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US vs India Tariff War | वैश्विक अर्थव्यवस्था का ‘सरदार’ कैसे बना अमेरिका | Teh Tak Chapter 4

किसी भी देश की इकोनॉमी को पता करने के लिए सबसे बड़ा पैमाना जीडीपी होती है। यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ ही सबसे रईस देश भी है। साल 1960 से लेकर 2023 तक यूएस ने अपनी इस खिताब को सहेज कर रखा है। इसकी अर्थव्यवस्था सेवाओं, विनिर्माण, वित्त और प्रौद्योगिकी सहित कई दूसरे महत्वपूर्ण सेक्टरों द्वारा संचालित होती है और काफी विविध है। वॉशिंगटन में लिए गए नीतिगत फैसले, वॉल स्ट्रीट की गतिविधियाँ और सिलिकॉन वैली में होने वाले नवाचार अक्सर पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं। चाहे ये देश विकसित हो या फिर विकाशील। अमेरिका की आर्थिक ताकत का एक बड़ा आधार उसका मजबूत उपभोक्ता बाजार है। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में से एक है, जो एशिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के देशों से बड़ी मात्रा में सामान और सेवाएँ खरीदता है। कई देशों की अर्थव्यवस्था, रोजगार और उद्योगों की वृद्धि काफी हद तक अमेरिकी बाजार तक पहुँच पर निर्भर करती है। इसलिए अमेरिका की मांग और नीतियाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत मायने रखती हैं। 
अमेरिका समझ चुका था कि डॉलर में बहुत ताकत है, लेकिन वह इसे सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं रखना चाहता था। लक्ष्य था कि दुनिया में हर बड़ा व्यापार डॉलर में हो। अमेरिकी डॉलर का दुनिया की मुख्य रिज़र्व मुद्रा होना, अमेरिका की वैश्विक आर्थिक ताकत को और मजबूत बनाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल और सोने जैसी वस्तुओं की खरीद-फरोख्त और ज्यादातर वैश्विक वित्तीय लेन-देन अमेरिकी डॉलर में ही होते हैं। इससे अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था, खासकर फेडरल रिज़र्व, दुनिया भर में धन की उपलब्धता, ब्याज दरों और आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद अहम बन जाती है। अमेरिका की मौद्रिक नीति में थोड़ा-सा बदलाव भी दुनिया भर में पूंजी के प्रवाह, मुद्रा विनिमय दरों और महंगाई पर तुरंत असर डाल सकता है।
नवाचार और तकनीकी नेतृत्व भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका का बड़ा योगदान है। सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एयरोस्पेस, दवाइयों और वित्त जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियाँ अग्रणी भूमिका निभाती हैं। अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूसरे देशों में बड़े पैमाने पर निवेश करती हैं, तकनीक साझा करती हैं और दुनिया भर में लाखों नौकरियाँ पैदा करती हैं। इससे उत्पादकता बढ़ती है और कई देशों में आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण को गति मिलती है। इसके अलावा, अमेरिका अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी नेतृत्व की भूमिका निभाता है। इन मंचों के माध्यम से अमेरिका वैश्विक आर्थिक नियम तय करने, आर्थिक संकटों से निपटने की व्यवस्था बनाने और विकास के लिए वित्तीय सहायता देने में अहम योगदान देता है, खासकर जब दुनिया आर्थिक मंदी का सामना कर रही होती है।

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भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो अमेरिका, भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में से एक है। यह भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाओं, दवाइयों, इंजीनियरिंग सामान, वस्त्र तथा हीरा-जवाहरात के लिए। भारत के आईटी और सेवा क्षेत्र में लाखों नौकरियाँ अमेरिकी कंपनियों की मांग पर निर्भर करती हैं। इसलिए रोजगार और विदेशी मुद्रा कमाने के लिहाज से अमेरिकी बाजार भारत के लिए बेहद जरूरी है। तकनीक और नवाचार भी भारत के लिए अमेरिका की अहमियत का एक बड़ा पहलू है। अमेरिकी कंपनियाँ भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम, मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा और डिजिटल ढांचे में बड़े निवेशक हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग से भारत को अपने उद्योगों को मजबूत करने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में ऊँचे स्तर तक पहुँचने में मदद मिल रही है। 
अमेरिका में रहने वाला भारतीय प्रवासी समुदाय भी दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को और मजबूत बनाता है। भारतीय पेशेवर अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं। इसके साथ-साथ वे भारत में पैसा भेजते हैं (रेमिटेंस), व्यापारिक साझेदारियाँ बनाने में मदद करते हैं और अपना ज्ञान व अनुभव भारत तक पहुँचाते हैं। यह मानवीय जुड़ाव भारत-अमेरिका के बीच व्यापार और नवाचार के नेटवर्क को और मजबूत करता है।

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बहरहाल, भारत के लिए अमेरिका सिर्फ एक वैश्विक आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आर्थिक साझेदार भी है। अमेरिका की मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था भारत के निर्यात, विदेशी निवेश, तकनीकी विकास और कुल आर्थिक स्थिरता को सहारा देती है। इसलिए भारत के आर्थिक भविष्य के लिए अमेरिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण और अपरिहार्य है।

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