'असामाजिक तत्वों के मन में डर पैदा करना जरूरी है', सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली पुलिस को निर्देश
Supreme Court on Rape Cases: दिल्ली-एनसीआर में रेप और यौन शोषण के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई की. इस दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिए कि असामाजिक तत्वों के मन में डर पैदा करना जरूरी है. एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को चेतावनी दी कि अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों के मन में कानून का भय पैदा करना आवश्यक है.
कोर्ट ने कहा, "अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले असामाजिक तत्वों के मन में भय पैदा करना जरूरी है." सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जब तक असामाजिक तत्व अपराध करने के परिणामों से भयभीत नहीं होंगे, तब तक ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल होगा.
अदालत ने कहा कि पुलिस को ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए जिससे अपराध होने से पहले ही संभावित अपराधी के मन में सजा और पुलिस कार्रवाई का भय पैदा हो जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी सभ्य समाज में बलात्कार स्वीकार्य नहीं है. अदालत ने कहा कि ऐसे अपराधों को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए.
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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली-मुंबई में क्यों सड़कों पर उतरे लोग, 3 दिन के प्रदर्शन में अब तक क्या-क्या हुआ?
देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई में 2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर 2026 तक चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन देखने को मिला. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब की है.
दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया, जबकि मुंबई में विरोध ने रविवार को बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया. यहां शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने संयुक्त रूप से ‘विराट गर्जना मोर्चा’ निकाला.
लेकिन आखिर तीन दिनों में दिल्ली और मुंबई में क्या-क्या हुआ और SIR को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हुआ? आइए पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार समझते हैं.
2 अक्टूबर: गांधी जयंती पर दिल्ली में प्रदर्शन की शुरुआत
2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन दिल्ली में विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समाज से जुड़े लोगों ने जंतर-मंतर की तरफ मार्च करने की कोशिश की.
प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठ रहे सवालों पर जवाब दिया जाए.
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग की और निषेधाज्ञा लागू की. अलग-अलग जगहों से जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया. रिपोर्टों के मुताबिक, पहले दिन 700 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई. हिरासत में लिए गए लोगों में आम आदमी पार्टी की नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी समेत कई राजनीतिक नेता और कार्यकर्ता शामिल थे.
सुरक्षा व्यवस्था के तहत मध्य दिल्ली के कई इलाकों में पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई और कुछ मेट्रो स्टेशन भी अस्थायी रूप से बंद किए गए.
3 अक्टूबर: प्रदर्शन जारी, FIR भी दर्ज
अगले दिन यानी 3 अक्टूबर को भी प्रदर्शन का सिलसिला जारी रहा. प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर के आसपास जुटने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया.
इस दौरान प्रदर्शन से जुड़े लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं. सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा समेत कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया. प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी.
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से जुड़े मामलों में तीन FIR दर्ज कीं. इनमें निषेधाज्ञा के उल्लंघन और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे आरोप शामिल बताए गए हैं.
इस बीच प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए, जबकि पुलिस का पक्ष सार्वजनिक व्यवस्था और लागू प्रतिबंधों को बनाए रखने पर केंद्रित रहा.
4 अक्टूबर: दिल्ली में ‘सिटिजन्स मार्च’
4 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध और व्यापक हुआ. सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और आम नागरिकों के एक समूह ने इंडिया गेट से जंतर-मंतर की ओर मार्च करने की कोशिश की.
रविवार को भी बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात रहे. प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई.
इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग वही रही CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और SIR प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण.
वहीं, आंदोलन से जुड़े संगठनों और विपक्षी नेताओं ने संकेत दिया है कि विरोध आने वाले दिनों में भी जारी रह सकता है. INDIA ब्लॉक से जुड़े दलों ने 7 अक्टूबर को दिल्ली में चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर संयुक्त प्रदर्शन करने की घोषणा भी की है.
मुंबई में 2 अक्टूबर को क्या हुआ?
दिल्ली के साथ-साथ मुंबई में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ. 2 अक्टूबर को युवा संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग और SIR के खिलाफ प्रदर्शन किया.
इस संगठन के नेता अभिजीत दीपके ने मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए. प्रदर्शन में कलाकारों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की भागीदारी भी बताई गई.
AP की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंदोलन केवल SIR के मुद्दे से नहीं जुड़ा है. CJP पहले बेरोजगारी और परीक्षा पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर भी प्रदर्शन कर चुका है.
मुंबई में भी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी और कुछ मामलों में पुलिस कार्रवाई की गई.
3 अक्टूबर: मुंबई में भी जारी रहा विरोध
3 अक्टूबर को मुंबई में प्रदर्शन जारी रहा, हालांकि रविवार के मुकाबले यह अपेक्षाकृत छोटा रहा.
इस दौरान SIR और चुनाव आयोग को लेकर विपक्षी दलों तथा सामाजिक संगठनों की ओर से लगातार सवाल उठाए जाते रहे.
लेकिन 4 अक्टूबर को मुंबई में आंदोलन ने एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया.
4 अक्टूबर: उद्धव और राज ठाकरे एक मंच पर
4 अक्टूबर को मुंबई में ‘विराट गर्जना मोर्चा’ निकाला गया. इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत यह रही कि शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और MNS प्रमुख राज ठाकरे लंबे समय बाद एक ही मंच पर नजर आए.
मार्च में कांग्रेस और शरद पवार गुट वाली NCP (SP) के नेताओं की भी भागीदारी रही. आयोजकों ने लोगों से पार्टी के झंडों की जगह तिरंगा लेकर आने की अपील की थी.
मोर्चे में मुख्य मांग CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और महाराष्ट्र में SIR प्रक्रिया को लेकर थी.
राज ठाकरे ने SIR की वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे रद्द करने की मांग की. उन्होंने चुनाव में बैलेट पेपर की वापसी की मांग भी उठाई. दूसरी ओर उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए. ये सभी आरोप और मांगें राजनीतिक दलों के दावे हैं; चुनाव आयोग ने अनियमितता के आरोपों को खारिज किया है.
आखिर SIR को लेकर इतना विवाद क्यों?
इस पूरे विवाद की जड़ Special Intensive Revision यानी SIR है. चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना जरूरी है, ताकि मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके लोगों, डुप्लीकेट नामों या अन्य अयोग्य प्रविष्टियों को हटाया जा सके.
विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रक्रिया में दस्तावेजों और सत्यापन की शर्तों के कारण बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाता भी प्रभावित हो सकते हैं. उनका दावा है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है.
रॉयटर्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों से लाखों पात्र मतदाता प्रभावित हो सकते हैं और इसका राजनीतिक असर सत्तारूढ़ बीजेपी के पक्ष में जा सकता है. चुनाव आयोग और बीजेपी ने इन आरोपों से इनकार किया है.
विवाद में ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल
SIR विवाद के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग से जुड़े कुछ फैसलों में CEC की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल हैं.
इन याचिकाओं में SIR से जुड़े फैसलों, आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और कथित तौर पर अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों जैसे मुद्दे उठाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट में इन मामलों पर 5 अक्टूबर को सुनवाई होनी है. यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं हैं.
5 और 7 अक्टूबर भी अहम
तीन दिनों के विरोध के बाद मामला अब सड़क से अदालत और चुनाव आयोग के स्तर तक पहुंच गया है. एक तरफ विपक्षी दल CEC के इस्तीफे और SIR को लेकर विरोध तेज करने की तैयारी में हैं. दूसरी तरफ चुनाव आयोग अपने फैसले को मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ रहा है.
7 अक्टूबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक का प्रस्तावित प्रदर्शन और 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई इस विवाद की अगली महत्वपूर्ण कड़ियां हैं.
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देंगे या नहीं. असली सवाल यह भी है कि SIR को लेकर उठे कानूनी और राजनीतिक सवालों पर चुनाव आयोग तथा अदालत का रुख क्या रहता है और मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर आगे क्या दिशा तय होती है.
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