाना और नागरिकों पर इसे थोपने का प्रयास देशभक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है; बल्कि यह चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडा और मूलभूत मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का जानबूझकर किया गया प्रयास है। अपने देश के प्रति सच्चे प्रेम का मापदंड नारों में नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान में निहित है। इसके ज्वलंत उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के ऐतिहासिक संघर्ष में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। ऐसे निर्णय देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं और संविधान की भावना को ठेस पहुंचाते हैं।
“यह याद रखना चाहिए कि मुसलमान केवल एक ईश्वर की पूजा करते हैं; वे सब कुछ सहन कर सकते हैं, लेकिन वे ईश्वर के साथ किसी को शरीक करना स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए, “वंदे मातरम” को अनिवार्य बनाना संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर स्पष्ट हमला है,” पोस्ट में लिखा था।
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बांग्लादेश में आज 13वें संसदीय चुनाव के लिए मतदान शुरू होते ही पूरे देश का राजनीतिक माहौल गर्मा गया। जहां मतदाताओं को उम्मीद है कि नई सरकार बनने से उनकी मुश्किलें दूर होंगी वहीं शेख हसीना की पार्टी की गैर-मौजूदगी के बीच हो रहे यह चुनाव अन्य दलों को सत्ता का प्रबल दावेदार बनाये हुए हैं इसलिए हर दल मतदान से पहले तक मतदाताओं को लुभाने का हर प्रयास करता रहा। यह चुनाव पिछले कई साल की राजनीतिक उथल पुथल, जन आंदोलन और सत्ता परिवर्तन के बाद कराया गया इसलिए इसे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की अहम परीक्षा माना जा रहा है। सुबह साढ़े सात बजे शुरू हुआ मतदान शाम साढ़े चार बजे तक चला और इसके तुरंत बाद मतगणना आरंभ होने की उम्मीद है। प्रारंभिक रुझान देर रात तक और स्पष्ट परिणाम अगले दिन सुबह तक सामने आ सकते हैं।
देखा जाये तो यह चुनाव कई कारणों से अलग है। पहली बार लंबे समय तक सत्ता में रही अवामी लीग इस मुकाबले में शामिल नहीं है, क्योंकि उसे चुनाव लड़ने से रोका गया है। ऐसे में मुख्य मुकाबला अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी और उसकी पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के बीच सिमट गया है। दोनों दल पहले साथ रहे हैं, लेकिन इस चुनाव में आमने सामने हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
आज मतदान के दौरान अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने अपनी बेटी के साथ ढाका के गुलशन इलाके में बने एक अस्थायी मतदान केंद्र पर वोट डाला। मतदान के बाद उन्होंने इसे राष्ट्र के लिए नया अवसर बताते हुए कहा कि आज का दिन एक नए बांग्लादेश के निर्माण का दिन हो सकता है। हम आपको याद दिला दें कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने करीब 18 महीने पहले सत्ता संभाली थी, जब व्यापक छात्र आंदोलन और जन प्रदर्शन के बाद तत्कालीन सरकार का पतन हुआ था।
बीएनपी के अध्यक्ष तारिक रहमान ने भी ढाका में अपना वोट डाला। उन्होंने कहा कि जनता लंबे समय से स्वतंत्र और भरोसेमंद चुनाव का इंतजार कर रही थी। सत्ता में आने पर कानून व्यवस्था सुधारने, रोजगार बढ़ाने और संस्थाओं को मजबूत करने का वादा उन्होंने दोहराया। हम आपको बता दें कि कई साल विदेश में रहने के बाद रहमान ने इस चुनाव के जरिये सक्रिय राजनीति में अपनी मजबूत वापसी की कोशिश की है।
दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने मतदान के बाद कहा कि यदि चुनाव निष्पक्ष रहे तो उनकी पार्टी परिणाम स्वीकार करेगी। उन्होंने सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों से सावधान रहने की अपील भी की और लोगों से शांति बनाए रखने को कहा। हालांकि उनकी पार्टी के कुछ उम्मीदवारों ने कुछ केंद्रों पर गड़बड़ी के आरोप लगाए, जैसे बिना एजेंट की मौजूदगी में मतपत्र पर मुहर लगाना।
हम आपको बता दें कि बांग्लादेश के चुनाव आयोग के अनुसार देश भर में करीब 12.7 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं जिनको 299 संसदीय सीटों पर मताधिकार का प्रयोग करना था। एक सीट पर मतदान टल गया है। चुनाव के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। कई मतदान केंद्रों को संवेदनशील या जोखिम वाले के रूप में चिह्नित किया गया है। पुलिस और सेना के संयुक्त बल तैनात हैं। निगरानी के लिए ड्रोन, शरीर पर लगाए जाने वाले कैमरे और सीसीटीवी का उपयोग किया जा रहा है। इसके बावजूद कुछ स्थानों से हिंसा और हमले की खबरें आई हैं। गोपालगंज और मुंशीगंज में मतदान केंद्रों के पास कच्चे बम फेंके जाने की घटनाएं सामने आईं, जिनमें कुछ लोग घायल हुए। पुलिस ने अतिरिक्त बल तैनात कर स्थिति काबू में करने की बात कही है।
मीडिया में चुनाव से पहले रिश्वत, मतपत्र की नकल बांटने और कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की खबरें भी चलीं, जिसके बाद कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। एक जगह चुनाव कवर कर रहे पत्रकार पर हमला होने की भी सूचना है। इन घटनाओं ने चुनाव की निष्पक्षता को लेकर चिंता बढ़ाई है, हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि मतदान कुल मिलाकर शांतिपूर्ण ढंग से कराया गया।
हम आपको बता दें कि इस बार मतदान के साथ 84 सूत्री सुधार पैकेज पर जनमत संग्रह भी कराया गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, कार्यपालिका पर नियंत्रण और संस्थागत सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं। इससे चुनाव का महत्व और बढ़ गया है, क्योंकि मतदाता केवल प्रतिनिधि ही नहीं चुन रहे, बल्कि शासन व्यवस्था के ढांचे पर भी राय दे रहे हैं।
उधर, चुनाव से पहले अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर हिंदू समाज के खिलाफ हमलों की कुछ घटनाओं ने भी चिंता पैदा की। दो अलग अलग जिलों में दो हिंदू पुरुषों की हत्या की खबरें आईं हैं। अंतरिम सरकार ने कुछ पीड़ित परिवारों को आर्थिक और आवास सहायता देने की घोषणा की है।
बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव बांग्लादेश को स्थिरता, जवाबदेही और आर्थिक सुधार की दिशा दे सकता है, यदि नई सरकार जन अपेक्षाओं पर खरी उतरती है। अब देश और दुनिया की नजर इस बात पर है कि मतपेटी से निकला जनादेश बांग्लादेश की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।
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