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Delhi के संरक्षित स्मारकों पर IIT Roorkee का अध्ययन, समान बफर नियमों पर उठाए सवाल

(श्रुति भारद्वाज) नयी दिल्ली, 26 सितंबर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-रुड़की के एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली के संरक्षित स्मारक अलग-अलग तरह के जोखिमों का सामना कर रहे हैं। जहां निजामुद्दीन में एक फ्लाईओवर के दबाव से एक ऐतिहासिक नाला प्रभावित हो रहा है, तो उग्रसेन की बावली के पास नींव की खुदाई से भूमिगत जल संरचना को खतरा उत्पन्न हो गया है। अध्ययन में कहा गया है कि ऐसा तब हो रहा है जब इन सभी स्मारकों पर एक जैसे तय ‘हेरिटेज बफर’ नियम लागू हैं।

हेरिटेज बफर नियम का मतलब है किसी ऐतिहासिक या संरक्षित स्मारक के आसपास का वह तय इलाका, जहां निर्माण और दूसरी गतिविधियों पर कुछ नियम लागू होते हैं, ताकि स्मारक को नुकसान न पहुंचे। इस साल मार्च में प्रकाशित इस अध्ययन में दिल्ली के नौ केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों की पड़ताल की गई और पता चला कि खतरों के प्रकार और गंभीरता प्रत्येक स्मारक के विशिष्ट परिवेश के आधार पर अलग-अलग है। इससे पता चलता है कि विरासत संरक्षण के समय प्रत्येक स्थल की अनूठी विशेषताओं और संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष (एएमएएसआर) अधिनियम के तहत, केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के चारों ओर 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र और उसके बाद 200 मीटर का विनियमित क्षेत्र होता है। अध्ययन में यह देखा गया कि क्या स्मारकों के आसपास तय की गई सीमाएं वहां की अलग-अलग शहरी परिस्थितियों के अनुरूप हैं। निजामुद्दीन बस्ती के स्मारकों के समूह में बारापूला नाले को एक पुरानी सहायक नदी बताया गया है।

अध्ययन में पाया गया कि फ्लाईओवर जैसी बड़ी निर्माण परियोजनाएं नाले पर दबाव डाल रही हैं और इलाके की प्राकृतिक जल निकासी को प्रभावित कर रही हैं। इस प्रभाव को दीर्घकालिक और संभवत: खत्म न होने वाला माना गया है। अध्ययन में निजामुद्दीन स्मारकों के आसपास हो रहे अतिक्रमण और बिना योजना के विकास को भी एक बड़ा खतरा बताया गया है।

इसमें कहा गया है कि आसपास की जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से इन ऐतिहासिक धरोहरों के परिवेश पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है, जिसे बाद में ठीक करना मुश्किल होगा। उग्रसेन की बावली के मामले में सबसे बड़ा खतरा भूमिगत निर्माण कार्यों से है। अध्ययन में बताया गया है कि बावली के पानी को रोककर रखने वाली संरचना उसकी सबसे अहम विशेषता है।

इमारतों की नींव के लिए की जाने वाली भूमिगत खुदाई इस संरचना को लगातार नुकसान पहुंचा सकती है और इसका असर लंबे समय तक रह सकता है, जिसे खत्म करना मुश्किल होगा। हौज खास के मामले में एक अलग चुनौती है। अध्ययन में पाया गया कि स्मारक के आसपास बनी ज्यादातर इमारतें पहले से ही 100 मीटर के प्रतिबंधित क्षेत्र में आती हैं, जबकि 200 मीटर के नियंत्रित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा गैर विकसित है।

इस इलाके में रेस्तरां और बार स्थित हैं और व्यावसायिक गतिविधियां काफी होती हैं, इसलिए ऐसे शहरी क्षेत्र में केवल दूरी के आधार पर एक जैसे नियम लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अध्ययन में कहा गया है कि जब किसी इलाके में पहले से ही इमारतें बनी हुई हों, तो वहां प्रतिबंधित क्षेत्र के नियमों को लागू करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इसमें सुझाव दिया गया है कि हर जगह एक जैसे नियम लागू करने के बजाय स्थानीय स्थिति को ध्यान में रखा जाए, जैसे इमारतों की ऊंचाई और उनके बाहरी डिजाइन के आधार पर नियम तय किए जाएं।

साथ ही, ऐतिहासिक धरोहरों की सीमाएं तय करने के लिए भी एक स्पष्ट और व्यावहारिक तरीका अपनाने की जरूरत बताई गई है। शोधकर्ताओं ने नियमों के आपस में टकराव को भी एक बड़ी समस्या बताया है। अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की कई एजेंसियां काम करती हैं।

कई बार इन एजेंसियों के अधिकार एक-दूसरे से टकराते हैं और मास्टर प्लान व धरोहरों से जुड़े नियमों में अंतर दिखाई देता है। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किसी मामले में जिम्मेदारी किसकी है। अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि मौजूदा विरासत कानून जरूरी हैं, लेकिन सभी स्मारकों के लिए एक जैसा बफर क्षेत्र तय करने से हर स्मारक की अलग-अलग समस्याओं को नजरअंदाज किए जाने की आशंका है।

इसलिए अध्ययन में सुझाव दिया कि हर स्मारक की खास स्थिति, महत्व और आसपास के माहौल को ध्यान में रखकर विरासत नियम और शहरी योजना बनाई जाएं।

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शाम की हल्की भूख में बनाएं काले चने का क्रीमी सूप, देसी घी और जीरे का तड़का बढ़ा देगा स्वाद, जानिए आसान रेसिपी

Black Chana Soup Recipe: काले चने से घर पर गाढ़ा और स्वादिष्ट सूप आसानी से यार किया जा सकता है. इसके लिए चनों को पहले 5 से 6 घंटे या रातभर पानी में भिगोकर रखना बेहतर है. चनों को प्याज, अदरक और लहसुन के साथ कुकर में नरम होने तक पकाया जाता है. उबले चनों को उसी के बचे पानी के साथ पीसने से सूप को क्रीमी बनावट मिलती है. आखिर में देसी घी और जीरे का तड़का इसके स्वाद और खुशबू को बढ़ा देता है. इसे नाश्ते या शाम की हल्की भूख में गर्मागर्म परोसा जा सकता है.

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RCA Election: राजस्थान क्रिकेट में फिर सियासत की चर्चा, RCA चुनाव में मंत्री-विधायकों के बेटे मैदान में, अध्यक्ष पद पर दो बड़े नाम

Rajasthan Cricket Association : राजस्थान RCA चुनाव में राजनीतिक परिवारों का दबदबा दिख रहा है. चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के बेटे धनंजय सिंह और पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह अध्यक्ष पद के लिए मैदान में हैं. यह कोई नई बात नहीं है. इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे भी RCA के अध्यक्ष रह चुके हैं. . वैभव गहलोत ने 2019 में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था. इसके बाद वे RCA की कमान संभालते रहे. 2022 में उन्हें दोबारा अध्यक्ष चुना गया था. Sat, 26 Sep 2026 20:45:58 +0530

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