Gardening Tips: पानी देना भूल जाएं तो भी नहीं मुरझाएंगे! घर में लगाएं कम देखभाल वाले ये 5 पौधे
Gardening Tips: घर में पौधे लगाने का शौक तो बहुत लोगों को होता है, लेकिन रोजाना उनकी देखभाल करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। कभी पानी देना भूल जाते हैं तो कभी पौधों को सही रोशनी नहीं मिल पाती। ऐसे में कुछ ऐसे इनडोर और आउटडोर पौधे लगाए जा सकते हैं, जिन्हें बहुत ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं होती और वे सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक हरे-भरे रह सकते हैं।
कम मेंटेनेंस वाले पौधे खासतौर पर उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प हैं, जो घर को हरियाली से सजाना चाहते हैं लेकिन उनके पास रोजाना पौधों की देखभाल के लिए ज्यादा समय नहीं है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इन पौधों को पानी या रोशनी की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। सही जगह और जरूरत के मुताबिक पानी देना इनकी अच्छी ग्रोथ के लिए जरूरी है।
स्नेक प्लांट
स्नेक प्लांट कम देखभाल में आसानी से बढ़ने वाले पौधों में शामिल है। इसकी लंबी और सीधी पत्तियां घर के इंटीरियर को आकर्षक लुक देती हैं। यह कम रोशनी वाली जगहों में भी रह सकता है, हालांकि बेहतर ग्रोथ के लिए अप्रत्यक्ष रोशनी उपयोगी रहती है।
इस पौधे को बार-बार पानी देने की जरूरत नहीं होती। मिट्टी पूरी तरह सूखने के बाद ही पानी देना बेहतर रहता है, क्योंकि ज्यादा पानी इसकी जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है।
जेड प्लांट
जेड प्लांट एक लोकप्रिय रसीला पौधा है, जिसकी मोटी पत्तियों में पानी जमा रहता है। यही वजह है कि इसे बार-बार पानी देने की जरूरत नहीं होती। इसे ऐसी जगह रखना चाहिए जहां पर्याप्त रोशनी मिले।
पानी देने से पहले मिट्टी की नमी जरूर जांचें। गमले में पानी जमा रहने से जड़ें खराब हो सकती हैं।
एलोवेरा
एलोवेरा को भी कम देखभाल वाले पौधों में शामिल किया जाता है। इसकी मोटी पत्तियों में पानी जमा रहता है और यह सूखी परिस्थितियों को कुछ हद तक सहन कर सकता है। इसे अच्छी रोशनी वाली जगह रखना बेहतर होता है।
एलोवेरा के लिए अच्छी ड्रेनेज वाली मिट्टी और गमला जरूरी है। जरूरत से ज्यादा पानी देने से पौधे को नुकसान पहुंच सकता है।
पोथोस
पोथोस यानी मनी प्लांट घर में आसानी से लगाया जा सकता है। यह अलग-अलग रोशनी की परिस्थितियों में बढ़ सकता है और इसकी बेलें घर के कोनों को हरा-भरा लुक देती हैं।
इसे बहुत ज्यादा पानी देने की जरूरत नहीं होती। जब मिट्टी की ऊपरी परत सूखी महसूस हो, तभी पानी दें।
स्पाइडर प्लांट
स्पाइडर प्लांट भी घर के लिए आसान विकल्प है। इसकी लंबी हरी पत्तियां और छोटे नए पौधे इसे आकर्षक बनाते हैं। इसे तेज सीधी धूप से बचाकर उजली अप्रत्यक्ष रोशनी में रखना बेहतर रहता है।
इस पौधे को भी जरूरत के अनुसार पानी दें और गमले में अतिरिक्त पानी निकलने की व्यवस्था रखें।
पौधों को पानी देते समय रखें ध्यान
कम देखभाल वाले पौधों का मतलब यह नहीं है कि उन्हें लंबे समय तक बिना पानी के छोड़ दिया जाए। पानी देने का अंतर मौसम, मिट्टी, गमले और घर की रोशनी के अनुसार बदल सकता है। इसलिए कैलेंडर के हिसाब से पानी देने के बजाय मिट्टी की नमी देखकर फैसला करना बेहतर है।
सही गमला, अच्छी जल निकासी, उपयुक्त रोशनी और जरूरत के अनुसार पानी इन पौधों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं।
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लेखक: (कीर्ति)
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जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज केंद्र शासित प्रदेश का राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव के साथ ही सियासी टकराव फिर खुलकर सामने आ गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रस्ताव में वर्ष 2000 और 2024 में पारित पुराने प्रस्तावों का संदर्भ आते ही भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने मोर्चा खोल दिया। देखते ही देखते सदन नारेबाजी, हंगामे और तीखी बहस का अखाड़ा बन गया।
उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश प्रस्ताव में साफ कहा गया कि 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को सदन द्वारा पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने का आग्रह किया जाता है। हम आपको बता दें कि वर्ष 2000 का प्रस्ताव तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था और उसमें 1953 से पहले की स्थिति के अनुरूप अधिक स्वायत्तता की मांग की गई थी। यही संदर्भ इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद का कारण बन गया।
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उमर अब्दुल्ला ने राज्य के दर्जे की मांग को चुनावी जनादेश और केंद्र के कथित आश्वासन से जोड़ते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों से परिसीमन, चुनाव और फिर राज्य के दर्जे की बहाली की प्रक्रिया का वादा किया गया था। उन्होंने कहा कि परिसीमन और चुनाव हो चुके हैं और अब तीसरा चरण पूरा किया जाना चाहिए। उन्होंने सदन में यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर को आधा-अधूरा राज्य का दर्जा स्वीकार नहीं होगा, बल्कि पूरा राज्य वापस चाहिए।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने प्रस्ताव के इस स्वरूप को सीधे चुनौती दी। नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने स्पष्ट किया कि भाजपा राज्य के दर्जे पर बहस के लिए तैयार है, लेकिन अनुच्छेद 370 या 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव पर किसी बहस की अनुमति नहीं दी जाएगी। शर्मा ने सवाल उठाया कि राज्य के दर्जे के प्रस्ताव में पुराने स्वायत्तता प्रस्ताव को दोबारा जोड़ने की जरूरत ही क्या थी? उन्होंने कांग्रेस से भी अनुच्छेद 370 और स्वायत्तता के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा।
उधर, भाजपा के विरोध के बीच पार्टी के सभी विधायक सदन के बीचोंबीच पहुंच गए, नारेबाजी हुई और प्रस्ताव की प्रतियां फाड़े जाने की खबर सामने आई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के चलते कार्यवाही बाधित हुई और विधानसभा को पहले आधे घंटे के लिए स्थगित करना पड़ा। बाद में भी हंगामा जारी रहा और एक भाजपा विधायक को सदन से बाहर किया गया।
देखा जाये तो इस पूरे टकराव के केंद्र में सिर्फ राज्य का दर्जा नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की भविष्य की संवैधानिक और राजनीतिक दिशा का सवाल भी दिखाई दे रहा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए 2000 का स्वायत्तता प्रस्ताव उसके पुराने राजनीतिक एजेंडे की निरंतरता का प्रतीक है, जबकि भाजपा के लिए अनुच्छेद 370 हटने के बाद उस दौर की संवैधानिक व्यवस्था की ओर लौटने की किसी भी कोशिश को स्वीकार करना राजनीतिक रूप से असंभव है।
यहीं 5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में हुए बदलाव का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है। केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के बाद आतंकवादी घटनाओं, संगठित पत्थरबाजी और बंद आयोजित करने के मामलों में भारी कमी आई है। वर्ष 2018 में 228 आतंकवादी घटनाओं के मुकाबले 2025 में ऐसे मात्र 12 मामले दर्ज किए गए। साथ ही 2024 में जम्मू-कश्मीर में पर्यटकों की संख्या 2.3 करोड़ से अधिक रही और 2019 के बाद लगभग 18 हजार करोड़ रुपये के निवेश का सरकारी आंकड़ा भी सामने आया है।
मोदी सरकार यह भी रेखांकित करती रही है कि 370 के हटने के बाद पहले लागू न होने वाले अनेक केंद्रीय कानून जम्मू-कश्मीर में लागू हुए और अनुसूचित जाति, वाल्मीकि तथा गोरखा समुदायों सहित विभिन्न वर्गों को पहले की तुलना में समान संवैधानिक अधिकार मिले।
इसलिए विधानसभा का मौजूदा टकराव महज एक प्रस्ताव पर टकराव नहीं है। एक तरफ उमर अब्दुल्ला राज्य के दर्जे को अधूरे वादे की पूर्ति के रूप में पेश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा 2019 के बाद बने नए संवैधानिक ढांचे को किसी भी पुराने स्वायत्तता या 370 आधारित व्यवस्था से जोड़ने के खिलाफ खड़ी है। अब असली राजनीतिक लड़ाई इस बात पर है कि राज्य के दर्जे की मांग को पुराने जम्मू-कश्मीर के एजेंडे से अलग रखा जा सकता है या नहीं।
बहरहाल, विधानसभा का हंगामा साफ संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में राज्य के दर्जे से ज्यादा बड़ा मुद्दा उसके साथ जुड़ी राजनीतिक शर्तें और 2000 की स्वायत्तता की विरासत बनने वाली है।
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