अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने शुक्रवार को भारत के सबसे अमीर नगर निकाय, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के चुनावों में ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित अपनी पार्टी के नेतृत्व को बधाई दी। यह परिणाम रनौत के लिए व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीएमसी ने 2020 में उनके मुंबई बंगले से सटे एक कार्यालय को ध्वस्त कर दिया था, जब अविभाजित शिवसेना बीएमसी की सत्ता में थी। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बाद में इस कार्रवाई को कानून का घोर उल्लंघन बताया था।
अब जबकि बीएमसी में शिवसेना का सफाया हो चुका है और भाजपा मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, रनौत ने जीत पर खुशी जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बधाई दी। रनौत ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि महाराष्ट्र बीएमसी चुनाव में भाजपा की शानदार जीत से मैं बेहद रोमांचित हूं। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी और महाराष्ट्र के पूरे भाजपा परिवार को इस अविश्वसनीय भगवा जीत के लिए बधाई देती हूं।
बीएमसी द्वारा अपने कार्यालय के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में बात करते हुए, रनौत ने कहा कि और जिन्होंने मुझे गाली दी, मेरा घर गिरा दिया, मुझे अपशब्द कहे, मुझे महाराष्ट्र छोड़ने की धमकी दी, आज महाराष्ट्र ने उन्हें छोड़ दिया है। उन्होंने आगे कहा, "मुझे खुशी है कि जनता जनार्दन ऐसे महिला-विरोधी, गुंडों और भाई-भतीजावाद माफियाओं को उनकी औकात दिखा रही है।" बृहन्मुंबई नगर निगम, जिसका वार्षिक बजट 74,400 करोड़ रुपये से अधिक है, मुंबई के बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक प्रशासन के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता है, जिससे इस निकाय पर नियंत्रण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
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महाराष्ट्र की राजनीति को दशकों से मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की बहसों ने आकार दिया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि हैदराबाद से निकली एक पार्टी ने इस राज्य में ऐसा चमत्कृत करने वाला प्रदर्शन कैसे कर दिखाया? यह प्रश्न और गहरा हो जाता है जब यह देखा जाए कि ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन का अपने गृह राज्य तेलंगाना में भी व्यापक विस्तार नहीं है और उसकी राजनीति मुख्यतः हैदराबाद शहर तक सीमित रही है। फिर ऐसा क्या हुआ कि वही पार्टी महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में अपनी पतंग चुनाव चिन्ह को दूर दूर तक उड़ाने में सफल रही? इसके समानांतर एक और अहम सवाल खड़ा होता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में पले बढ़े तथा राजनीतिक परिवार से आने वाले और लंबे समय से खुद को राज्य की राजनीति का धुरंधर समझने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे आक्रामक प्रचार और तीखे भाषणों के बावजूद अपने ही राज्य में अपेक्षित समर्थन क्यों नहीं जुटा सके? आखिर महाराष्ट्र के मतदाताओं ने ओवैसी को क्यों चुना और राज ठाकरे को क्यों खारिज किया। इन सवालों के उत्तर केवल चुनावी आंकड़ों में नहीं बल्कि बदलती सामाजिक संरचना, स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व की शैली में छिपे हैं जिन्हें समझना आज की महाराष्ट्र की राजनीति को समझने के लिए जरूरी हो गया है।
हम आपको बता दें कि महाराष्ट्र के निकाय चुनाव परिणाम बदलते सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ का संकेत है। देखा जाये तो ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रदर्शन ने न केवल राज्य की स्थापित पार्टियों को चौंकाया है बल्कि यह भी दिखा दिया है कि स्थानीय राजनीति में जमीनी पकड़ और स्पष्ट पहचान कितनी निर्णायक हो सकती है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उसके प्रमुख राज ठाकरे से आगे निकलना एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है।
हम आपको बता दें कि एआईएमआईएम ने महाराष्ट्र के 13 नगर निगमों में 125 वार्ड जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। खास तौर पर मराठवाड़ा और खानदेश जैसे क्षेत्रों में पार्टी की मौजूदगी निर्णायक साबित हुई। छत्रपति संभाजीनगर में 115 में से 33 वार्ड जीतकर वह भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। मालेगांव, अमरावती, नांदेड़, धुले जैसे शहरों में भी उसका प्रभाव साफ दिखाई दिया। यहां तक कि मुंबई और ठाणे जैसे महानगरों में भी पार्टी ने खाता खोला जो उसके लिए प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
इसके उलट राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का प्रदर्शन अपेक्षाओं से काफी कमजोर रहा। जिस पार्टी ने कभी मराठी युवाओं की आकांक्षाओं और आक्रोश को धार दी थी, वह इस चुनाव में राजनीतिक हाशिये पर सिमटती दिखी। यह केवल संगठनात्मक कमजोरी का सवाल नहीं बल्कि वैचारिक और रणनीतिक भ्रम का भी परिणाम है। एमएनएस न तो पूरी तरह क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति कर पाई और न ही खुद को किसी व्यापक गठबंधन या स्पष्ट सामाजिक एजेंडे से जोड़ सकी।
ओवैसी की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी राजनीति की स्पष्टता है। एआईएमआईएम ने खुद को अल्पसंख्यक हितों की मुखर आवाज के रूप में प्रस्तुत किया और स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय रही। नगर निकाय चुनावों में सड़क, पानी, शिक्षा और प्रतिनिधित्व जैसे सवाल सीधे मतदाता से जुड़ते हैं। ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने लगातार रैलियां कर कार्यकर्ताओं में जोश भरा और पार्टी की पहचान को मजबूत किया। टिकट वितरण में विवाद और कुछ नेताओं के इस्तीफों के बावजूद पार्टी ने संगठित अभियान चलाया।
एक अहम पहलू मुस्लिम मतदाताओं के रुझान में आया बदलाव भी है। कई इलाकों में यह देखा गया कि स्थानीय स्तर पर मतदाताओं ने विपक्षी महा विकास आघाड़ी की बजाय एआईएमआईएम को प्राथमिकता दी। शिवसेना और राकांपा के विभाजन ने इस प्रवृत्ति को और तेज किया। जहां कांग्रेस मजबूत रही वहां एआईएमआईएम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन कुल मिलाकर पार्टी ने अपने कोर वोट बैंक को न केवल बचाए रखा बल्कि उसे विस्तार भी दिया।
राज ठाकरे की विफलता के कारणों पर नजर डालें तो सबसे पहले उनकी राजनीति की अस्थिर दिशा सामने आती है। कभी आक्रामक मराठी एजेंडा तो कभी हिंदुत्व की ओर झुकाव ने मतदाताओं को भ्रमित किया। साथ ही उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों के प्रति उनके कटुतापूर्ण बयानों और हाल में एमएनएस कार्यकर्ताओं द्वारा उत्तर भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार की खबरों ने भी राज ठाकरे से जनता की दूरी और बढ़ाई। इसके अलावा जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी और लगातार चुनावी असफलताओं ने कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया। स्थानीय मुद्दों पर निरंतर काम करने की बजाय एमएनएस अक्सर प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित रह गई।
एक और महत्वपूर्ण अंतर नेतृत्व की शैली में है। ओवैसी ने खुद को जमीनी नेता के रूप में स्थापित किया है जो हर छोटे बड़े चुनाव को गंभीरता से लेते हैं। वहीं राज ठाकरे का करिश्माई व्यक्तित्व अब संगठनात्मक मजबूती में तब्दील नहीं हो पा रहा। नगर निकाय जैसे चुनावों में जहां निरंतर संपर्क और स्थानीय नेतृत्व की जरूरत होती है वहां एमएनएस पिछड़ती दिखी।
इस चुनावी नतीजे का व्यापक अर्थ यह है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब केवल पारंपरिक ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रही। क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक प्रतिनिधित्व दोनों नए रूपों में सामने आ रहे हैं। एआईएमआईएम का उभार यह संकेत देता है कि यदि कोई पार्टी सीमित क्षेत्रों में भी स्पष्ट एजेंडा और मजबूत संगठन के साथ काम करे तो वह बड़ी स्थापित ताकतों को चुनौती दे सकती है।
बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि हैदराबाद के ओवैसी ने महाराष्ट्र के धुरंधर माने जाने वाले राज ठाकरे पर स्थानीय राजनीति की बिसात पर बढ़त बना ली है। यह बढ़त स्थायी होगी या नहीं यह आने वाले चुनाव तय करेंगे लेकिन फिलहाल नगर निगमों के स्तर पर एआईएमआईएम की सफलता और एमएनएस की विफलता महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक धड़कन को साफ तौर पर बयान करती है।
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