बांग्लादेश चुनाव: रोहिंग्या कैंप नहीं होंगे सील, बहुस्तरीय सुरक्षा पर जोर
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले खुफिया एजेंसियों ने रोहिंग्या शरणार्थियों के आपराधिक व राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल की आशंका जताई है। इसके बावजूद चुनाव के दौरान रोहिंग्या कैंपों को पूरी तरह सील करने के चुनाव आयोग के प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार कैंपों पर पूर्ण लॉकडाउन के बजाय लेयर्ड (बहुस्तरीय) सुरक्षा व्यवस्था अपनाने के पक्ष में है।
ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, खुफिया एजेंसी का मानना है कि कॉक्स बाजार में फैले रोहिंग्या कैंपों का विशाल क्षेत्रफल और कमजोर बुनियादी ढांचा- जैसे सीमांकन दीवारें और निगरानी प्रणालियां कैंप सील करने जैसे कदम को लागू करने में बाधा बनता है। यहां सैकड़ों हजार रोहिंग्या 2017 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में सैन्य कार्रवाई के बाद शरण लेकर रह रहे हैं। संख्या बढ़ने के साथ कुछ शरणार्थी भारत के सीमावर्ती राज्यों की ओर भी पहुंचे हैं।
इस महीने की शुरुआत में बांग्लादेश के चुनाव आयुक्त अबुल फजल मोहम्मद सनाउल्लाह ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान रोहिंग्या कैंपों को सील करने और सीमा नियंत्रण कड़ा करने का सुझाव दिया था। आशंका थी कि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने या प्रक्रिया में व्यवधान डालने के लिए शरणार्थियों का दुरुपयोग किया जा सकता है।
8 जनवरी को विदेश मंत्रालय की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय टास्क फोर्स की बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि चुनाव के दौरान रोहिंग्याओं का किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। हालांकि, कैंप सील करने के बजाय उन्हें ‘सुरक्षा घेरे’ में रखने पर जोर दिया गया।
खुफिया एजेंसी की 22 जनवरी को गृह मंत्रालय को सौंपी गई आकलन रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंपों को सील करना “अवास्तविक” है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि रोहिंग्याओं को तोड़फोड़ गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही, समय-समय पर कुछ रोहिंग्याओं के मतदाता सूची में कथित अवैध रूप से शामिल होने के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे फर्जी मतदान की संभावना जताई गई है। उन्हें रैलियों, प्रचार या अन्य चुनावी गतिविधियों में खींचे जाने का खतरा भी बताया गया है।
इन जोखिमों के बीच एजेंसी ने बहुस्तरीय सुरक्षा योजना की सिफारिश की है। इसमें कैंपों में क्षतिग्रस्त सीसीटीवी कैमरों और सीमा दीवारों की मरम्मत व सक्रियता, चुनाव से सात दिन पहले कैंपों से मतदान केंद्रों तक जाने वाले मार्गों पर चेकपोस्ट स्थापित करना और कैंप से बाहर पाए जाने वाले रोहिंग्याओं को हिरासत में लेना शामिल है। साथ ही, अवैध हथियारों की बरामदगी के लिए छापेमारी, चुनाव अवधि में सुरक्षा बलों की तैनाती सुनिश्चित करना और राजनीतिक दलों को रोहिंग्याओं को चुनावी गतिविधियों में शामिल न करने की सख्त चेतावनी देने की भी सिफारिश की गई है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया को लेकर वोट में हेरफेर, सुरक्षा बलों की निष्पक्षता और प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच विवाद जैसे आरोप लग रहे हैं। चुनाव आयोग ने देशभर में 12.77 करोड़ से अधिक मतदाताओं का पंजीकरण किया है, लेकिन मतदाता सूची में रोहिंग्याओं की संभावित मौजूदगी को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
इधर, बांग्लादेश में चुनावों के दौरान राजनीति में धर्म के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई जा रही है। एक ऑनलाइन बंगाली समाचार पोर्टल में प्रकाशित लेख में कहा गया कि लंबे समय से लोकतांत्रिक माहौल के अभाव, धार्मिक कट्टरता और कट्टर राजनीतिक ताकतों के उभार ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। लेख में कुछ नेताओं द्वारा चुनावी प्रतीकों के समर्थन पर “जन्नत” का वादा करने और इस्लामी कानून लागू करने जैसे दावों का भी उल्लेख किया गया है।
--आईएएनएस
डीएससी
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केंद्रीय बजट 2026 से उद्योगों की बड़ी उम्मीदें; मैन्युफैक्चरिंग, पीएलआई, निर्यात और निवेश पर हो फोकस
नई दिल्ली, 24 जनवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय बजट 2026 पेश होने में अब बस कुछ ही दिन शेष बचे हैं। इससे पहले उद्योग जगत की निगाहें सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर टिकी हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में जेटवर्क के को-फाउंडर और सीईओ अमृत आचार्य ने आईएएनएस से बात की और इस बजट से कई उम्मीदें जताई हैं।
अमृत आचार्य ने कहा कि केंद्र सरकार को यूनियन बजट 2026 में सार्वजनिक पूंजीगत खर्च को लगातार बढ़ाते रहना चाहिए। हर साल रेलवे, सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर और सोलर जैसी परियोजनाओं पर सरकार का भारी खर्च मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मांग को बढ़ाने का बड़ा जरिया बनता है। सरकार खुद एक बड़ा खरीदार है, जिससे घरेलू उद्योगों को सीधा फायदा मिलता है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से बजट में सार्वजनिक निवेश लगातार बढ़ा है और यही रफ्तार आगे भी बनी रहनी चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश से न सिर्फ उद्योगों को ऑर्डर मिलते हैं, बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलती है।
उन्होंने बताया कि बीते कुछ वर्षों में सरकार का फोकस प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) जैसी नीतियों पर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है। चाहे इलेक्ट्रॉनिक्स हों, सोलर सेक्टर हो या ऑटो कंपोनेंट्स-पीएलआई ने मैन्युफैक्चरिंग को नई दिशा दी है और इसके सकारात्मक नतीजे अब दिखने लगे हैं।
अमृत आचार्य ने आगे कहा कि अब अगला कदम सिर्फ मेक इन इंडिया फॉर इंडिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मेक इन इंडिया फॉर ग्लोबल मार्केट की सोच अपनानी होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अलग से विशेष प्रोत्साहन योजनाएं लानी चाहिए, ताकि भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकें।
उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सरकार समर्थित बीमा और क्रेडिट स्कीम्स हैं, जो निर्यातकों को जोखिम से सुरक्षा देती हैं। भारत में भी इसी तरह की किसी व्यवस्था की जरूरत है, ताकि निर्यातक अमेरिका और अन्य देशों में सामान भेजते समय ज्यादा आत्मविश्वास के साथ काम कर सकें।
अमृत आचार्य ने यह भी कहा कि भारत में पूंजी की लागत यानी लोन और फंडिंग अभी कई देशों के मुकाबले ज्यादा है। यदि सरकार आने वाले वर्षों में इसे कम करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कदम उठाती है, तो उद्यमियों का जोखिम उठाने का साहस बढ़ेगा और निवेश में तेजी आएगी।
उन्होंने सरकार की नीति व्यवस्था की तारीफ करते हुए कहा कि मौजूदा नीति माहौल सहयोगी, स्थिर और दूरदर्शी है। सरकार उद्योग की बात सुनती है और एक बार लिए गए फैसलों को वापस नहीं लेती। पीएलआई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहां शुरुआती वर्षों में भले नतीजे न दिखें, लेकिन लंबे समय में इसका बड़ा असर सामने आता है।
आचार्य ने कहा कि आज भारत आईफोन समेत मोबाइल का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है और यह पीएलआई जैसी नीतियों के बिना संभव नहीं था। अब सरकार पीएलआई 2.0 के जरिए सिर्फ असेंबली नहीं, बल्कि कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर भी जोर दे रही है, जिससे सोलर और अन्य उद्योगों को भी फायदा मिलेगा।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट 2026 से उनकी दो बड़ी अपेक्षाएं हैं। पहली, सार्वजनिक पूंजीगत खर्च में निरंतर बढ़ोतरी और दूसरी, निर्यातकों के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं। उनका मानना है कि इन्हीं कदमों से भारत की मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई रफ्तार मिलेगी।
--आईएएनएस
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