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Modi के Gujarat की Hilsa Fish के आयात पर Tarique Rahman ने लगा दी रोक, India-Bangladesh रिश्तों में आई नई टेंशन

भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में हिलसा की स्थानीय पकड़ पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले कमजोर हुई है और वहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बांग्लादेशी मछुआरा महासंघ के अध्यक्ष रवींद्रनाथ बर्मन ने आरोप लगाया कि कुछ व्यापारियों ने भारत की गुजरात वाली हिलसा को बांग्लादेशी हिलसा बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे उपभोक्ताओं के साथ धोखा हुआ।

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लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है।

विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है।

इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है।

यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है।

भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया।

वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है।

देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा।

बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा?

-नीरज कुमार दुबे

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जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से भारत की तरक्की का जश्न मनाने के लिए कहते हुए 7.8% की शानदार जीडीपी ग्रोथ के लिए बधाई दी। सवाल यह है कि क्या आम आदमी देश में जीडीपी ग्रोथ को समझता है। क्या जीडीपी बढ़ना देश की मौजूदा समस्याओं के समाधान का कोई पैमाना है। देश में जब प्रधानमंत्री जीडीपी बढ़ोतरी की घोषणा कर रहे थे, उसी दिन कमर्शियल एलपीजी के दाम में बढ़ोतरी हो गई है। दिल्ली में इसके दाम में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2747.50 रुपये, मुंबई में 2701 रुपये और चेन्नई में 2916.50 रुपये हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर के महंगे होने से होटल, ढाबे आदि में खाना-पीना महंगा होना तय है। वहीं घर मिलने वाली चीजों के दाम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा 5 किलो वाले गैस सिलेंडर का भी दाम 2 रुपये बढ़कर 764 रुपये हो गया है।

मुंबई और तमिलनाडु में दूध महंगा हो गया है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने थोक दूध की कीमतों में 9 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इससे दूध की थोक दर 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये प्रति लीटर हो गई है। भारत में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.52% हो गई है, जिसके कारण चीनी, प्याज, टमाटर, दाल और खाना पकाने के तेल जैसी जरूरी रसोई की चीजें महंगी हो गई हैं. चावल और दूध के दाम भी स्थिर से लेकर उच्च स्तर पर बने हुए हैं।

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महंगाई बढ़ने के कारण प्याज (22.54%), लहसुन (35.36%) और अदरक (83.62%) की कीमतों में भारी तेजी आई है। ईंधन और परिवहन महंगाई बढ़कर 4.43% हो गई है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ी है। रेस्त्रां और आवास सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.72% हो गई है। देश के आम आदमी को हर दिन होने वाली कठिनाईयों से जूझना पड़ रहा है। देश का मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को जीडीपी की ग्रोथ से अंतर तब पड़ता है, जब उनकी बुनियादी सुविधाओं कोई बेहतरी नजर आए।

देश में पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं की भरमार है। इनसे राहत मिलती भी है तो उूंट के मुंह में जीरे जितनी। इससे बदलाव नजर नहीं आता। भारत की आधी से अधिक आबादी यानी करीब 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। देश के भूजल का बड़ा हिस्सा आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की वजह से दूषित हो चुका है। बारिश का पर्याप्त पानी होने के बावजूद उचित हार्वेस्टिंग (संचयन) न होने के कारण पानी बेकार बह जाता है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साफ पीने का पानी न मिलने के कारण हर साल देश में करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है।

वर्ष 2026 में भीषण गर्मी, रिकॉर्ड बिजली मांग (मई 2026 में 270 गीगावाट से अधिक) और स्थानीय रख-रखाव के कारण उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों के इलाकों में आंशिक या अस्थायी कटौती की गई।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेघरता की दर प्रति 10,000 लोगों पर 13 है। अर्थात 17 प्रतिशत लोगों को पास अपना घर नहीं है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत गांवों में स्थानीय स्तर पर कोई भी बुनियादी चिकित्सा सुविधा या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों  में विशेषज्ञ डॉक्टरों और सर्जनों की भारी कमी है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक खाली पड़े हैं।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों (2014-15 से 2024-25) में देश भर में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद या आपस में मर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 स्कूलों पर ताला लगा है। इसी दशक में सरकारी स्कूलों में कुल छात्रों का नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ है, जो 2014-15 के 26.95 करोड़ से घटकर 2024-25 में 24.69 करोड़ रह गया है। देश के एक लाख से अधिक स्कूलों में आज भी बिजली की उचित सुविधा नहीं है, और कई स्थानों पर पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय मौजूद नहीं हैं। 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी और 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। डिजिटल लाइब्रेरी का अभाव तो लगभग 13.62 लाख स्कूलों में है।

भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोज़गारी दर जून 2026 में बढ़कर 16.2% हो गई है, 15–29 आयु वर्ग की महिलाओं में यह दर बढ़कर 20.7% हो गई। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह दर 14.6% दर्ज की गई। जून 2026 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 18.2% और ग्रामीण युवा बेरोज़गारी दर 15.1% रही। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक गरीबी वाले राज्य बिहार में 51.91% आबादी गरीब है। झारखंड मे 42.16% लोग गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 37.79% जनसंख्या गरीब है। मध्य प्रदेश में 36.65% लोग गरीब हैं।

भारत में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है. सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा पाते हैं जबकि सबसे निचले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% मिलता है। आर्थिक असमानता की यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का यह हक है कि जीडीपी की ग्रोथ पर खुशी मनाने का आह्वान करें पर जब तक इसका असर देश की मूल समस्याओं के निराकरण में नजर नहीं आएगा, देश के लोगों की उदासी दूर नहीं होगी।

- योगेन्द्र योगी

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