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Goat Bank: पैसा और ब्लड बैंक तो सुने होंगे, क्या आपने कभी बकरी बैंक के बारे में सुना है ? जानिए बकरी बैंक

Goat Bank: बकरी बैंक महाराष्ट्र की एक अनोखी पहल है, जहां महिलाओं को पैसे की जगह मादा बकरी लोन में दी जाती है. बकरी से मादा बच्ची होने पर वही लौटाई जाती है. इस मॉडल से सैकड़ों महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं और नियमित आमदनी कमा रही हैं.

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कतर, सऊदी, तुर्की समेत मुस्लिम वर्ल्ड झुककर हां में हां मिलाता चला गया, यूरोप ताकत के बल पर शांति वाले फॉर्मूले से खुद को बचाता चला गया, भारत का रुख क्या?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाज़ा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए आठ इस्लामिक देशों ने हामी भर दी है। इनमें कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर ट्रंप के निमंत्रण का स्वागत किया और बोर्ड के मिशन का समर्थन जताया। यह बोर्ड गाज़ा में शांति स्थापित करने, पुनर्निर्माण और निवेश को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। सऊदी, यूएई, कतर, तुर्की,समेत दुनिया के बड़े मुसलमान मुल्कों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को जॉइन कर लिया है। सबसे दिलच्सप ये है कि एक तरफ जहां मुस्लिम दुनिया के सभी बड़े देश डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस का समर्थन कर रहे हैं और इसमें शामिल हो रहे हैं। अमेरिका के करीबी यूरोपीय सहयोगी इस बोर्ड में शामिल होने को इच्छुक नहीं दिखते या फिर वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं। 

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मुस्लिम देश ट्रंप के सामने झुकते नजर आए

बोर्ड ऑफ पीस को लेकर यह शंका भी सामने आ रही है कि इसकी कार्यप्रणाली इज़रायल के हितों को प्राथमिकता दे सकती है, जिससे फ़िलिस्तीनियों के साथ अन्याय होने का खतरा बना रहेगा। माना जा रहा है कि इस बोर्ड की पूरी कमान अमेरिका के हाथों में होगी और इसका प्रभावी नियंत्रण ट्रंप के पास रहेगा, जिन्हें इज़रायल के प्रबल समर्थकों में गिना जाता है। ऐसे में मुस्लिम देशों की इस बोर्ड में भागीदारी को लेकर मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष है। सवाल उठाए जा रहे हैं कि जो देश फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की पैरवी करते रहे हैं, वे गाज़ा के शासन की ज़िम्मेदारी ऐसे बोर्ड को कैसे सौंप सकते हैं, जिसका नियंत्रण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अमेरिका के हाथों में हो।

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क्या है बोर्ड ऑफ पीस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में शांति के लिए 'बोर्ड ऑफ पीस' बनाया है। ट्रप इसके आजीवन चेयरमैन रहेगे। बोर्ड का सदस्य बनने के लिए भरत, चीन समेत दुनियाभर के 60 से ज्यादा नेताओं को न्योता भेजा गया।  बोर्ड की शुरुआती सदस्यता 3 साल की होगी। स्थायी सदस्यता के लिए देश को। अरब डॉलर यानी करीब 9000 करोड़ रुपये देने होंगे। यह रकम सदस्य बनने के साल के अंदर देनी होगी। यह रकम नहीं देते तो 3 साल बाद सदस्यता खत्म होगी।

गाज़ा में होगा फंड का इस्तेमाल 

अमेरिका का कहना है कि इस फंड का इस्तेमाल गाजा के रीडिवेलपमेंट में होगा। यह बोर्ड तीन स्तर का होगा। फाउंडिंग झजेक्युटिव काउंसिल में अमेरिकी नेता और उद्योगपति हैं। ट्रंप का ये बोर्ड ऑफ पीस गाजा के अलावा दुनिया के अन्य संघर्षों को भी अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत खत्म करने में अपनी भूमिका निभाने का इरादा रखता है। इसका मकसद खुद को सुरक्षा परिषद के विकल्प के तौर पर पेश करना है।

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भारत का क्या फैसला

भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता मिल चुका है। फिर भी भारत ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहा है। लेकिन जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठा रहा। भारत का रुख साफ है कि हम दो राज्य समाधान का समर्थन कर रहे हैं और क्षेत्र में स्थाई शांति के लिए सभी प्रयासों का समर्थन करते हैं। लेकिन कई विशेषज्ञ और थिंक टैंक्स ने सलाह दी है कि भारत को औपचारिक रूप से बोर्ड में शामिल नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन के ढांचों को बायपास करता है। जिसमें फिलिस्तीनी लोगों की भागीदारी भी कम है। साथ ही इजराइल को सुरक्षा पर वीटो पावर मिलने से असंतुलन है और यह व्यासायिक हितों को प्राथमिकता दे सकता है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपनी प्रतिष्ठा और रणनीतिक जोखिमों को देखते हुए मानवीय सहायता तो दे सकता है लेकिन सदस्यता से दूर रहना ही भारत के लिए बेहतर होगा।  विपक्षी दल भी सरकार से अपील कर रही हैं कि बोर्ड में शामिल ना हो क्योंकि ये फिलिस्तीनी कॉज के साथ धोखा होगा और यूएन चार्टर का उल्लंघन भी होगा। कुछ पूर्व राजनयों का मानना है कि अगर भारत शामिल नहीं होता है तो तुर्की, कतर और पाकिस्तान जैसे देश एजेंडा चला सकते हैं और भारत के हितों के खिलाफ यह हो सकता है। लेकिन कुल मिलाकर भारत सतर्क रहकर और सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और यूएन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखना चाहता है। अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा तो नहीं हुई है और फैसला लेने में समय भी लग सकता है। 

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