Delhi High Court का फैसला: सिर्फ वैध वीजा होने से विदेशी को नहीं मिलता भारत में प्रवेश का कानूनी अधिकार
नयी दिल्ली, एक अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश पाने का कोई स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं है और न ही वह ऐसे अधिकार का कानूनी रूप से दावा कर सकता है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि वैधानिक व्यवस्था के तहत वीजा होने मात्र से भारत में प्रवेश का पूर्ण और बिना शर्त अधिकार नहीं मिल जाता। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने 30 सितंबर को पारित एक आदेश में कहा, ‘‘...वैधानिक व्यवस्था में ऐसी परिस्थितियों का स्पष्ट प्रावधान है जिनमें आवश्यक यात्रा दस्तावेज होने के बावजूद किसी विदेशी नागरिक को निर्दिष्ट आधारों पर भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, किसी अन्य देश के भारत के साथ संबंध और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े कारणों के अलावा केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अन्य आधार भी शामिल हैं।’’ अदालत ने कहा कि वीजा जारी करना, प्रवेश की अनुमति देने से इनकार करना या आव्रजन मंजूरी देना सरकार का संप्रभु कार्य है और इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति एवं प्रशासनिक विवेक से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। अदालत ने तुर्कमेनिस्तान की एक महिला की याचिका खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। महिला ने केंद्र को यह निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया था कि वह उसे 25 मार्च को भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं देने के कारणों का उल्लेख करते हुए एक लिखित और तर्कसंगत आदेश दे।
याचिकाकर्ता ने उसके कारोबारी वीजा के आधार पर उसे भारत में प्रवेश की अनुमति देने का निर्देश दिए जाने का भी अनुरोध किया था। महिला ने कहा कि उसके पास वैध पासपोर्ट और कारोबारी वीजा था लेकिन इसके बावजूद उसे भारत में प्रवेश नहीं दिया गया और तुर्कमेनिस्तान वापस भेज दिया गया जबकि उसके साथ यात्रा कर रहे उसके पति को भारत में प्रवेश की अनुमति मिल गई थी। प्राधिकारियों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केवल वैध वीजा होने के आधार पर किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश का कोई निहित या ऐसा अधिकार नहीं मिलता जिसे छीना नहीं जा सके।
प्राधिकारियों के वकील ने दलील दी कि वीजा जारी किया जाना और भारत में प्रवेश की अनुमति मिलना दो अलग-अलग विषय हैं। उन्होंने कहा कि प्रवेश की अनुमति आव्रजन संबंधी वैधानिक व्यवस्था और सक्षम प्राधिकारियों को दी गई शक्तियों के अधीन होती है। वकील ने कहा कि महिला के संबंध में प्रतिकूल सूचनाएं मिली थीं जिसके बाद सक्षम आव्रजन प्राधिकारी ने यह निर्णय लिया कि उसे भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में लिया गया। प्राधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि महिला द्वारा उसके माता-पिता और पति के बारे में दिए गए विवरण में विसंगति थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि यात्रा के उद्देश्य के संबंध में उसके पास न तो कोई ‘बिजनेस कार्ड’ था और न ही कोई निमंत्रण पत्र।
वह अपने देश में अपने कारोबार से संबंधित विवरण भी नहीं दे सकी और कारोबारी वीजा हासिल करने के बावजूद उसने खुद को ‘गृहिणी’ बताया था।
Delhi Court ने Cyber Fraud के आरोपियों को दी Bail, गिरफ्तारी की भाषा पर उठाए सवाल
दिल्ली की एक अदालत ने 1.15 करोड़ रुपये के कथित साइबर फ्रॉड मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों को रेगुलर ज़मानत दे दी है। अदालत ने कहा कि उन्हें हिरासत में रखने का कोई फ़ायदा नहीं है और यह भी देखा कि उनकी गिरफ़्तारी की वजह उन्हें उस भाषा में नहीं बताई गई थी जिसे वे समझते और जानते हैं। एडिशनल सेशंस जज सौरभ प्रताप सिंह लालर ने योगेशभाई और अमित गोहिल की ज़मानत अर्ज़ी मंज़ूर कर ली। इन दोनों को 2 सितंबर को गुजरात के भावनगर में गिरफ़्तार किया गया था। यह गिरफ़्तारी नई दिल्ली के स्पेशल सेल पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के सिलसिले में हुई थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 308, 318(4), 319 और 340 के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया था। आरोपियों की ओर से वकील सैयद कामरान अली और यूसुफ़ खान पेश हुए। अदालत ने आदेश दिया कि दोनों आवेदकों को 50,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक ज़मानत (श्योरिटी) भरने पर रेगुलर ज़मानत पर रिहा किया जाए, साथ ही कुछ शर्तें भी लगाई गईं।
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कोर्ट ने खास तौर पर इस बात की जांच की कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार किस तरह बताए गए थे। कोर्ट ने देखा कि वह दस्तावेज़ हिंदी में तैयार किया गया था, जिसमें अंग्रेज़ी शब्द और बैंकिंग से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी। दोनों आवेदकों ने गुजराती-मीडियम स्कूलों में प्राइमरी लेवल तक पढ़ाई की थी और हिंदी उनके विषयों में से एक थी। जांच अधिकारी ने कहा था कि आवेदक हिंदी समझते थे और गिरफ्तारी के आधारों की कॉपी उनके परिवार वालों को भी दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले को संवैधानिक ज़रूरत के नज़रिए से देखा, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी आज़ादी छीनने के कारणों के बारे में ठीक से जानकारी देना ज़रूरी है। पंकज बंसल बनाम भारत संघ और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का ज़िक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ज़रूरत सिर्फ़ गिरफ्तारी के आधार वाला दस्तावेज़ सौंपने की नहीं थी, बल्कि यह पक्का करने की भी थी कि गिरफ्तार व्यक्ति गिरफ्तारी के कारणों को असल में समझे, ताकि वह वकील से सलाह ले सके और सही कानूनी उपाय अपना सके।
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कोर्ट ने गिरफ्तारी वाले दिन ही 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस के मामले पर भी विचार किया। कोर्ट ने 'अमनदीप सिंह जौहर बनाम दिल्ली राज्य' मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस प्रावधान में नोटिस मिलने और गिरफ्तारी के बीच कोई तय न्यूनतम समय-सीमा नहीं बताई गई है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि साइबर और डिजिटल धोखाधड़ी की जांच में मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में मौजूद सबूत शामिल हो सकते हैं, जिन्हें डिलीट या दूर से ही मिटाया (रिमोटली वाइप) जा सकता है। इसलिए, उचित मामलों में कस्टडी में पूछताछ ज़रूरी हो सकती है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को यह देखना होगा कि क्या मामले के तथ्यों के आधार पर ऐसी कस्टडी वास्तव में ज़रूरी है।
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