Responsive Scrollable Menu

कच्छ भूकंप के 25 साल:तबाही के बीच पैदा हुआ बेटा, नाम रखा भूकंप; एक बच्चा 3 दिन बाद मलबे से निकला जिंदा

यह 26 जनवरी 2001 की सुबह थी। घड़ी में 8.40 मिनट का समय हुआ था, तभी गुजरात के कच्छ में विनाशकारी भूकंप आया। इसी समय अंजार तालुका की वोहरा कॉलोनी में असगरअली लकड़ावाला घर के बाहर बैठे हुए थे। भूकंप के झटके आते ही वे बाहर भागे। कुछ ही सेकेंड्स में कॉलोनी के लगभग सभी घर मलबे में तब्दील हो चुके थे। यहां रहने वाले 300 लोगों में से 123 लोगों की मौत हो चुकी थी। किस्मत से असगरअली के घर को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था, जिससे उनका परिवार सुरक्षित बच गया था। लेकिन, कच्छ से करीब 86 किमी दूर मांडवी में असगरगली के ससुराल पक्ष के 8 लोगों की मौत हो गई थी, लेकिन उसी परिवार का 8 महीने का बच्चा मलबे के नीचे सांसें ले रहा था। 3 दिनों से मलबे में दबा रहा 8 महीने का मुर्तुजा इसी परिवार में आठ महीने का एक बच्चा गुम था। यह किसी चमत्कार से कम नहीं कि वह तीन दिन तक मलबे में दबे रहने के बाद भी जिंदा बच गया था। मुर्तजा नाम का यह बच्चा अब 25 साल का हो चुका है। इस त्रासदी में मुर्तजा ने अपने पूरे परिवार को खो दिया था। उनके दादा, माता-पिता, चाचा-चाची और उनकी दो बेटियां-परिवार के आठ सदस्यों की मौत हो गई थी। मुर्तजा की दादी उस समय अपने मायके मोरबी गई हुई थीं, जिससे उनकी जान बच गई थी। असगरअली बताते हैं कि मलबे में दबे मुर्तजा को सेना के एक जवान ने बाहर निकाला था। उसने जैसे ही एक पत्थर हटाया तो उसके नीचे मुर्तजा था। आर्मी की मेडिकल टीम ने वहीं उसका प्राथमिक इलाज किया। उसके सिर में गंभीर चोटें थीं। इसके बाद मुर्तजा को मुंबई के लीलावती अस्पताल रेफर कर दिया गया। यहां 21 दिन तक उसका इलाज चला। इलाज के बाद वह अपनी दादी के साथ रहने लगा। मुर्तजा जब डेढ़ साल के थे, तभी असगरअली ने उन्हें गोद ले लिया था। मुर्तजा अब भुज में असगर अली के साथ ही रहते हैं और हार्डवेयर बिजनेस में उनक हाथ बंटाते हैं। आज भी मुर्तजा के चेहरे पर उस समय मलबे से लगी चोटों के निशान हैं, जो उसे इस आपदा की लगातार याद दिलाते हैं। मुर्तजा बताते हैं कि उसके फूफा के दो बेटे हैं और वह तीसरा भाई है। तीनों साथ रहते हैं। तीनों की शादी हो चुकी है और सभी संयुक्त परिवार में हंसी-खुशी से रहते हैं। दूसरा किस्सा... भूकंप आने के 5 मिनट बाद पैदा हुआ, नाम रखा ‘भूकंप’ कच्छ में रहने वाली शनिबेन 26 जनवरी 2001 की सुबह खेत पर थीं। इसी दौरान उन्हें प्रसव पीड़ा होने लगी तो वे घर लौट आईं। इसी दौरान 8.40 बजे भूकंप आ गया। भूकंप आने के 5 मिनट बाद ही उनके बेटे का जन्म हुआ था। किस्मत से शनिबेन का घर आपदा में बच गया था, जिससे मां-बेटे और उनकी बड़ी बेटी की जान बच गई थी। शनिबेन बताती हैं कि भूकंप में उनका पूरा घर हिल रहा था। वे घर से बाहर आकर बेहोश हो गई थीं। जब उन्हें होश आया तो वे एक दूसरे घर के दालान में थीं। एक बुजुर्ग महिला ने उनकी मदद की और वहीं बेटे का जन्म हुआ। शनिबेन बताती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद दो दिन तक इलाज नहीं मिल सका था। अमेरिकन डॉक्टर ने कहा- इसका नाम ‘भूकंप’ रख दो हालांकि, इसके बाद बचाव टीमें शहर में आ गई थीं। काफी कमजोरी आ जाने के चलते तीसरे दिन उन्हें बेटे के साथ शहर ले जाया गया। यहां अमेरिका से आए डॉक्टर्स की टीम थी। इसी दौरान नर्स ने उनसे पूछा कि बच्चे का नाम क्या है। शनिबेन ने उससे कहा कि अभी इसका कोई नाम नहीं रखा है। तभी एक अमेरिकन डॉक्टर ने कहा- इसका नाम ‘भूकंप’ रख दो। उस समय मैंने कहा- आपको जो नाम देना हो दे दीजिए। इलाज के दो-तीन दिन बाद मां-बेटे घर लौट आए और बच्चे का नाम भूकंप ही रख दिया। शनिबेन के बाद हमने उनके बेटे भूकंप रबारी से भी बात की। भूकंप फिलहाल एक कंपनी में ड्राइवर की नौकरी करता है। भूकंप ने कहा कि जब मैं छोटा था तो आसपास के बच्चे ‘भूकंप-भूकंप’ कहकर ही बुलाते थे। शुरू में उसे समझ नहीं आता था, लेकिन मां ने मुझे बताया कि हमारी जान बचाने वाले विदेश से आए एक डॉक्टर ने उसका नाम ‘भूकंप’ रखा था। भूकंप कहता है कि इतनी बड़ी आपदा में भी वे बच गए, इसलिए उसके लिए ‘भूकंप’ नाम बुरा नहीं है। भूकंप के जन्म के समय मौजूद उसके मामा गाभाभाई रबारी ने बताया कि उस दिन वे खुद घटनास्थल पर मौजूद थे। सुबह 8:40 बजे भूकंप आया और 8:45 बजे उनके भांजे का जन्म हुआ। जब बहन को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो सबसे पहले वे दाई को लेकर आए थे। कच्छ में भूकंप के बाद विदेशों से सैकड़ों डॉक्टर्स की टीमें गुजरात पहुंची थीं। भांजे के जन्म के पांचवें दिन अमेरिकी डॉक्टर ने कहा—इतनी बड़ी आपदा में भी यह बच्चा बच गया है। इसलिए इसका नाम ‘भूकंप’ रख देना चाहिए। फिर हम उसे इसी नाम से ही बुलाने लगे।

Continue reading on the app

कच्छ भूकंप के 25 साल:कलेक्टर के नाम पर भुज में बसा शहर, मलबे से कच्छ को खड़ा करने वाले 6 लोगों की कहानी

26 जनवरी, 2001 के दिन गुजरात के भुज जिले में भीषण भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.7 थी। करीब 700 किलोमीटर दूर तक भूकंप के झटके महसूस किए गए। कच्छ और भुज शहर में 12,000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और करीब 6 लाख लोगों को बेघर होना पड़ा। भूकंप का सबसे ज्यादा असर कच्छ में हुआ था। कच्छ में चारों ओर सिर्फ तबाही थी। ऐसा लग रहा था कि कच्छ अब शायद कभी दोबारा खड़ा नहीं हो पाएगा। लेकिन, कच्छ के पुनर्निर्माण में ऐसे कई चेहरे रहे, जिनकी इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि और कड़ी मेहनत ने कच्छ को दोबारा खड़ा कर दिया। ऐसे ही कुछ चर्चित चेहरों की कहानी भास्कर की विशेष सीरीज कच्छ भूकंप @25 में पेश की जा रही है। 1. कच्छ भूकंप के बाद सीएम बने थे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक चर्चित सूत्र है- आपदा को अवसर में बदलना। यह विचारधारा भूकंप की त्रासदी के बाद स्पष्ट रूप से सामने आई। कच्छ भूकंप के करीब 8 महीनों बाद (3 अक्बूटर, 2001) नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। आज जो कच्छ आप देख रहे हैं, वह नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि का ही परिणाम है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, पोर्ट और पर्यटन के विकास के जरिए उन्होंने गुजरात के इस सबसे बड़े जिले की पूरी तस्वीर बदल दी। रेगिस्तानी कच्छ तक पानी पहुंचाया मोदी ने भूकंप में तबाह हुए हजारों घरों का पुनर्निर्माण कराया और गांवों तथा शहरों में दोबारा रौनक लौटाई। पहले सूखा क्षेत्र माने जाने वाले कच्छ की सबसे बड़ी जरूरत पानी थी। नरेंद्र मोदी ने कच्छ की प्यास बुझाने के लिए नर्मदा योजना का पानी यहां तक पहुंचाया। इससे खेती को बड़ा लाभ हुआ। इसके अलावा मोदी ने उद्योगों के लिए टैक्स में छूट दी, जिससे कच्छ में बड़े-बड़े उद्योग आए और हजारों लोगों को रोजगार मिला। आज के समय में कच्छ की गिनती एशिया के बड़े औद्योगिक केंद्रों (इंडस्ट्रियल हब) में होती है। रणोत्सव ने बदली कच्छ की तस्वीर कच्छ में पर्यटन विकास की अपार संभावनाओं को देखते हुए नरेंद्र मोदी ने 2005 में रणोत्सव की शुरुआत करवाई। पहला रणोत्सव सिर्फ तीन दिनों के लिए आयोजित किया गया था। आज वही रणोत्सव 100 से अधिक दिनों तक चलता है और दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। वर्ष 2005 से पहले जिस रण में जाने को कोई तैयार नहीं होता था, उसी रण ने आज कच्छ की एक अलग और वैश्विक पहचान बना दी है। 2. कलेक्टर बिपिन भट्ट: अपार्टमेंट मॉडल पर शहर बसाने का खाका तैयार किया बिपिन भट्ट सेवानिवृत्त अतिरिक्त कलेक्टर हैं। कच्छ में भूकंप के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। उनके नाम पर बिपिन भट्ट नगर भी बसाया गया। कच्छ के इतिहास में शायद यह पहली ऐसी घटना है, जब किसी अधिकारी के नाम पर पूरा नगर बसाया गया हो। टाउन प्लानिंग थी सबसे बड़ी चुनौती बिपिन भट्ट ने दिव्य भास्कर से विशेष बातचीत में बताया कि वर्ष 2002 में उनकी नियुक्ति भुज शहरी विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में हुई थी। उन्होंने करीब 10 महीने तक इस जिम्मेदारी को निभाया। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती नया शहरी नियोजन (टाउन प्लानिंग) करना था। रो-हाउस की बजाय अपार्टमेंट मॉडल पर शहर बसाने की योजना तैयार करने में सात दिन लगे। योजना को अंतिम रूप देने के बाद एक ही दिन में भर्ती कर काम शुरू कर दिया गया। जहां पहले इतनी संकरी गलियां थीं कि मुश्किल से स्कूटर या साइकिल निकल पाती थी, वहां अब ऐसे चौड़े रास्तों की योजना बनाई गई, जिनसे बड़े वाहन भी आसानी से गुजर सकें। इस काम में अखबारों, स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं का अच्छा सहयोग मिला। 3. सुरेश मेहता: कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित करवाया वर्ष 1969–70 में अहमदाबाद में जज के रूप में सेवा दे चुके मूल रूप से कच्छ के मांडवी निवासी सुरेश मेहता एक अनुभवी और परिपक्व राजनेता भी हैं। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता कच्छ भूकंप के समय राज्य के उद्योग मंत्री थे। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कच्छ को दोबारा खड़ा करने के काम में सुरेश मेहता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कच्छ के लिए विशेष पैकेज घोषित करवाने में उनका अहम रोल रहा। कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किए जाने के बाद मुंद्रा और गांधीधाम जैसे इलाकों में बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए। कच्छ के लोगों को रोजगार मिल सके, इसके लिए उन्होंने बड़े उद्योगपतियों से यहां निवेश करने का निवेदन किया था। अडाणी, टाटा और वेलस्पन जैसी दिग्गज कंपनियों का कच्छ में आना सुरेश मेहता की मेहनत का ही परिणाम था। इन बड़ी कंपनियों के आने से कच्छ की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। ब्रॉडगेज लाइन को भुज तक बढ़ाने की परमिशन ली सुरेश मेहता बताते हैं- उस समय रेलवे की ब्रॉडगेज लाइन सिर्फ कांडला पोर्ट तक ही थी। मेरी मांग थी कि ब्रॉडगेज को भुज तक बढ़ाया जाए। इसके लिए मैंने कई स्तरों पर लगातार प्रयास किए। वे आगे बताते हैं- खाड़ी ऐसा इलाका था, जहां पहुंचने के लिए रापर होकर घूमकर जाना पड़ता था, जिसकी दूरी करीब 150 किलोमीटर हो जाती थी। उस समय वहां फोन की सुविधा भी नहीं थी। भूकंप के दौरान प्रमोद महाजन टेलिकॉम मंत्री थे। उन्होंने हालात देखे और हमें सैटेलाइट फोन उपलब्ध कराए। इसके बाद प्रमोद महाजन ने खड़ी गांव को गोद भी लिया। 4. रसिक ठक्कर: लगातार 18 दिनों तक वे खुद श्मशान में डटे रहे भुज पूरी तरह तबाह हो चुका था। चारों ओर मलबा फैला था और उसके नीचे अनगिनत शव दबे हुए थे, जिन्हें बाहर निकालकर अंतिम संस्कार करना जरूरी था। शहर में अलग-अलग समाजों के श्मशान थे। लोहाणा समाज का श्मशान भुज के बीचों-बीच स्थित था। उस समय रसिक ठक्कर लोहाणा समाज के अध्यक्ष थे। रसिकभाई लगातार 18 दिनों तक श्मशान में डटे रहे और 900 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार करवाया। लोग शव श्मशान में रखकर चले जाते थे रसिकभाई के बेटे घनश्याम ठक्कर बताते हैं कि हालात इतने बदतर थे कि शुरुआती दो-तीन दिनों तक श्मशान में लाशों का ढेर लगा था। किसी शव का हाथ कटा हुआ था, किसी का पैर। ज्यादातर शव मलबे में दबकर क्षत-विक्षत हो चुके थे। शम्शान मे इतने शव थे कि लोग शवों को श्मशान में रखकर चले जाते थे। यह उनकी मजबूरी थी। क्योंकि, वे लगातार शव ला रहे थे और इसके साथ ही उन्हें घायलों की देखरेख भी करनी थी। पिता रसिकभाई की सेवा को याद करते हुए उनके बेटे घनश्याम ठक्कर बताते हैं कि आपदा में पूरे के पूरे परिवार ही खत्म हो गए थे। इसलिए पिताजी ने तय किया कि वे खुद शवों का अंतिम संस्कार करेंगे। उन्होंने 18 दिनों में करीब 900 शवों का अंतिम संस्कार किया। 5. अनंत दवे: भूकंप के बाद वे करीब 15 दिन तक भुज में रहे दिवंगत सांसद अनंत दवे भूकंप वाले दिन दिल्ली में 26 जनवरी की परेड के कार्यक्रम में मौजूद थे। जैसे ही उन्हें भूकंप की खबर मिली, वे तुरंत कच्छ पहुंचे। अनंत दवे के पुत्र देवांग दवे ने दिव्य भास्कर से बातचीत में बताया कि भूकंप की सूचना मिलते ही मेरे पिता लालकृष्ण आडवाणी के साथ कच्छ पहुंचे। सबसे पहले उन्हें यह चिंता हुई कि लोगों के खाने का क्या होगा। इसके बाद वे सीधे अमृतसर गए और पंजाब से सबसे पहला लंगर कच्छ लेकर आए। इस काम में बादल परिवार ने भी सहयोग किया। कच्छ में लंगर की व्यवस्था खड़ी की गई। देवांग दवे बताते हैं कि पिता अनंत पर कच्छ की आपदा इतना गहरा असर हुआ था कि वे कई दिनों तक सो नहीं पाए थे। भूकंप के बाद वे करीब 15 दिन तक भुज में रहे। उस समय उनकी कार ही उनका दफ्तर और घर थी। वे रात को कार में ही सोते थे। भूकंप ने लोगों के मनोबल पर गहरा असर डाला था। ऐसे में उन्होंने हर रात भजन-कीर्तन की शुरुआत करवाई। पंडित दीनदयाल के नाम से भुज के ग्राउंड में एक ओपन एयर थिएटर बनाकर लोगों के रहने की भी व्यवस्था की। 6. पुष्पदान गढ़वी: मुंद्रा पोर्ट का भी विकास करवाया कच्छ से लोकसभा सांसद रहे पुष्पदान गढ़वी ने वर्ष 1996 से 2009 तक लोकसभा में कच्छ का प्रतिनिधित्व किया। इससे पहले वे पांच साल तक विधायक भी रह चुके हैं। उन्होंने बताया- मैं और अनंत दवे दिल्ली गए और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले। एक बार बजट सत्र के दौरान मुझे रात ढाई बजे संसद में बोलने का मौका मिला। संसद में मेरी बात सुनी गई और कच्छ में विकास कार्य तेजी से हुए। उस समय वाजपेयी ने कहा कि कच्छ में एक नई और बेहतर अस्पताल बनाना चाहिए। इसी सोच के तहत कच्छ की मौजूदा जनरल अस्पताल को AIIMS स्तर का बनाया गया। इसके लिए उस समय AIIMS का अध्ययन किया गया और उसी से प्रेरणा लेकर कच्छ के अस्पताल को विकसित किया गया। वाजपेयी ने कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किया वाजपेयी ने हमसे पूछा था कि कच्छ को संवारने के लिए क्या किया जाना चाहिए। तब हमने फंड की कमी, सूखे की गंभीर समस्या, सड़कों के अभाव जैसी हमारी वर्षों पुरानी मांगें फिर से उनके सामने रखीं। इन सभी बातों को सुनने के बाद वाजपेयी ने कच्छ को टैक्स हॉलिडे घोषित किया। इसके चलते यहां बड़ी-बड़ी कंपनियां आईं। इसके बाद मुंद्रा पोर्ट का भी विकास हुआ। इसी एक फैसले से कच्छ में औद्योगीकरण की शुरुआत हुई।

Continue reading on the app

  Sports

इशान किशन की वजह से दबाव में संजू सैमसन... कप्तान सूर्यकुमार यादव फॉर्म में लौटे, सीरीज जीतने पर भारत की नजर

India vs New Zealand, 3rd T20I: इशान किशन की 76 रन की शानदार पारी ने संजू सैमसन की मुश्किलें बढ़ा दी है. इशान ने रायपुर में खेले गए दूसरे टी20 मैच में न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार फॉर्म दिखाते हुए 21 गेंदों पर अर्धशतक बनाकर अभिषेक शर्मा का कीवियों के खिलाफ बनाए गए सबसे तेज फिफ्टी का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. संजू रन के लिए लगातार जूझ रहे हैं. इस सीरीज की दो पारियों में वह असफल रहे हैं. उन्हें शुभमन गिल को बाहर कर इस सीरीज में मौका दिया गया है लेकिन अभी तक सैमसन मौके का फायदा नहीं उठा सके हैं. Sat, 24 Jan 2026 16:36:05 +0530

  Videos
See all

Bangladesh Cricket Team Crisis: T20 World Cup 2026 के लिए भारत आएगी बांग्लादेशी टीम? Top News #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-24T11:15:03+00:00

Boss की फीलिंग ना मिले तो दूरी बनाते हैं राहुल ? Congress | Rahul Gandhi | Tehseem Poonawala #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-24T11:12:00+00:00

बर्फबारी में शादी, वीडियो वायरल |#snowfallwedding #viralvideo #breakingnews #snow #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-24T11:09:46+00:00

फाटक बंद नहीं हुआ, ट्रेन आ गई! | #trainaccident #jharkhand #shorts #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-24T11:10:00+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers