MP High Court ने रद्द किया 27 प्रतिशत OBC Reservation, 14 फीसदी कोटा फिर बहाल
जबलपुर, नौ अक्टूबर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने संबंधी 2019 के कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा के विपरीत है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने अपने 159 पृष्ठ के फैसले में कहा कि आरक्षण बढ़ाने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं थी।
अदालत ने राज्य में ओबीसी के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण बहाल कर दिया। पीठ ने कहा कि संशोधन पर्याप्त तैयारी के बिना और ‘‘अनुचित जल्दबाजी’’ में पारित किया गया था तथा कानून के मसौदे में त्रुटियां सरकार की ‘‘अपर्याप्त तैयारी’’ को दर्शाती हैं। अदालत ने संशोधन को ‘‘संवैधानिक प्रावधानों के अधिकार क्षेत्र से बाहर’’ बताते हुए कहा कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा के भी विपरीत है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में विवाद ओबीसी को आरक्षण देने के अधिकार को लेकर नहीं, बल्कि आरक्षण की सीमा को लेकर है। अदालत ने कहा कि उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं में ओबीसी के प्रतिनिधित्व से संबंधित उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है। ऐसे में आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का कोई आधार नहीं बनता।
पीठ ने इंद्रा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में उच्चतम न्यायालय के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा पार करने के लिए ‘‘कोई असाधारण परिस्थिति या आपात स्थिति मौजूद नहीं है।’’ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2019 के अध्यादेश और उसके बाद तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार द्वारा पारित संशोधन को निरस्त कर दिया। इस संशोधन के जरिए सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। पीठ ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी), कर्मचारी चयन मंडल और अन्य भर्ती एजेंसियों को निर्देश दिया कि आरक्षण बढ़ाने संबंधी कानून को चुनौती दिए जाने के बाद रोके गए 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग से भरा जाए।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच बढ़े हुए आरक्षण के तहत नियुक्त ओबीसी उम्मीदवारों की सेवाएं समाप्त नहीं की जाएंगी। 14 प्रतिशत की निर्धारित सीमा से अधिक नियुक्त उम्मीदवारों के पदों का समायोजन अगली तीन भर्ती प्रक्रियाओं में किया जाएगा। अदालत ने कहा कि 29 सितंबर 2022 के बाद की गई भर्तियों में 87 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां की गई थीं, जबकि शेष 13 प्रतिशत पदों को मामले में मुकदमेबाजी के परिणाम के इंतजार में रोक दिया गया था।
अब इन पदों को अनारक्षित वर्ग से भरा जाएगा। राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि अदालत ने दस्तावेजों, आंकड़ों और तालिकाओं की जांच करने के बाद फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा कि विवाद पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के अधिकार को लेकर नहीं, बल्कि सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को 2019 में 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने को लेकर था।
तत्कालीन कमलनाथ नीत कांग्रेस सरकार ने आठ मार्च 2019 को अध्यादेश जारी कर ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। बाद में 14 अगस्त 2019 को इसे कानून का रूप दिया गया। इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
मामला बाद में उच्चतम न्यायालय पहुंचा, जहां से संबंधित याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई और निर्णय के लिए इसे मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया। याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई इस साल पांच अगस्त को पूरी हुई, जिसके बाद पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस बीच, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि उनकी पार्टी 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए संघर्ष जारी रखेगी।
उन्होंने भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर ओबीसी वर्ग के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी। ओबीसी महासभा ने भी फैसले पर निराशा जताई। संगठन की राष्ट्रीय कोर समिति के सदस्य और मामले में याचिकाकर्ता लोकेन्द्र गुर्जर ने कहा कि महासभा फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी और ओबीसी वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेगी।
मध्यप्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष जे पी धनौपिया ने आरोप लगाया कि यह फैसला राज्य सरकार की ‘‘दुर्भावनापूर्ण मंशा’’ का परिणाम है। उन्होंने दावा किया कि सरकार अदालत के समक्ष तथ्यों को प्रभावी ढंग से पेश करने में विफल रही, जिसके कारण ओबीसी वर्ग 27 प्रतिशत आरक्षण के लाभ से वंचित रह गया।
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग: Abhijeet Deepke ने दिल्ली जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया
मुंबई, नौ अक्टूबर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने लोगों से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को होने वाले प्रदर्शन में बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुंचने की अपील की। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए जाने या कड़े कानूनों के तहत कार्रवाई किए जाने के बावजूद वह डरने वाले नहीं हैं। शुक्रवार देर रात जारी एक वीडियो संदेश में दीपके ने कहा कि शनिवार को दिल्ली में होने वाला प्रदर्शन उनके हिरासत में लिए जाने की स्थिति में भी नहीं रुकना चाहिए।
दीपके ने कहा, ‘‘कल हमारा मार्च है। मुझे नहीं पता कि मेरे साथ क्या होगा, मुझे हवाईअड्डे से ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा या बाद में गिरफ्तार किया जाएगा। लेकिन मैं झुकने वाला नहीं हूं, क्योंकि हम देश में लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं।
हिरासत में लिए जाने पर भी मुझे डर नहीं है। सरकार हम पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) या गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) लगा सकती है।’’ दीपके ने कहा कि कॉजपा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहती है। उन्होंने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार के इस्तीफे, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को समाप्त करने या निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया तैयार करने के बिना ऐसा संभव नहीं है।
उन्होंने लोगों से अपील की, ‘‘बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुंचें।’’ कॉजपा संस्थापक ने यह भी कहा कि विरोध मार्च शांतिपूर्ण होना चाहिए और लोगों को अहिंसा के रास्ते पर चलना चाहिए। दीपके ने इस आशंका को लेकर भी आगाह किया कि असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुसपैठ कर सकते हैं। संगठन ने बताया कि अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास शनिवार सुबह दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के टर्मिनल 3 पर पहुंचेंगे।
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