भविष्य की मजबूती पर नजर:विदेशी निवेश की सीमा अब दोगुनी, वियतनाम जैसे देशों ने यही किया है
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किए हैं। अब देश के बाहर रह रहे भारतीय सीधे इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश कर सकेंगे। सरकार ने न सिर्फ निवेश की अनुमति दी है, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर उनके निवेश की सीमा भी 5% से बढ़ाकर 10% कर दी है। साथ ही कुल निवेश सीमा 10% से बढ़ाकर 24% करने का प्रस्ताव है। दरअसल 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने देश से करीब 1.66 लाख करोड़ रुपए निकाले थे। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार इस तरह के प्रयास कर रही है। साथ ही वित्त मंत्री ने बजट भाषण में ये भी कहा कि विदेशी निवेशकों के भारत में निवेश के नियम-कानून सरल बनाए जाएंगे। बजट की इन घोषणाओं के बाद प्रवासी भारतीय यानी एनआरआई और प्रवासी भारतीय नागरिकों (ओसीआई) के अलावा अन्य विदेशी नागरिक भी भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। 29 जनवरी को आए आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में एफडीआई की कुल आमद अब भी पूरी संभावनाओं से कम है। सर्वे में ये भी बताया गया है कि वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, ताइवान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश टैक्स छूट, कस्टम ड्यूटी में राहत, सस्ते लोन, वीसा संबंधी रियायतें और प्रधानमंत्री के स्तर पर प्रोजेक्ट मंजूरी जैसे उपायों की बदौलत बड़ा विदेशी निवेश आकर्षित कर रहे हैं। इस साल बजट के प्रावधान इन्हीं देशों से प्रेरित नजर आ रहे हैं। जरूरत क्यों... चीन में एफडीआई 4% तक, भारत में सिर्फ 1.5% रॉकफेलर इंस्टीट्यूट के रुचिर शर्मा के मुताबिक, बड़े विदेशी निवेश की बदौलत ही वियतनाम, चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं तेज विकास कर पाई हैं। उनके उछाल के दौर में एफडीआई जीडीपी के 4% तक चला गया था। भारत में यह 1.5% से ऊपर नहीं गया। पोर्टफोलियो रूट से सीधे निवेश की अनुमति देना और फेमा नियमों की समीक्षा का मकसद यही कमी को दूर करना है। फायदा: भारत में अब लंबे समय तक पूंजी रख सकेंगे विदेशी दिसंबर, 2025 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 18 हजार करोड़ रुपए निकाले थे। बजट में घोषित नए प्रावधानों से विदेश में रह रहे भारतीयों का निवेश दोगुना होने की संभावना है। 10% की लिमिट होने की वजह से विदेशी निवेशक अब लंबे समय तक भारतीय बाजारों में अपनी पूंजी रख सकेंगे। यानी कि देश में पैसा आने का नया रास्ता तैयार हो रहा है। नेट एफडीआई कम, इसलिए निवेश सीमा बढ़ाने पर है सरकार का है जोर,जियोजीत इन्वेस्टमेंट के निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमर ने कहा, "भारत में शुद्ध एफडीआई कम है। इसीलिए केंद्र विदेशी निवेश बढ़ाने पर खास ध्यान दे रही है। रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने और डेटा सेंटर लगाने वाली कंपनियों को टैक्स में छूट देने जैसे निर्णय इसी दिशा में लिए गए हैं। कंपनियों की लागत घटेगी, मुनाफे में वृद्धि होगी बाजार में विदेशी भागीदारी बढ़ने से भारतीय कंपनियों के लिए कैपिटल जुटाना सस्ता हो जाएगा। कंपनियों की लागत में कमी आएगी तो उनके प्रॉफिट में भी सुधार होगा, जिसका सीधा फायदा उस कंपनी में निवेश करने वाले निवेशकों को मिलेगा। इससे बाजार में उतार-चढ़ाव की संभावनाएं कम हो जाएंगी। {24% हो गई अब कुल निवेश सीमा, पहले यह लिमिट 10% थी {10% हो गई है विदेश में रह रहे भारतीयों के देश में निवेश की सीमा
भारत सिंधु जल समझौते की सुनवाई में शामिल नहीं होगा:कहा- यह कोर्ट अवैध है, इसके आदेशों को नहीं मानते
भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) के तहत गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) की कार्यवाही को खारिज कर दिया है। भारत ने कहा है कि वह इस अदालत की वैधता को नहीं मानता और इसकी किसी भी प्रक्रिया में शामिल नहीं होगा। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कहा है कि जब सिंधु जल संधि को ही भारत ने स्थगित कर रखा है, तो उस संधि के तहत बनी किसी संस्था को जवाब देने की बाध्यता नहीं है। कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फरवरी 2-3 को नीदरलैंड्स के पीस पैलेस में सुनवाई तय की है। साथ ही भारत के बगलिहार और किशनगंगा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े ‘पोंडेज लॉगबुक’ दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया है। भारत ने इन आदेशों का जवाब देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने भारत से रिकॉर्ड पेश करने को कहा कोर्ट ने 24 जनवरी 2026 के आदेश में कहा कि अगर भारत मौजूद नहीं रहता, तो पाकिस्तान अकेले ही सुनवाई में दलीलें देगा। इसके बाद 29 जनवरी को कोर्ट ने भारत से बगलिहार और किशनगंगा प्रोजेक्ट्स के ऑपरेशनल रिकॉर्ड मांगे। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि दस्तावेज नहीं मिलने पर वह ‘एडवर्स इनफेरेंस’ यानी प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है। साथ ही यह भी कहा गया कि भारत द्वारा संधि को स्थगित करने का फैसला कोर्ट की अधिकार-सीमा को प्रभावित नहीं करता। भारत का कहना है कि मौजूदा विवाद तकनीकी है और इसे न्यूट्रल एक्सपर्ट के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। सिंधु नदी के पानी को लेकर जब भी कोई तकनीकी विवाद होता है, तो उसे सुलझाने के लिए न्यूट्रल (निष्पक्ष) एक्सपर्ट की व्यवस्था की गई है। यह प्रावधान सिंधु जल संधि (IWT) में पहले से तय है। न्यूट्रल एक्सपर्ट कोई अदालत नहीं होता। वह एक स्वतंत्र और तटस्थ तकनीकी विशेषज्ञ होता है, जो पानी से जुड़े तकनीकी सवालों पर राय देता है। न्यूट्रल एक्सपर्ट किन मामलों में दखल देता है? भारत पिछले साल सिंधु जल संधि को स्थगित कर चुका भारत-पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ था। 22 अप्रैल को जम्मू-कशमीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को स्थगित कर दिया था। सिंधु नदी प्रणाली में कुल 6 नदियां हैं- सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इनके किनारे का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसमें 47% जमीन पाकिस्तान, 39% जमीन भारत, 8% जमीन चीन और 6% जमीन अफगानिस्तान में है। इन सभी देशों के करीब 30 करोड़ लोग इन इलाकों में रहते हैं। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पहले से ही भारत के पंजाब और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे का झगड़ा शुरू हो गया था। 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के PM नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच दस्तखत हुए। इसे इंडस वाटर ट्रीटी या सिंधु जल संधि कहा जाता है। सिंधु जल समझौता स्थगित करने से पाकिस्तान पर असर पाकिस्तान में खेती की 90% जमीन यानी 4.7 करोड़ एकड़ एरिया में सिंचाई के लिए पानी सिंधु नदी प्रणाली से मिलता है। पाकिस्तान की नेशनल इनकम में एग्रीकल्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 23% है और इससे 68% ग्रामीण पाकिस्तानियों की जीविका चलती है। इसका असर पाकिस्तान में आम लोगों के साथ-साथ बिजली उत्पादन पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सालाना बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है।
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