आज पाकिस्तान में टॉयलेट पेपर वायरल है। सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से यह ट्रेंड कर रहा है। दरअसल पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में टॉयलेट पेपर को लेकर के मिसालें दी गई हैं। पाकिस्तान की तुलना टॉयलेट पेपर से की गई है और वो भी पाकिस्तानी हुकूमत के एक नुमाइंदे के जरिए। आखिर क्यों और कैसे? आप खुद देखिए। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में खड़े होकर शहबाज सरकार के नुमाइंदे और मुल्ला मुनीर के तोते यानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कुछ ऐसा खुलासा किया जिसे सुनने के बाद पूरी दुनिया में पाकिस्तान की थू थू होने लगी क्योंकि ख्वाजा आसिफ ने दशकों से चलते आ रहे अमेरिका पाकिस्तान के रिश्ते पर यह दावा किया कि अमेरिका के लिए पाकिस्तान टॉयलेट पेपर की तरह है जिसका इस्तेमाल वो गंदगी साफ करने के लिए करता है और फिर इस्तेमाल होने के बाद कूड़ेदान में फेंक देता है। इससे ज्यादा बेइज्जती और शर्म की बात क्या हो सकती है जब किसी मुल्क का नुमाइंदा ही अपने देश को टॉयलेट पेपर बता रहा हो।
पाकिस्तानी कैमरे पर आकर मुनीर को कोसने लगे। पहले तो नहीं भाईजान लेकिन अब तो ख्वाजा आसिफ क्या बल्कि पूरा पाकिस्तान समझ रहा है उसके दशकों से अमेरिका उसका इस्तेमाल करता रहा और आगे भी करता रहेगा वो भी टॉयलेट पेपर की तरह और पाकिस्तान के हुक्मरान हाथ जोड़कर खड़े रहेंगे भीख का कटोरा लिए। जैसे आज की तारीख में ट्रंप पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर की तरह यूज़ कर रहा है और फेंक रहा है वैसे ही पाकिस्तान का इस्तेमाल वो हमेशा करता रहेगा। और मुनीर जैसे आज सब कुछ खड़े-खड़े देख रहा। खुद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ बोल रहे हैं वो भी नेशनल असेंबली में। जिस तरह भारत में लोकसभा होती है। वहां पे नेशनल असेंबली है। ख्वाजा यहीं नहीं रुके। उन्होंने पाकिस्तान की संसद के अंदर सब कुछ खुलकर बोला है। ये बातें नई नहीं है। इसे जानता तो हर सियासतदा है। बस ऐसे खुलकर बोलता नहीं है। अपनी फजीहत खुद नहीं पालता। लेकिन जहां ख्वाजा आसिफ ने अमेरिका का नाम लिया वहां वो अपने दूसरे हमदर्दों को भूल गए। चाहे चीन हो या अरब देश। इन सब ने जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान का बखूबी इस्तेमाल किया।
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में जो जंग लड़ी थी वो धर्म के लिए नहीं अमेरिका के लिए थी। 1947 में पाकिस्तान ने अपने गठन के साथ ही भारत को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मान लिया था। विदेश नीति से लेकर डिफेंस पॉलिसी तक सब कुछ उसी हिसाब से लिखा जाने लगा था क्योंकि उसको कश्मीर पे हक चाहिए था। उसको हथियाना था। इसके लिए पाकिस्तान ने अमेरिका को एक बड़े भाई की तरह देखा जो उसे हथियार से लेकर पैसे तक सब दे सकता था। लिहाजा पाकिस्तान ने सुरक्षा और सेना के मामलों में अमेरिका का साथ पकड़ लिया। अमेरिका को पाकिस्तान में एशिया का वो साथी दिखा जिसका इस्तेमाल सोवियत संघ को काउंटर करने के लिए किया जा सकता था। शुरुआत 1956 में हुई। पाकिस्तान ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को पेशावर में अपना यू टू जासूसी बेस चलाने की बनाने की इजाजत दे दी ताकि वहां से सोवियत संघ की हरकतों पे नजर रखी जा सके।
वियतनाम और ईरान में मात खाने के बाद अमेरिका रूस को मजा चखाना चाहता था। इसके लिए जरिया बना पाकिस्तान। पाकिस्तान की लोकेशन ऐसी है कि वो साउथ एशिया, सेंट्रल एशिया और मिडिल ईस्ट के बीच पड़ता है। इसलिए अमेरिका ने उसे एक तरह से बेस की तरह इस्तेमाल किया और उस समय अफगानिस्तान में जो लड़ाके सोवियत सेना के खिलाफ लड़ रहे थे उन्हें फेनिंग, पनाह और हथियार पहुंचाने में पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने मदद भी की। बदले में पाकिस्तान को अरबों डॉलर की मदद और हथियार मिले।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजमीन नेतन याू के बीच करीब 3 घंटे बैठक चली है। इसमें ईरान के मुद्दे पर बातचीत की गई लेकिन अंतिम समझौता नहीं हुआ। ट्रंप ने कहा कि बातचीत अच्छी रही। हालांकि कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इस बैठक में ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत जारी रखने पर जोर दिया है ताकि देखा जा सके समझौता हो सकता है या नहीं। मीटिंग के बाद ट्रंप सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रथ सोशल पर लिखते हैं कि फिलहाल हम किसी फैसले पर नहीं पहुंचे हैं। लेकिन मैंने इस बात पर जोर दिया है कि ईरान के साथ बातचीत जारी रखनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि कोई समझौता हो सकता है या नहीं। ट्रंप आगे लिखते हैं मैंने पीएम को साफ कर दिया है।
पीएम ने तन्याहू को साफ कर दिया है कि अगर समझौता हो जाए तो बेहतर है। अगर नहीं होता है तो हम सब उसका अंजाम देखेंगे। पिछली बार जब ईरान नहीं माना था तो उनके खिलाफ ऑपरेशन मिडनाइट हैमर चलाया गया जो उनके लिए बहुत बुरा साबित हुआ। उम्मीद है कि इस बार वह समझदारी दिखाएंगे। इसके अलावा हमने गजा और उसके आसपास के इलाके में शांति प्रयासों पर भी बात की। वाकई मिडिल ईस्ट में अब शांति है। ऐसा ट्रंप का दावा है। मिडिल ईस्ट में शांति का दावा करने वाले अमेरिका और ईरान के बीच काफी दिनों से तनाव बना हुआ है। अगर ईरान ट्रंप की डिमांड को ठुकराता है तो जंग की पूरी-पूरी आशंका है।
ईरान से डील को लेकर अमेरिका ने तीन शर्तें रखी हैं। पहली यह कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह बंद करे। इनर यूरेनियम के अपने स्टॉक को खत्म करें। दूसरा यह कि बैलस्टिक मिसाइल्स के स्टॉक्स को कम करे, खत्म करें। दूसरे देशों में जो उसके समर्थक गुट लड़ रहे हैं उनकी मदद करना बंद करें। ट्रंप तमाम मीडिया चैनल्स के जरिए ईरान को लगातार धमकी दे रहे हैं। उन्होंने इजरली टीवी चैनल 12 से कहा ईरान डील करे या फिर हम कोई तगड़ा एक्शन लेंगे। न्यूज़ चैनल फोक्स बिज़नेस से वो कहते हैं कि ईरान अगर डील नहीं करता तो इससे बड़ी मूर्खता तो हो ही नहीं सकती। इतना ही नहीं ट्रंप मिडिल ईस्ट में दूसरा क्राफ्ट कैरियर भेजने का भी हिंट दे चुके हैं।
अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट एग्जॉस्ट के मुताबिक ट्रंप ने साफ किया है कि वह दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर भेजने की सोच रहे हैं ताकि ईरान से डील फेल होने पर सैन्य कारवाई की जा सके। अमेरिका का एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन पहले से ही मिडिल ईस्ट में तैनात है। अमेरिका के सबसे शक्तिशाली बेड़ों में से एक है यह। इस कैरियर पर 90 एयरक्राफ्ट और 3200 लोग सवार हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर ईरान अपनी बात पर डटा है। ईरान का कहना है कि वह सिविल पर्पस से न्यूक्लियर प्रोग्राम चला रहा है और इस पर अमेरिका से बात करने के लिए तैयार भी है।
T20 World cup: अफ़गानिस्तान के ऑलराउंडर मोहम्मद नबी पर साउथ अफ्रीका के खिलाफ़ टी20 वर्ल्ड कप 2026 ग्रुप-डी मैच के दौरान अंपायर से कहासुनी के बाद जुर्माना लगाया गया है। नबी पर आईसीसी कोड ऑफ कंडक्ट के लेवल 1 को तोड़ने के लिए मैच फीस का 15 फीसदी जुर्माना लगाया गया।
नबी को आईसीसी कोड ऑफ़ कंडक्ट के आर्टिकल 2.4 को तोड़ने का दोषी पाया गया, जो प्लेयर्स और प्लेयर सपोर्ट स्टाफ़ के लिए है, जो इंटरनेशनल मैच के दौरान अंपायर के निर्देश को न मानने से जुड़ा है। यह घटना अफ़गानिस्तान की पारी के 14वें ओवर की शुरुआत में हुई थी, जहां नबी साउथ अफ़्रीका के तेज गेंदबाज लुंगी एनगिडी के रिस्ट बैंड को लेकर अंपायर से भिड़ गए थे।
अफगानिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेले गए मैच का नतीजा दूसरे सुपर में निकला था। मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 187 रन बनाए थे। अफगानिस्तान ने भी इतना ही स्कोर किया और मैच टाई हो गया। इसके बाद नतीजे के लिए सुपर ओवर का सहारा लिया गया लेकिन पहले सुपर में भी बात नहीं तो मैच दूसरे सुपर ओवर में गया।
इस बार दक्षिण अफ्रीका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 6 गेंद में 23 रन जोड़े। अफगानिस्तान को जीत के लिए 24 रन बनाने थे। लेकिन शुरुआत खराब रही। पहली दो गेंद के भीतर मोहम्मद नबी को केशव महाराज ने आउट कर दिया। लेकिन, इसके बाद की अगली तीन गेंद पर विकेटकीपर रहमानुल्लाह गुरबाज ने लगातार तीन छक्के मार मैच को और रोमांचक बना दिया। अब आखिरी गेंद पर जीत के लिए 5 रन चाहिए थे। गुरबाज ने बड़ा शॉट खेलने की कोशिश तो की लेकिन गेंद पॉइंट की दिशा में गई और वो कैच आउट हो गए और इस तरह अफगानिस्तान मैच हार गया।