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Dental Healthcare में Denmark का मॉडल कारगर, समय रहते बीमारी रोकने पर देता है जोर

(विक्रम निरंजन, यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक) लिमरिक (आयरलैंड), 12 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आकलन करने के लिए दांतों की सेहत भले ही पहला पैमाना न लगे, लेकिन इससे स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं। दांतों में सड़न, मसूड़ों की बीमारी और दांतों का गिरना दुनिया भर में आम दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हैं। ये समस्याएं अक्सर यह भी बताती हैं कि कोई स्वास्थ्य प्रणाली बीमारियों की रोकथाम को कितनी प्राथमिकता देती है। एक दंत चिकित्सक और शोधकर्ता के रूप में मेरा अनुभव है कि मुंह से जुड़ी बीमारियां शायद ही कभी केवल एक खराब दांत तक सीमित होती हैं। इनके पीछे अक्सर पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका होती है। समय रहते बीमारी की रोकथाम कैसे की जाती है, समस्याओं का पता कब चलता है और लोगों को बिना देरी इलाज मिल पाता है या नहीं, ये सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं। इसी लिहाज से इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना दिलचस्प है। दोनों समृद्ध यूरोपीय देश हैं और कल्याणकारी व्यवस्था की मजबूत परंपरा रखते हैं, लेकिन उनकी दंत चिकित्सा प्रणालियां अलग-अलग तरीके से काम करती हैं।

----- बच्चों के दांतों की सेहत ----- डेनमार्क ने ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जिसे जनस्वास्थ्य के शोधकर्ता अक्सर एक आदर्श उदाहरण के रूप में देखते हैं। वहां बच्चों को स्थानीय निकायों की ओर से मुफ्त दंत चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। इसमें नियमित जांच, फ्लोराइड का इस्तेमाल और स्कूलों के माध्यम से मौखिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता शामिल है। दांतों से जुड़ी बीमारियां कम उम्र में ही शुरू हो सकती हैं। बचपन में इनकी रोकथाम करने से किशोरावस्था और उसके बाद भी दांतों को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है। डेनमार्क में समस्याओं के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय उनका शुरुआती चरण में पता लगाने और उपचार करने पर जोर रहता है। इसके विपरीत, इंग्लैंड की स्थिति अलग है। नवीनतम राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, वहां पांच साल की उम्र के 27 प्रतिशत बच्चों के दांतों में सड़न है। सबसे अधिक वंचित क्षेत्रों के बच्चों में यह समस्या अपेक्षाकृत कम वंचित क्षेत्रों के बच्चों की तुलना में कहीं अधिक आम है। इंग्लैंड में छोटे बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने के प्रमुख कारणों में दांतों की सड़न भी शामिल है। दोनों देशों के बीच यह एक बड़ा अंतर है। डेनमार्क में समस्या को शुरुआत में ही रोकने की कोशिश की जाती है, जबकि इंग्लैंड में अब भी कई बच्चों को दंत चिकित्सक के पास जाना पड़ता है और कुछ मामलों में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, क्योंकि समस्या का पता देर से चलता है।

----- वयस्कों के दांतों की स्थिति ----- वयस्कों में भी दोनों देशों के बीच अंतर दिखाई देता है। डेनमार्क में नियमित रूप से दंत चिकित्सक के पास जाना आम है, खासकर बुजुर्गों में। लंबे समय से किए जा रहे सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कई लोग दांतों की जांच को अपने समग्र स्वास्थ्य की देखभाल का नियमित हिस्सा मानते हैं। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्षों तक दांतों की जांच नहीं कराने से मसूड़ों की बीमारी, दांतों का गिरना और अधिक जटिल उपचार की जरूरत जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इंग्लैंड में दंत चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच अधिक असमान है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 65 प्रतिशत वयस्कों ने दो साल की अवधि में एनएचएस के दंत चिकित्सक से उपचार लिया। इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 35 प्रतिशत वयस्कों को कोई इलाज नहीं मिला। इनमें से कुछ लोग निजी दंत चिकित्सकों से उपचार कराते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा बताता है कि कई लोगों के लिए एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवा हासिल करना कितना मुश्किल हो गया है। डेनमार्क में व्यवस्था नियमित जांच को प्रोत्साहित करती है, जबकि इंग्लैंड में कई लोगों के लिए दंत चिकित्सक से मिलने का समय हासिल करना ही अनिश्चित हो गया है। इससे लोगों में निराशा बढ़ती है और उन लोगों की मुंख संबंधी सेहत धीरे-धीरे खराब होने का जोखिम रहता है, जो निजी इलाज का खर्च उठाने या बार-बार अपॉइंटमेंट लेने की कोशिश करने में सक्षम नहीं हैं। दांतों की बीमारियां केवल जैविक कारणों से नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियां भी इन्हें प्रभावित करती हैं। इसलिए आर्थिक और व्यावहारिक बाधाओं का सामना करने वाले लोगों में इन बीमारियों का खतरा अधिक होता है।

----- स्वास्थ्य व्यवस्था किस चीज को प्राथमिकता देती है ----- इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि दंत चिकित्सा व्यवस्था उसी दिशा में काम करती है, जिसके लिए उसे तैयार किया गया है। डेनमार्क में बच्चों को सरकारी वित्तपोषण से दंत चिकित्सा सेवाएं मिलती हैं, जबकि वयस्कों के लिए सब्सिडी वाली व्यवस्था है। इससे नियमित जांच, इलाज में निरंतरता और बीमारी की रोकथाम को प्रोत्साहन मिलता है। यह व्यवस्था पूरी तरह दोषरहित नहीं है, लेकिन इसका जोर लोगों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने पर है। इंग्लैंड में एनएचएस के तहत दंत चिकित्सा सेवाएं सभी के लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। हालांकि, इसकी भुगतान व्यवस्था को लेकर अक्सर यह आलोचना होती रही है कि इसमें बीमारी की रोकथाम की तुलना में इलाज का पूरा चरण समाप्त करने को अधिक प्रोत्साहन मिलता है। महामारी के बाद सेवाओं तक पहुंच बेहतर बनाने और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘एनएचएस डेंटल रिकवरी प्लान’ शुरू किया गया था। इसके बावजूद दंत चिकित्सा सेवाओं पर दबाव, असमान पहुंच और नए एनएचएस मरीजों को स्वीकार करने में कई क्लीनिकों की असमर्थता की समस्या बनी हुई है। दोनों देशों की व्यवस्थाओं में प्रोत्साहन के तरीके अलग हैं और इससे यह तय होता है कि मरीजों को किस तरह की सेवाएं मिलती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में इन प्रोत्साहनों की अहम भूमिका होती है।

----- फ्लोराइड और बीमारी की रोकथाम ----- फ्लोराइड इसका एक सरल उदाहरण है कि अलग-अलग स्वास्थ्य प्रणालियां दांतों की सड़न रोकने के लिए किस तरह काम करती हैं। इंग्लैंड में लगभग 10 प्रतिशत लोगों को फ्लोराइड युक्त पानी मिलता है। साक्ष्य बताते हैं कि पानी में फ्लोराइड मिलाने से बच्चों के दांतों में सड़न कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी उपलब्धता सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। डेनमार्क में पानी में फ्लोराइड नहीं मिलाया जाता। वहां फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट, दंत चिकित्सकों द्वारा फ्लोराइड का इस्तेमाल और नियमित निवारक देखभाल पर जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चों के दांतों पर फ्लोराइड वार्निश की परत लगाई जाती है, जिससे दांतों को सड़न से बचाने में मदद मिलती है। इससे मिलने वाला महत्वपूर्ण सबक यह है कि फ्लोराइड तब अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकता है, जब उसे ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए, जो लोगों तक समय रहते और लगातार पहुंचती हो। दांतों की बीमारियों का आर्थिक बोझ भी काफी बड़ा है। इसलिए यह मायने रखता है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर पैसा कब और किस उद्देश्य से खर्च किया जाता है। खर्च का एक बड़ा हिस्सा बीमारी की रोकथाम पर समय रहते किया जाना चाहिए। डेनमार्क बच्चों पर विशेष ध्यान देते हुए शुरुआती चरण में निवेश करता है। ब्रिटेन भी स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ी रकम खर्च करता है, लेकिन वहां बीमारी बढ़ने के बाद इलाज, दांत निकालने और समय पर रोकथाम नहीं होने से पैदा होने वाली समस्याओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है। दांतों की सेहत से यह समझने में मदद मिलती है कि कोई स्वास्थ्य व्यवस्था बीमारी की रोकथाम को कितना महत्व देती है और क्या लोग इलाज तक पहुंच को लेकर भरोसा कर सकते हैं। इसीलिए इंग्लैंड और डेनमार्क की तुलना महत्वपूर्ण है। दोनों देशों में बीमारी की रोकथाम के तरीके अलग हैं। डेनमार्क जहां समस्याओं का शुरुआती चरण में पता लगाने और उनका उपचार करने पर अधिक जोर देता है, वहीं इंग्लैंड में अक्सर तब कार्रवाई करनी पड़ती है, जब बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है।

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Prabhasakshi NewsRoom: Riyadh पर लगातार हो रहे Missile Attacks को रोकने में विफल रहा Mecca Pact, अब Trump ने Houthis के खिलाफ जंग में उतरने के दिए संकेत!

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में लगातार हो रहे मिसाइल हमलों ने पूरे मध्य पूर्व को एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां एक क्षेत्रीय संघर्ष के कई देशों के बीच व्यापक युद्ध में बदलने की आशंका बढ़ रही है। दस अक्टूबर को रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए भीषण हमले में तेरह लोगों की मौत हुई और तीन सौ से अधिक लोग घायल हुए। मृतकों में एक भारतीय नागरिक भी शामिल है। इसके ठीक अगले दिन, ग्यारह अक्टूबर को, हवाई अड्डे पर फिर हमला हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और ग्यारह लोगों के घायल होने की खबर सामने आई। इस बीच, यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र को लेकर दोबारा चेतावनी जारी कर दी है।

देखा जाये तो सवाल अब केवल रियाद की सुरक्षा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हूती विद्रोही सऊदी अरब की सैन्य ताकत और उसकी आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों को लगातार चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुके हैं? क्या अमेरिका इस संघर्ष में सीधे उतर सकता है? और क्या सऊदी अरब, पाकिस्तान तथा तुर्किये के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अब वास्तविक सैन्य कार्रवाई का आधार बनने जा रहा है?

इसे भी पढ़ें: Houthi Missile Attack on Riyadh | CCTV फुटेज में कैद रियाद एयरपोर्ट पर हूथी मिसाइल हमला, 13 की मौत और 300 से ज्यादा घायल

हम आपको बता दें कि रियाद में दस अक्टूबर को हुए हमले के दृश्य सामने आने के बाद दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है। हवाई अड्डे के भीतर यात्री मौजूद थे और कुछ लोग धार्मिक यात्रा के लिए रवाना होने की तैयारी कर रहे थे, तभी मिसाइल हमले से अफरा-तफरी मच गई। शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों में बारह लोगों की मौत बताई गई थी, लेकिन बाद में एक भारतीय नागरिक की मृत्यु के बाद यह संख्या तेरह हो गई। तीन सौ से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद रविवार को हवाई अड्डे के चौथे यात्री टर्मिनल पर एक अज्ञात प्रक्षेपास्त्र गिरने से आग लग गई। इस दूसरे हमले में एक व्यक्ति की मौत और ग्यारह लोगों के घायल होने की सूचना दी गई।

यानी दो दिनों में रियाद के हवाई अड्डे पर हमलों से जुड़ी मृतकों की संख्या कम से कम चौदह तक पहुंच गई है। हालांकि, पूरे सप्ताह के दौरान हवाई अड्डे पर हुए हमलों में मरने वालों की संख्या अठारह बताई गई है। इन आंकड़ों को अलग-अलग घटनाओं के संदर्भ में समझना जरूरी है।

देखा जाये तो खतरा केवल रियाद तक सीमित नहीं रहा। सऊदी अरब के पूर्वी क्षेत्र में स्थित दम्माम के किंग फहद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी निशाना बनाए जाने की खबर आई। सऊदी अधिकारियों ने वहां नुकसान का आकलन और सुरक्षा जांच शुरू की है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के अनुसार, रियाद के आसपास एक क्रूज मिसाइल को रोक लिया गया, पूर्वी प्रांत में एक मानवरहित विमान को नष्ट किया गया और खमीस मुशैत की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को भी रोक लिया गया। इससे साफ है कि सऊदी अरब के लिए खतरा एक अकेले हमले से कहीं अधिक व्यापक हो चुका है।

हम आपको बता दें कि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और हवाई क्षेत्र से दूर रहने की चेतावनी दोहराई है। संगठन ने दावा किया कि उसने रियाद के अलावा दम्माम के हवाई अड्डे और सऊदी तेल कंपनी अरामको की दो सुविधाओं को भी निशाना बनाया है। हूती नेतृत्व ने यह भी चेताया कि यदि यमन में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई जारी रही, तो आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

दूसरी तरफ, सऊदी अरब ने यमन में हूतियों के विरुद्ध हवाई हमले तेज किए हैं और हूतियों से लड़ रही यमन की सरकार समर्थक सेनाओं को समर्थन दिया है। हूती नेतृत्व का दावा है कि सऊदी अरब ने चौबीस घंटे में यमन पर एक सौ चौबीस हवाई हमले किए। देखा जाये तो दोनों पक्षों की बढ़ती सैन्य कार्रवाई यह संकेत दे रही है कि संघर्ष अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है।

खास बात यह भी है कि हूतियों को केवल यमन के भीतर सक्रिय एक विद्रोही संगठन समझना अब पर्याप्त नहीं होगा। उनके पास मिसाइलों, मानवरहित विमानों और अन्य हथियारों का ऐसा भंडार है, जिसके सहारे वे अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों से दूर स्थित ठिकानों को भी निशाना बनाने का दावा करते रहे हैं। लाल सागर के आसपास उनकी रणनीतिक स्थिति और समुद्री मार्गों को बाधित करने की क्षमता भी उन्हें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनाती है।

उधर, सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान और वायु रक्षा प्रणालियां हैं, लेकिन लगातार होने वाले हमले यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या हर मिसाइल और मानवरहित विमान को रोक पाना संभव है। किसी हमले का लक्ष्य भेद देना और किसी देश की सैन्य ताकत को पूरी तरह पराजित कर देना दो अलग बातें हैं। हूतियों की ताकत का आकलन इसी अंतर को ध्यान में रखकर करना होगा। मौजूदा घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि वे सऊदी अरब पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं।

यहाँ सवाल उठता है कि क्या अमेरिका भी सऊदी अरब के साथ युद्ध में उतरेगा? देखा जाये तो यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि अमेरिका हूतियों के विरुद्ध सऊदी अरब के हमलों में शामिल होने पर विचार कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी सैन्य भागीदारी की संभावना पर चर्चा हो रही है, लेकिन इसे सीधे युद्ध में उतरने का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

यदि अमेरिका सीधे हमलों में शामिल होता है, तो हूतियों के विरुद्ध सैन्य दबाव बढ़ सकता है। लेकिन इससे ईरान और अमेरिका के बीच पहले से जारी व्यापक संघर्ष के और फैलने का जोखिम भी पैदा होगा। हूतियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी भागीदारी की संभावना सामने आई है, पर उसके स्वरूप, समय और सीमा को लेकर कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों पर हमले शुरू करने का फैसला कर लिया है।

दूसरी ओर, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच सात अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसकी प्रमुख व्यवस्था यह है कि तीन देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला अन्य देशों के विरुद्ध हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य साझा सुरक्षा और सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है।

इस समझौते का महत्व अब बढ़ गया है, क्योंकि सऊदी अरब पर लगातार हमले हो रहे हैं। पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य, खुफिया, तकनीकी अथवा अन्य रक्षा सहायता सऊदी अरब की स्थिति मजबूत कर सकती है। लेकिन समझौते का होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि दोनों देश हूतियों के विरुद्ध सीधे युद्ध में सैनिक भेज चुके हैं। तुर्किये की संभावित सैन्य तैनाती को लेकर संसदीय अनुमोदन जैसे सवाल भी सामने हैं और वास्तविक सैन्य भूमिका पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। वहीं पाकिस्तान भी गोलमोल बातें कर सऊदी अरब की धड़कन बढ़ा रहा है। इसलिए मक्का समझौते का असर फिलहाल सामरिक सहयोग और सामूहिक प्रतिरोध की दिशा में दिखाई देता है। अभी तत्काल संयुक्त सैन्य अभियान की घोषणा नहीं की गई है।

एक सवाल यह भी है कि क्या दुनिया एक नए महायुद्ध की ओर बढ़ रही है? देखा जाये तो रियाद और दम्माम पर हमलों, यमन में तेज होती जवाबी कार्रवाई, अमेरिकी भागीदारी की संभावना और मक्का रक्षा समझौते के सक्रिय होने की चर्चा ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। रियाद का हवाई अड्डा बंद रहा और राजधानी के विद्यालयों में कुछ दिनों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की गई। विमानन सुरक्षा को लेकर विदेशी अधिकारियों ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी। इन घटनाओं का असर नागरिकों की आवाजाही, हवाई यातायात और क्षेत्रीय कारोबार पर पड़ रहा है। अभी वास्तविक खतरा यह है कि यदि सऊदी अरब की जवाबी कार्रवाई तेज होती है, अमेरिका सीधे युद्ध में उतरता है और ईरान भी अधिक सक्रिय भूमिका निभाता है, तो संघर्ष कई देशों तक फैल सकता है।

बहरहाल, फिलहाल मध्य पूर्व एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। रियाद पर लगातार हमले सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हैं, जबकि मक्का समझौता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में अमेरिका का अंतिम फैसला, पाकिस्तान और तुर्किये की वास्तविक सैन्य भूमिका, तथा हूतियों और सऊदी अरब के बीच हमलों का अगला दौर सबसे महत्वपूर्ण संकेत होंगे।  युद्ध का दायरा कितना बढ़ेगा, इसका फैसला केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि इन देशों के अगले राजनीतिक और सैन्य कदमों से होगा।

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