नींद की कमी छीन सकती है चेहरे और बालों की चमक, जान लें इसके बड़े नुकसान
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। बाजार में एक से बढ़कर एक प्रोडक्ट मौजूद हैं, जो बालों और स्किन की सुंदरता और मजबूती को बढ़ाने का वादा करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये महंगे प्रोडक्ट भी बेकार हैं जब तक नींद पूरी न हो?
नींद की कमी बालों और त्वचा को नुकसान पहुंचाती है, जिसकी भरपाई महंगे प्रोडक्ट भी नहीं कर पाते। जब शरीर को पूरी नींद नहीं मिलती है, तो पूरा शरीर प्रभावित होता है और इसका असर धीरे-धीरे चेहरे और बालों पर दिखना शुरू हो जाता है। नींद की कमी से चेहरे का रिपेयर सिस्टम कमजोर हो जाता है, कोलेजन कम बनने लगता है। झुर्रियां जल्दी दिखने लगती हैं या यूं कहें कि उम्र से पहले ही बुढ़ापा आ जाता है और चेहरे पर पिंपल होने लगते हैं।
वहीं, बाल झड़ने लगते हैं, बालों में रुखापन बढ़ जाता है और बाल समय से पहले सफेद हो जाते हैं और सबसे बड़ा नुकसान यह है कि नींद की कमी स्ट्रेस हार्मोन को ट्रिगर करती है, जिससे बिना कारण अवसाद और चिंता महसूस होने लगती है और चिड़चिड़ापन होने लगता है।
नींद की कमी से शरीर में सबसे पहले हार्मोन असंतुलित होता है और धीरे-धीरे नींद की कमी से पाचन की गति भी धीमी हो जाती है। पाचन की कमी से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता और उसका प्रभाव भी बालों को जड़ों से कमजोर बनाता है। इसलिए खूबसूरत स्किन और बाल सिर्फ महंगे प्रोडक्ट से नहीं मिलते हैं, बल्कि पूरी नींद से मिलते हैं।
पूरी नींद से शरीर को मरम्मत का पूरा समय मिलता है। रात के समय ली गई नींद शरीर को डिटॉक्स करने का काम करती है और शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है। विषाक्त पदार्थों के बाहर निकलने की प्रक्रिया चेहरे की रंगत और रक्त की शुद्धि को बढ़ाती है और चेहरा चांद सा खिल उठता है।
8 घंटे की नींद को हमेशा ब्यूटी स्लीप कहा जाता है। 8 घंटे की नींद के बाद मस्तिष्क हैप्पी हॉर्मोन का उत्पादन ज्यादा करता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। स्ट्रेस पर नियंत्रण बालों के झड़ने पर लगाम लगाता है और साथ ही चेहरे पर झुर्रियां भी नहीं आती।
--आईएएनएस
पीएस/वीसी
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बांग्लादेश चुनाव: रोहिंग्या कैंप नहीं होंगे सील, बहुस्तरीय सुरक्षा पर जोर
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले खुफिया एजेंसियों ने रोहिंग्या शरणार्थियों के आपराधिक व राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल की आशंका जताई है। इसके बावजूद चुनाव के दौरान रोहिंग्या कैंपों को पूरी तरह सील करने के चुनाव आयोग के प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार कैंपों पर पूर्ण लॉकडाउन के बजाय लेयर्ड (बहुस्तरीय) सुरक्षा व्यवस्था अपनाने के पक्ष में है।
ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, खुफिया एजेंसी का मानना है कि कॉक्स बाजार में फैले रोहिंग्या कैंपों का विशाल क्षेत्रफल और कमजोर बुनियादी ढांचा- जैसे सीमांकन दीवारें और निगरानी प्रणालियां कैंप सील करने जैसे कदम को लागू करने में बाधा बनता है। यहां सैकड़ों हजार रोहिंग्या 2017 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में सैन्य कार्रवाई के बाद शरण लेकर रह रहे हैं। संख्या बढ़ने के साथ कुछ शरणार्थी भारत के सीमावर्ती राज्यों की ओर भी पहुंचे हैं।
इस महीने की शुरुआत में बांग्लादेश के चुनाव आयुक्त अबुल फजल मोहम्मद सनाउल्लाह ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान रोहिंग्या कैंपों को सील करने और सीमा नियंत्रण कड़ा करने का सुझाव दिया था। आशंका थी कि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने या प्रक्रिया में व्यवधान डालने के लिए शरणार्थियों का दुरुपयोग किया जा सकता है।
8 जनवरी को विदेश मंत्रालय की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय टास्क फोर्स की बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि चुनाव के दौरान रोहिंग्याओं का किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। हालांकि, कैंप सील करने के बजाय उन्हें ‘सुरक्षा घेरे’ में रखने पर जोर दिया गया।
खुफिया एजेंसी की 22 जनवरी को गृह मंत्रालय को सौंपी गई आकलन रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंपों को सील करना “अवास्तविक” है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि रोहिंग्याओं को तोड़फोड़ गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही, समय-समय पर कुछ रोहिंग्याओं के मतदाता सूची में कथित अवैध रूप से शामिल होने के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे फर्जी मतदान की संभावना जताई गई है। उन्हें रैलियों, प्रचार या अन्य चुनावी गतिविधियों में खींचे जाने का खतरा भी बताया गया है।
इन जोखिमों के बीच एजेंसी ने बहुस्तरीय सुरक्षा योजना की सिफारिश की है। इसमें कैंपों में क्षतिग्रस्त सीसीटीवी कैमरों और सीमा दीवारों की मरम्मत व सक्रियता, चुनाव से सात दिन पहले कैंपों से मतदान केंद्रों तक जाने वाले मार्गों पर चेकपोस्ट स्थापित करना और कैंप से बाहर पाए जाने वाले रोहिंग्याओं को हिरासत में लेना शामिल है। साथ ही, अवैध हथियारों की बरामदगी के लिए छापेमारी, चुनाव अवधि में सुरक्षा बलों की तैनाती सुनिश्चित करना और राजनीतिक दलों को रोहिंग्याओं को चुनावी गतिविधियों में शामिल न करने की सख्त चेतावनी देने की भी सिफारिश की गई है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया को लेकर वोट में हेरफेर, सुरक्षा बलों की निष्पक्षता और प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच विवाद जैसे आरोप लग रहे हैं। चुनाव आयोग ने देशभर में 12.77 करोड़ से अधिक मतदाताओं का पंजीकरण किया है, लेकिन मतदाता सूची में रोहिंग्याओं की संभावित मौजूदगी को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
इधर, बांग्लादेश में चुनावों के दौरान राजनीति में धर्म के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई जा रही है। एक ऑनलाइन बंगाली समाचार पोर्टल में प्रकाशित लेख में कहा गया कि लंबे समय से लोकतांत्रिक माहौल के अभाव, धार्मिक कट्टरता और कट्टर राजनीतिक ताकतों के उभार ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। लेख में कुछ नेताओं द्वारा चुनावी प्रतीकों के समर्थन पर “जन्नत” का वादा करने और इस्लामी कानून लागू करने जैसे दावों का भी उल्लेख किया गया है।
--आईएएनएस
डीएससी
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