Xi Jinping US Visit: अभी तो सिर्फ ट्रेलर सामने आया है, पूरी पिक्चर दिसम्बर में सामने आयेगी, तब दुनिया का हैरान होना तय है
वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए जिस स्तर का राजकीय सम्मान दिखाया गया, उसे देखकर पूरी दुनिया हतप्रभ है। लेकिन सितम्बर में अमेरिका में दिखी यह कूटनीति सिर्फ ट्रेलर है क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है जोकि दिसम्बर में दिखाई जायेगी। वैसे वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत का दृश्य मई में बीजिंग में हुए ट्रंप-शी शिखर संवाद की याद दिला रहा है। जिस तरह चीन यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने ट्रंप का भव्य स्वागत किया था और बाद में झोंगनानहाई में स्वयं उनकी अगवानी की थी, उसी तरह अब अमेरिका पहुंचने पर ट्रंप ने प्रोटोकॉल से हटकर ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर स्वयं शी जिनपिंग का स्वागत किया। सैन्य बैंड, लाल कालीन, सम्मान गार्ड और लड़ाकू विमान के फ्लाईपास्ट के बीच हुआ यह स्वागत केवल राजकीय औपचारिकता नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन संबंधों में चल रही कूटनीतिक गर्माहट का बड़ा संकेत माना जा रहा है। साथ ही करीब छह दशक में किसी विदेशी नेता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से बेस पर इस तरह की व्यक्तिगत अगवानी असाधारण मानी जा रही है।
देखा जाये तो शी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन के रिश्ते प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच एक नए संतुलन की तलाश में हैं। व्यापार शुल्क, दुर्लभ खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेदों का कारण बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्ष अब टकराव को नियंत्रित रखने और बातचीत जारी रखने पर जोर दे रहे हैं। व्यापार युद्ध के बाद बनी अस्थायी व्यापार-समझ को आगे बढ़ाने की कोशिश भी इसी दिशा का संकेत है।
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शी जिनपिंग ने भी साफ संकेत दिया है कि चीन और अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी की बजाय साझेदार के रूप में संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्याधुनिक तकनीक में दोनों के बीच होड़ जारी है, ताइवान का प्रश्न बेहद संवेदनशील बना हुआ है और व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखला को लेकर भी मतभेद कायम हैं। इसलिए वॉशिंगटन में हो रही बातचीत को पूर्ण समझौते की बजाय तनाव कम करने और संबंधों को स्थिर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारत और रूस। दिसंबर में ट्रंप की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से होने की संभावनाएं भी सामने आ रही हैं। मोदी के दिसंबर में अमेरिका जाने की संभावना है, जहां चौदह और पंद्रह दिसंबर को फ्लोरिडा में होने वाली जी-20 बैठक के दौरान उनकी ट्रंप से द्विपक्षीय बातचीत हो सकती है।
वहीं रूस ने अभी पुतिन-ट्रंप दिसंबर शिखर बैठक की पुष्टि नहीं की है। लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अनुसार पुतिन को दिसंबर में मियामी में होने वाली जी-20 बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है और वहां ट्रंप के साथ मुलाकात की संभावना है। हालांकि क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और बैठक के एजेंडे पर चर्चा करना भी जल्दबाजी होगी।
देखा जाये तो इन संभावित मुलाकातों को हाल में नई दिल्ली में संपन्न हुए अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संदर्भ में देखना खासा महत्वपूर्ण है। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन में नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच जिस स्तर का संवाद और सार्वजनिक गर्मजोशी दिखाई दी, उसने वैश्विक कूटनीति में खासा ध्यान खींचा। मोदी और शी ने द्विपक्षीय संबंधों, सीमा शांति, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की, जबकि मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की।
ब्रिक्स सम्मेलन की तस्वीरें भी अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश थीं। एक ओर भारत और रूस के बीच मजबूत रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर भारत और चीन के बीच लंबे तनाव के बाद संवाद की वापसी। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण में मोदी, पुतिन और शी की साथ दिखाई देने वाली तस्वीरों को बदलती वैश्विक शक्ति समीकरणों के प्रतीक के रूप में देखा गया।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें ट्रंप की रणनीति को समझा जा सकता है। अमेरिका के सामने अब ऐसी दुनिया है जहां चीन, रूस और भारत तीनों के साथ उसके अलग-अलग स्तर के हित, मतभेद और संभावित सहयोग मौजूद हैं। चीन के साथ व्यापार और तकनीक, रूस के साथ यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा, जबकि भारत के साथ व्यापार, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग, तीनों रिश्ते एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं।
भारत के मामले में रूस से उसके ऊर्जा संबंध और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता एक साथ चल रही हैं। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव ने दोनों देशों के बीच आर्थिक बातचीत को जटिल बनाया है। ऐसे में मोदी-ट्रंप वार्ता में व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं।
इसलिए दिसंबर का संभावित कूटनीतिक दौर केवल अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातों की श्रृंखला नहीं होगा। सितंबर के नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और शी की जुगलबंदी के बाद अब ट्रंप के सामने इन तीनों शक्तियों के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग मोर्चों पर संभालने की चुनौती है। वॉशिंगटन में शी का भव्य स्वागत इसी व्यापक कूटनीतिक गणित की शुरुआत माना जा सकता है, जहां अमेरिका टकराव के साथ-साथ संवाद और समझौते के रास्ते भी खुले रखना चाहता है।
-नीरज कुमार दुबे
Modi के Gujarat की Hilsa Fish के आयात पर Tarique Rahman ने लगा दी रोक, India-Bangladesh रिश्तों में आई नई टेंशन
भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में हिलसा की स्थानीय पकड़ पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले कमजोर हुई है और वहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बांग्लादेशी मछुआरा महासंघ के अध्यक्ष रवींद्रनाथ बर्मन ने आरोप लगाया कि कुछ व्यापारियों ने भारत की गुजरात वाली हिलसा को बांग्लादेशी हिलसा बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे उपभोक्ताओं के साथ धोखा हुआ।
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लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है।
विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है।
इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है।
यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है।
भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया।
वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है।
देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा।
बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा?
-नीरज कुमार दुबे
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