सोनभद्र में हैवानियत का खौफनाक अंत, दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग ने मृत बच्चे को जन्म दिया, ज्यादा खून बहने से उसकी भी मौत
सोनभद्र दुष्कर्म मामले में एक नाबालिग किशोरी की मौत हो गई. दुष्कर्म के बाद गर्भवती हुई पीड़िता ने मृत बच्चा जन्म दिया, जिसके बाद अत्यधिक रक्तस्राव से उसकी जान चली गई.
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2008 अहमदाबाद बम धमाका: SC ने इंडियन मुजाहिदीन सदस्य की फांसी पर रोक लगाई, गुजरात HC का फैसला पलटा
वर्ष 2008 में देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले अहमदाबाद शहर को दलाह देने वाले सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा अपडेट सामने आया है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को सुनवाई करते हुए इंडियन मुजाहिदीन (IM) के एक दोषी की फांसी की सजा पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी द्वारा दायर की गई याचिका पर यह कदम उठाया है और गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। बावा ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा उसे दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट का दखल और अहमद बावा की याचिका
2008 के अहमदाबाद बम धमाकों के इस सनसनीखेज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को मिलने वाली सजा के खिलाफ दाखिल की गई याचिकाओं पर गंभीरता से सुनवाई शुरू कर दी है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी की याचिका पर विचार करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और साथ ही इस मामले से जुड़े निचली अदालत के तमाम रिकॉर्ड भी तलब किए हैं। कोर्ट के इस अंतरिम आदेश से फिलहाल बावा की फांसी की सजा पर रोक लग गई है, जिससे इस कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ आ गया है।
गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 38 दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखना
इससे पहले 7 जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के इन सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों की मौत की सजा को बरकरार रखा था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या, खौफनाक साजिश रचने और देश में आतंक फैलाने के जुर्म में ये सभी मौत की सजा के हकदार हैं। इसके अलावा, अदालत ने 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा को भी यथावत रखा था, यह स्पष्ट करते हुए कि गुजरात और केरल के आतंकी कैंपों में इनकी संलिप्तता और रसद सहायता के पर्याप्त सबूत मिले हैं।
26 जुलाई 2008 के वे 70 मिनट और 56 बेकसूरों की मौत
यह पूरा मामला 26 जुलाई 2008 का है, जब अहमदाबाद के अलग-अलग हिस्सों में महज 70 मिनट के भीतर कुल 21 सिलसिलेवार धमाके किए गए थे। इन खौफनाक हमलों में 56 लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
इन हमलों की विभीषिका इस बात से भी समझी जा सकती है कि आतंकवादियों ने उन अस्पतालों को भी निशाना बनाया था जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। भारतीय इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी आतंकी हमले के दौरान चिकित्सा केंद्रों पर इस तरह से बम गिराए गए या धमाके किए गए हों।
हाईकोर्ट के फैसले के अन्य महत्वपूर्ण बिंदु और मुआवजा निर्देश
विशेष अदालत के फरवरी 2022 के फैसले को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि दोषियों ने न तो कोई पश्चाताप दिखाया है और न ही जेल में उनका आचरण सुधरा है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि नरमी बरतने का कोई आधार नहीं बनता।
इसके साथ ही, अदालत ने गुजरात सरकार को यह भी निर्देश दिया था कि वह 30 मार्च, 2027 से पहले मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे। इस पूरे षड्यंत्र में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के पूर्व नेता सफदर नागौरी सहित देश के 11 राज्यों के आरोपी शामिल थे।
78 लोगों पर चला था सामूहिक मुकदमा और ऐतिहासिक फैसला
इस बड़े आतंकी मामले में कुल 78 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया था। जांच एजेंसियों ने अहमदाबाद धमाकों से जुड़ी 20 एफआईआर और सूरत में मिले बिना फटे बमों से जुड़ी 15 एफआईआर समेत कुल 35 मामलों को आपस में जोड़ दिया था। विशेष अदालत ने फरवरी 2022 में इनमें से 49 लोगों को दोषी करार दिया था, जिसमें से 38 को एक साथ फांसी की सजा सुनाई गई थी।
न्यायिक इतिहास में यह पहला ऐसा मौका था जब किसी एक मामले में इतनी बड़ी संख्या में दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई हो, जिससे पहले केवल राजीव गांधी हत्याकांड में टाडा अदालत द्वारा ऐसा फैसला सुनाया गया था।
आतंकवाद के खिलाफ कानूनी लड़ाई और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में रिकॉर्ड तलब किए जाने और एक दोषी की फांसी की सजा पर रोक लगाए जाने के बाद अब यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के विचाराधीन है।
आतंकवाद के मामलों में त्वरित न्याय और कठोर सजा के प्रावधानों के बीच, सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि निचली अदालत और हाईकोर्ट के स्तर पर अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों का मूल्यांकन नियमों के तहत पूरी तरह सटीक था या नहीं। इस मामले की आगामी सुनवाइयों पर देश भर की कानूनी और राजनीतिक निगाहें टिकी रहेंगी।
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