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पाकिस्तान: पीएम शरीफ संसद 23वें सत्र की एक भी बैठक में नहीं रहे मौजूद, रिपोर्ट में खुलासा

इस्लामाबाद, 11 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में चुने हुए सांसद, संसद में जाने की अपनी सबसे बुनियादी जिम्मेदारी से कोसों दूर भागते दिख रहे हैं। वो भी तब जब देश आर्थिक सुधार और राजनीतिक ध्रुवीकरण की समस्या से जूझ रहा है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी नेशनल असेंबली के 23वें सेशन के दौरान एक भी सिटिंग में शामिल नहीं हुए।

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के 23वें सत्र में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक भी बैठक में हिस्सा नहीं लिया। फ्री एंड फेयर इलेक्शन नेटवर्क (एफएएफईएन) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह सत्र 12 जनवरी से 22 जनवरी तक चला, जिसमें कुल 332 सदस्यों में से 276 कम से कम एक बैठक से अनुपस्थित रहे, जबकि 56 सदस्य (17 फीसदी) पूरे सत्र से अनुपस्थित रहे।

रिपोर्ट में प्रमुख नेताओं की गैरमौजूदगी पर चिंता जताई गई है। पीएम शहबाज शरीफ के अलावा, पूर्व पीएम नवाज शरीफ और पीपीपी चेयरमैन बिलावल भुट्टो-जरदारी भी पूरे सत्र से गायब रहे। कैबिनेट सदस्यों में से केवल एक संघीय मंत्री, बालोचिस्तान अवामी पार्टी के खालिद हुसैन मगसी ने सभी बैठकों में हिस्सा लिया, जबकि सात मंत्रियों ने कोई बैठक नहीं की।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने कहा, लगातार गैरहाजिरी इस प्रक्रिया को खोखला कर रही है और ये लोकतंत्र का मजाक उड़ाती है। पीएम शहबाज शरीफ एक भी बैठक में शामिल नहीं हुए। न ही पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी मौजूद रहे। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग संसद को विकल्प मान लें तो इसका अधीनस्थों पर नकारात्मक असर पड़ना तय है।

इसमें एक बिल का जिक्र है जिस पर सबसे ज्यादा 222 सदस्य इकट्ठा हुए थे। ये बिल सांसद सदस्यों के हित में था। द ट्रिब्यून के संपादकीय में आगे कटाक्ष करते हुए लिखा गया कि ऐसा लगता है कि कानून बनाने वाले, जब उनके अपने फायदे के हिसाब से कानून बन रहे होते हैं, तब असेंबली में मौजूद रहने के लिए प्रेरित होते हैं, न कि तब जब रूटीन गवर्नेंस या एग्जीक्यूटिव की निगरानी दांव पर लगी हो।

एफएएफईएन के अनुसार, इससे पहले के सत्रों में भी इसी तरह की अनुपस्थिति देखी गई है, जैसे सितंबर 2025 के 19वें सत्र में एक चौथाई सदस्य पूरे सत्र से गायब रहे। यह स्थिति पाकिस्तान की संसदीय प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जहां शीर्ष नेता संसद से दूरी बनाए रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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पाकिस्तान में आईएसआईएस-के की संभावित पुनर्सक्रियता से क्षेत्रीय सुरक्षा पर खतरा: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 11 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसआईएस-के/आईएसकेपी) की गतिविधियों में संभावित पुनरुत्थान से व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है, जिसमें भारत भी शामिल है। एक रिपोर्ट में बुधवार को यह चिंता जताई गई।

‘इंडिया नैरेटिव’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, आईएसआईएस-के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर अपनी मौजूदगी दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि पाकिस्तान गुप्त रूप से आईएसकेपी के साथ फिर से समझौता करने और उसकी गतिविधियों को कश्मीर की ओर मोड़कर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो जोखिम और बढ़ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को आईएसकेपी की गतिविधियों का आकलन करते समय पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा अस्थिरता सीमा-पार आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती है और भारत के खिलाफ नए आतंकी नेटवर्क के उभरने में सहायक हो सकती है।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि लगभग पांच साल बाद आईएसआईएस ने उपमहाद्वीप में एक बड़े हमले को अंजाम दिया, जिसमें पाकिस्तान की एक शिया मस्जिद को निशाना बनाया गया। इस हमले में 30 से अधिक लोगों की मौत हुई और करीब 170 लोग घायल हुए। इससे पहले 2023 में खार बम धमाके, 2022 में पेशावर मस्जिद हमला (जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए थे) और 2021 में अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी के दौरान एबी गेट बम धमाका (जिसमें 170 से अधिक लोग मारे गए थे) जैसे हमले हुए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, दो साल बाद आईएसआईएस-के ने इतना बड़ा आत्मघाती हमला किया, वह भी उस समय जब उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति पाकिस्तान के दौरे पर थे। रिपोर्ट में कहा गया कि इसे केवल एक अलग-थलग आतंकी घटना मानना उचित नहीं होगा, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ मजबूत करने की आईएसआईएस-के की कोशिशें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हालिया इस्लामाबाद मस्जिद हमला ऐसे समय हुआ जब बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने 31 जनवरी से 8 फरवरी तक ‘ऑपरेशन हेरोफ’ का दूसरा चरण शुरू किया था। इसे पाकिस्तान में सुरक्षा शून्य का फायदा उठाने का उदाहरण बताया गया है।

रिपोर्ट में विभिन्न स्रोतों का हवाला देते हुए दावा किया गया कि 2017 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आईएसआईएस के साथ एक गुप्त समझौता किया था, जिसके तहत आतंकी संगठन ने पाकिस्तान में हमला न करने और अपनी गतिविधियों को अफगानिस्तान तक सीमित रखने पर सहमति जताई थी। इसके बावजूद आईएसकेपी ने बलूचिस्तान के मस्तुंग जिले में बलूच अवामी पार्टी (बीएपी) की एक राजनीतिक रैली में आत्मघाती हमला किया।

रिपोर्ट में कहा गया कि 2020 तक आईएसकेपी ने सीधे तौर पर पाकिस्तानी प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया, लेकिन यह तर्क दिया गया कि गुप्त संपर्कों के माध्यम से पाकिस्तान ने आईएसकेपी को तालिबान और बलूच समूहों के खिलाफ एक प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की। अफगानिस्तान में आईएसकेपी की गतिविधियों को सहन करना पाकिस्तान के लिए दोहरे रणनीतिक लाभ का माध्यम बताया गया—पहला, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बीएलए के खिलाफ परोक्ष युद्ध, और दूसरा, आईएसकेपी सदस्यों की गिरफ्तारी व प्रत्यर्पण के जरिए कूटनीतिक लाभ हासिल करना।

रिपोर्ट में मार्च 2025 में आईएसकेपी कमांडर मोहम्मद शरीफुल्लाह की गिरफ्तारी और अमेरिका को प्रत्यर्पण का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, आईएसकेपी के साथ इस तरह के गुप्त सहयोग से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को उल्टा नुकसान हुआ है और यह दांव विफल साबित हो रहा है।

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि आईएसआईएस-के की संभावित पुनर्सक्रियता न केवल पाकिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

--आईएएनएस

डीएससी

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