पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार, 85 वर्ष, को सोमवार दोपहर गले में खराश और खांसी की शिकायत के बाद बारामती स्थित उनके आवास से पुणे के एक अस्पताल में ले जाया जा रहा था। एनसीपी (एसपी) प्रमुख के भतीजे श्रीनिवास पवार ने बताया कि पवार को कल रात से लगातार खांसी आ रही थी और सीने में जकड़न के लक्षण दिखाई दे रहे थे, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने के लिए पुणे ले जाया गया।
रूबी हॉल क्लिनिक के मुख्य हृदय रोग विशेषज्ञ और प्रबंध न्यासी डॉ. परवेज़ ग्रांट ने इस घटनाक्रम की पुष्टि की। डॉ. ग्रांट ने कहा कि पहुँचने पर डॉक्टरों की एक टीम उनकी जाँच करेगी और उसके अनुसार आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। शरद पवार मुख कैंसर से उबर चुके हैं, जिसका निदान 1990 के दशक के उत्तरार्ध में हुआ था। उन्होंने इस बीमारी के इलाज के लिए अमेरिका और भारत में कई सर्जरी करवाईं।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) नेता रोहित पवार ने शनिवार को कहा कि हवाई दुर्घटना में अजित पवार की मौत की परिस्थितियों के बारे में सभी को संदेह है और वह 10 फरवरी को इस बारे में एक विस्तृत प्रस्तुति देंगे। बारामती में जिला परिषद चुनाव में अपना वोट डालने के बाद पत्रकारों से बातचीत में विधायक ने कहा कि अजित पवार चाहते थे कि राकांपा के दोनों गुट एकजुट हो जाएं और विलय की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। महाराष्ट्र में 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों के लिए चुनाव शनिवार को हुए। यह मतदान मूल रूप से पांच फरवरी को होना था, लेकिन 28 जनवरी को उपमुख्यमंत्री अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु और इसके बाद तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था।
दिवंगत राकांपा प्रमुख के भतीजे रोहित पवार ने कहा कि हर किसी के मन में (दुर्घटना के बारे में) सवाल और संदेह हैं। मैं 10 फरवरी को मुंबई में एक प्रस्तुति दूंगा। दुर्घटना क्यों हुई और यह कैसे हुई होगी, ये मुद्दे 10 फरवरी को उठाए जाएंगे। जिला परिषद चुनाव के लिए राकांपा (शप) और राकांपा ने हाथ मिलाया है और दोनों ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ रहे हैं। अजित पवार राकांपा के प्रमुख थे, जबकि उनके चाचा शरद पवार राकांपा (शप) के प्रमुख हैं।
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बदनाम अपराधी जेफ्री एपस्टीन की काली परछाईं उसकी मौत के सालों बाद भी बड़े-बड़े दिग्गजों का पीछा नहीं छोड़ रही है। ताज़ा मामला नॉर्वे का है, जहाँ की मशहूर राजदूत (Ambassador) मोना जूल को एपस्टीन से रिश्तों के चलते अपना पद छोड़ना पड़ा है।
अमेरिका की तरफ से जारी की गई फाइलों में जब मोना जूल और एपस्टीन के बीच कनेक्शन की बात सामने आई, तो नॉर्वे के विदेश मंत्रालय ने उन पर एक्शन लिया। नॉर्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्थ ईडे ने साफ कहा कि एपस्टीन जैसे अपराधी के साथ संपर्क रखना "सोच-समझ की भारी कमी" (Failure of judgement) को दर्शाता है। इस वजह से अब उन पर भरोसा करना मुश्किल है।
मोना जूल कोई मामूली डिप्लोमैट नहीं थीं। वो इजरायल, ब्रिटेन और UN में नॉर्वे की राजदूत रह चुकी हैं। सबसे बड़ी बात ये कि 90 के दशक में इजरायल-फिलिस्तीन के बीच हुए मशहूर 'ओस्लो समझौते' (Oslo Accords) में उनकी बहुत बड़ी भूमिका थी।
इस स्कैंडल की लपेट में और कौन-कौन है?
यह मामला सिर्फ नॉर्वे तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे यूरोप में हड़कंप मचा हुआ है:
ब्रिटेन में भी हलचल: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के चीफ ऑफ स्टाफ, मॉर्गन मैक्स्वीनी ने भी इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने गलती मानी कि उन्होंने पीटर मेंडलसन को अमेरिका का राजदूत बनाने की सलाह दी, जबकि उनके भी एपस्टीन से रिश्ते जगजाहिर थे।
पति पर भी जांच: मोना जूल के पति तेर्जे रोड-लार्सन (जो खुद एक बड़े डिप्लोमैट हैं) भी एपस्टीन से संबंधों के लिए माफी मांग चुके हैं। अब सरकार उस थिंक टैंक (IPI) की फंडिंग की भी जांच कर रही है, जिसे वो चलाते थे।
राजकुमारी ने मांगी माफी: नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस मेट-मैरिट ने भी एपस्टीन से मिलने के लिए एक बार फिर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है।
फिलहाल अगर बात की जाए मोना जूल की तो इस सप्ताह की शुरुआत में नॉर्वे के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी सरकार द्वारा जारी की गई फाइलों के एक विशाल संग्रह में एपस्टीन से जुड़े संबंधों की आंतरिक जांच लंबित रहने तक जूल को जॉर्डन और इराक में राजदूत के पद से निलंबित कर दिया था।
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