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Bangladesh Violence: ढाका में फिर हिंसा के बाद बवाल, चुनाव से 6 दिन पहले यूनुस के घर के बाहर कर्माचरियों का प्रदर्शन

Bangladesh Violence: बांग्लादेश की राजधानी ढाका एक बार फिर राजनीतिक तनाव और हिंसा की आग में झुलस गई है. आम चुनाव में अब महज़ छह दिन बचे हैं, और ऐसे समय में भड़की हिंसा ने सरकार से लेकर आम जनता तक की चिंता बढ़ा दी है. शुक्रवार को ढाका की सड़कों पर सरकारी कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन ने अचानक उग्र रूप ले लिया, जिससे हालात बेकाबू हो गए.

वेतनमान लागू करने की मांग पर सड़क पर उतरे कर्मचारी

यह प्रदर्शन नौवें राष्ट्रीय वेतनमान को तुरंत लागू करने की मांग को लेकर किया गया था. देशभर से आए सरकारी कर्मचारी पहले शहीद मीनार पर एकत्र हुए और फिर अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के सरकारी आवास ‘जमुना’ की ओर मार्च करने लगे. प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सरकार उनकी आजीविका से जुड़े मुद्दों को लगातार नजरअंदाज कर रही है.

प्रतिबंध के बावजूद आगे बढ़ी भीड़

अंतरिम सरकार की ओर से बताया गया कि 5 फरवरी को जमुना और उसके आसपास प्रदर्शन पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका था. बावजूद इसके, 6 फरवरी को प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ते हुए जमुना की ओर बढ़ने लगे. हालात उस वक्त और बिगड़ गए जब कुछ लोग वॉटर कैनन पर चढ़ गए.

पुलिस की कार्रवाई, आंसू गैस और लाठीचार्ज

स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को वाटर कैनन, साउंड ग्रेनेड और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा. जब भीड़ पीछे नहीं हटी, तो लाठीचार्ज भी किया गया. ढाका महानगर पुलिस ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रदर्शनकारी पर गोली नहीं चलाई गई और न ही किसी घातक हथियार का इस्तेमाल हुआ.

शाहबाग में टूटा बैरिकेड, बढ़ा तनाव

सुबह करीब 11:30 बजे प्रदर्शनकारियों ने शाहबाग इलाके में लगाए गए बैरिकेड तोड़ दिए और जबरन जमुना के एंट्री गेट की ओर बढ़ने लगे. नारेबाजी के दौरान प्रदर्शनकारी कहते सुने गए...“पेट में चावल नहीं, तो मुंह में विकास कैसा?” इस नारे ने सरकार के विकास दावों पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया.

पुलिस अधिकारी के बयान से भड़के प्रदर्शनकारी

स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब रमना डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस मसूद आलम ने मौके पर मौजूद एक सरकारी अधिकारी से पूछ लिया, “क्या आप चुनाव में गड़बड़ी करने के लिए जमुना आए हैं?”
इस टिप्पणी से प्रदर्शनकारी और उग्र हो गए.

चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस की सख्ती जारी रही, तो इसके गंभीर राजनीतिक नतीजे हो सकते हैं। एक कर्मचारी ने साफ कहा, 'अगर सरकारी कर्मचारियों पर हमले बंद नहीं हुए, तो हम चुनाव का बहिष्कार करेंगे.'

चुनावी माहौल पर मंडराता संकट

घटना में कई लोगों के घायल होने की खबर है. चुनाव से ठीक पहले भड़की यह हिंसा न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि पूरे चुनावी माहौल पर सवाल खड़े कर रही है. अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार हालात को कैसे संभालती है.

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वेतनमान लागू करने की मांग पर सड़क पर उतरे कर्मचारी

यह प्रदर्शन नौवें राष्ट्रीय वेतनमान को तुरंत लागू करने की मांग को लेकर किया गया था. देशभर से आए सरकारी कर्मचारी पहले शहीद मीनार पर एकत्र हुए और फिर अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के सरकारी आवास ‘जमुना’ की ओर मार्च करने लगे. प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सरकार उनकी आजीविका से जुड़े मुद्दों को लगातार नजरअंदाज कर रही है.

प्रतिबंध के बावजूद आगे बढ़ी भीड़

अंतरिम सरकार की ओर से बताया गया कि 5 फरवरी को जमुना और उसके आसपास प्रदर्शन पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका था. बावजूद इसके, 6 फरवरी को प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ते हुए जमुना की ओर बढ़ने लगे. हालात उस वक्त और बिगड़ गए जब कुछ लोग वॉटर कैनन पर चढ़ गए.

पुलिस की कार्रवाई, आंसू गैस और लाठीचार्ज

स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को वाटर कैनन, साउंड ग्रेनेड और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा. जब भीड़ पीछे नहीं हटी, तो लाठीचार्ज भी किया गया. ढाका महानगर पुलिस ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रदर्शनकारी पर गोली नहीं चलाई गई और न ही किसी घातक हथियार का इस्तेमाल हुआ.

शाहबाग में टूटा बैरिकेड, बढ़ा तनाव

सुबह करीब 11:30 बजे प्रदर्शनकारियों ने शाहबाग इलाके में लगाए गए बैरिकेड तोड़ दिए और जबरन जमुना के एंट्री गेट की ओर बढ़ने लगे. नारेबाजी के दौरान प्रदर्शनकारी कहते सुने गए...“पेट में चावल नहीं, तो मुंह में विकास कैसा?” इस नारे ने सरकार के विकास दावों पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया.

पुलिस अधिकारी के बयान से भड़के प्रदर्शनकारी

स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब रमना डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस मसूद आलम ने मौके पर मौजूद एक सरकारी अधिकारी से पूछ लिया, “क्या आप चुनाव में गड़बड़ी करने के लिए जमुना आए हैं?”
इस टिप्पणी से प्रदर्शनकारी और उग्र हो गए.

चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस की सख्ती जारी रही, तो इसके गंभीर राजनीतिक नतीजे हो सकते हैं। एक कर्मचारी ने साफ कहा, 'अगर सरकारी कर्मचारियों पर हमले बंद नहीं हुए, तो हम चुनाव का बहिष्कार करेंगे.'

चुनावी माहौल पर मंडराता संकट

घटना में कई लोगों के घायल होने की खबर है. चुनाव से ठीक पहले भड़की यह हिंसा न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि पूरे चुनावी माहौल पर सवाल खड़े कर रही है. अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार हालात को कैसे संभालती है.

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