Delhi AQI Update: दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण बढ़ा, कई इलाकों में एक्यूआई 300 के पार
Delhi AQI Update: बीते दिनों दिल्ली-एनसीआर में बारिश होने के बाद से वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में सुधार देखने को मिला था. मगर एक बार फिर वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, शनिवार सुबह राष्ट्रीय राजधानी में वायु गुणवत्ता का स्तर 'खराब श्रेणी'में रहा. सुबह के वक्त करीब 7 बजे तक दिल्ली में औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 271 दर्ज किया गया है. ऐसे हालात पूरे शहर में देखने को मिला. अशोक विहार में AQI 309 रहा. बवाना में 271, बुराड़ी में 246 और चांदनी चौक में 285 दर्ज किया गया. द्वारका सेक्टर 8 में 329 और आईटीओ में 279, जबकि मुंडका और वजीरपुर में 331 दर्ज किया गया. ओखला फेज-2 में 323, रोहिणी में 312, पंजाबी बाग में 318 और आरके पुरम में 322 AQI दर्ज किया गया.
CPCB की रिपोर्ट के अनुसार, नरेला (232) और अलीपुर (227) में कम AQI दर्ज किया गया. AQI का लेवल पर नजर डालें तो 0 से 50 के बीच को 'अच्छा', 51 से 100 के बीच 'संतोषजनक', 101 से 200 के बीच 'मध्यम' श्रेणी का एक्यूआई माना जाता है. वहीं 201 से 300 के बीच 'खराब', 301 से 400 के बीच 'बेहद खराब' और 401 से 500 के बीच 'गंभीर' माना जाता है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के तहत उत्तर और मध्य भारत के कई हवाई अड्डों में कोहरा छाया रहा.
इंफेक्शन से फेल हो गए थे Lungs, फिर भी 48 घंटे तक जिंदा रहा मरीज! डॉक्टरों की अनोखी तकनीक से बची जान
अमेरिका में डॉक्टरों ने एक ऐसा इलाज किया है जिसे आधुनिक चिकित्सा का बड़ा चमत्कार माना जा रहा है. 33 साल के एक युवक को इन्फ्लूएंजा और एक ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरियल संक्रमण के कारण गंभीर लंग फेलियर हो गया था. उसकी हालत इतनी नाजुक हो गई थी कि सामान्य इलाज से उसे बचाना संभव नहीं लग रहा था. ऐसे में डॉक्टरों ने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी वजह से उस मरीज की जान बच गई.
गंभीर हालत में लिया गया बड़ा फैसला
युवक के दोनों फेफड़े पूरी तरह खराब हो चुके थे. वे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं दे पा रहे थे. इससे उसके दिल, किडनी और ब्लड प्रेशर पर भी असर पड़ने लगा था. डॉक्टरों की टीम ने जांच के बाद तय किया कि संक्रमित फेफड़ों को हटाना ही एकमात्र रास्ता है. यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि बिना फेफड़ों के इंसान का जिंदा रहना लगभग असंभव माना जाता है.
आर्टिफिशियल लंग सिस्टम बना सहारा
डॉक्टरों ने युवक को एक खास तरह के कस्टम एक्सटर्नल आर्टिफिशियल लंग सिस्टम से जोड़ा. यह सिस्टम शरीर के बाहर लगाया गया था. इसका काम खून को ऑक्सीजन देना और दिल में सामान्य ब्लड फ्लो बनाए रखना था. मशीन ने वही काम किया जो आमतौर पर फेफड़े करते हैं. इससे शरीर के दूसरे अंगों को जरूरी ऑक्सीजन मिलती रही.
48 घंटे बिना फेफड़ों के जिंदा रहा इंसान
इस सिस्टम की मदद से युवक 48 घंटे तक बिना फेफड़ों के जिंदा रहा. यह समय डॉक्टरों के लिए भी बड़ी चुनौती से कम नहीं था, लगातार उसकी निगरानी की गई. इस दौरान उसके दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर और किडनी की स्थिति में सुधार देखा गया. शरीर धीरे-धीरे स्थिर होने लगा. यह संकेत था कि इलाज सही दिशा में जा रहा है.
मेडिकल साइंस के लिए बड़ी उपलब्धि
इन 48 घंटों के बाद युवक को लंग ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया गया. डॉक्टरों ने नए फेफड़े लगाए और शरीर ने उन्हें स्वीकार करना शुरू कर दिया. यह पूरी प्रक्रिया मेडिकल साइंस के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक से भविष्य में गंभीर लंग फेलियर के मरीजों को नई उम्मीद मिल सकती है.
यह मामला सिर्फ एक मरीज की जान बचाने तक सीमित नहीं है. यह दिखाता है कि आधुनिक तकनीक और डॉक्टरों की मेहनत से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है. यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और नई जिंदगी की उम्मीद कर रहे हैं.
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