जर्मनी के राजदूत ने चांसलर मर्ज की पहली भारत यात्रा की सराहना की
नई दिल्ली, 16 जनवरी (आईएएनएस)। भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने शुक्रवार को जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के भारत के पहले आधिकारिक दौरे का स्वागत किया। उन्होंने जर्मन चांसलर के इस दौरे के दौरान हुई बातचीत के बारे में बताया, जिसमें रक्षा सहयोग, व्यापार, निवेश और माइग्रेशन जैसे मुख्य क्षेत्र शामिल थे।
जर्मनी के राजदूत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया, “हमारा अभी-अभी का दौरा कितना अनोखा था। चांसलर मर्ज अपने पहले भारत दौरे पर थे। रक्षा, व्यापार, माइग्रेशन, हमारे पास कई मुद्दे थे। चांसलर मर्ज एक युवा भारतीय महिला के साथ जर्मन में बातचीत के बाद सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। महिला ने सिर्फ चार महीने पहले जर्मन भाषा सीखना शुरू किया था।”
इस हफ्ते की शुरुआत में, जर्मन चांसलर मर्ज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर दो दिवसीय आधिकारिक दौरे के लिए गुजरात पहुंचे थे। यह जर्मन चांसलर मर्ज का भारत का पहला आधिकारिक दौरा था। उनके इस दौरे का मकसद भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय संबंध को बढ़ाना था।
सोमवार को मर्ज गुजरात के अहमदाबाद पहुंचे, और सबसे पहले पीएम मोदी और जर्मन चांसलर ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने और मिलिट्री-टू-मिलिट्री सहयोग को गहरा करने के अपने कमिटमेंट की फिर से पुष्टि की। इसके साथ ही दोनों देशों के नेवी शिप के रेगुलर एक-दूसरे के पोर्ट कॉल पर संतोष जताया।
उनकी बातचीत के बाद, पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा, अहमदाबाद में चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की मेजबानी करके बहुत अच्छा लगा। उनके दौरे ने भारत-जर्मनी के रिश्तों में नई जान डाल दी है, क्योंकि हम अपनी रणनीतिक साझेदारी के 25 साल और राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे कर रहे हैं। भारत को गर्व है कि उन्होंने एशिया में अपने पहले दौरे के लिए हमारे देश को चुना। यह भारत-जर्मनी के मजबूत संबंधों के लिए उनके व्यक्तिगत प्रतिबद्धता को दिखाता है।
उन्होंने आगे कहा, हम अपने संबंधों को गुणवत्ता के हिसाब से और ऊंचे स्तर पर ले जाने पर सहमत हुए, जिसमें रक्षा, स्पेस और दूसरी जरूरी और नई तकनीक में गहरा सहयोग शामिल है। हमारी बातचीत में क्लाइमेट एक्शन, भरोसेमंद और मजबूत सप्लाई चेन, कौशल, शिक्षा, खेल, संस्कृति और लोगों के बीच रिश्तों को मजबूत करने के लिए मिलकर कोशिशें भी शामिल थीं।
--आईएएनएस
केके/एबीएम
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BMC Election Results: नहीं चला 'मराठी मानुस' कार्ड, जानें ठाकरे ब्रदर्स की हार के 6 कारण
BMC Election Results: महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे अहम माने जाने वाले बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बड़ी जीत दर्ज की है. 29 में से 23 नगर निकायों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को स्पष्ट बढ़त हासिल है. मुंबई की सत्ता पर लंबे समय से काबिज रही शिवसेना के लिए यह नतीजे बड़ा झटका माने जा रहे हैं, खासकर तब जब ठाकरे ब्रदर्स यानी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे करीब 20 साल बाद एक मंच पर आए थे. लेकिन उनका जादू इस चुनाव में नहीं चला. खास तौर पर राज ठाकरे का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है. मुंबई में तो उनकी पार्टी दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई है. आइए जानते हैं आखिर क्यों चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स पिछड़ गए. क्यों बीएमसी में 4 दशक बाद गैर ठाकरे का राज होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों और रुझानों के आधार पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे (ठाकरे ब्रदर्स) की हार के मुख्य कारण निम्नलिखित माने जा रहे हैं...
1. 'मराठी कार्ड' का बेअसर होना
उद्धव और राज ठाकरे ने इस चुनाव में 'मराठी मानुष' और 'मराठी अस्मिता' के मुद्दे को केंद्र में रखा था. हालांकि, मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी (Demographics) और मतदाताओं की प्राथमिकता अब केवल भाषा तक सीमित नहीं रही। विकास और बुनियादी सुविधाओं के सामने भावनात्मक मुद्दा इस बार विफल साबित हुआ.
2. 20 साल बाद का बेमेल गठबंधन
दोनों भाइयों का लगभग दो दशक बाद एक साथ आना मतदाताओं के लिए विश्वसनीय नहीं रहा. आलोचकों का मानना है कि यह गठबंधन "डर" की वजह से था न कि किसी ठोस विजन की वजह से. कार्यकर्ताओं के बीच भी समन्वय की कमी दिखी, क्योंकि वर्षों तक वे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते आए थे.
3. महायुति का 'विकास' और 'हिंदुत्व' मॉडल
बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना (महायुति) ने अपना पूरा कैंपेन 'डबल इंजन सरकार' और विकास कार्यों पर केंद्रित रखा. उन्होंने 'मराठी और हिंदू मेयर' का नैरेटिव सेट किया, जिसने ठाकरे बंधुओं के वोट बैंक में सेंध लगाई. लाडली बहिन जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला वोटरों का महायुति की ओर झुकाव भी एक बड़ा कारण बना.
4. पार्टी का विभाजन और कैडर का बिखराव
एकनाथ शिंदे द्वारा शिवसेना में की गई बगावत के बाद, ग्रासरूट लेवल के कई अनुभवी नगरसेवक और शाखा प्रमुख शिंदे गुट में शामिल हो गए थे. उद्धव ठाकरे के पास जमीन पर सक्रिय रहने वाले संगठन की वह पुरानी ताकत नहीं रही, जो पहले हुआ करती थी.
5. गैर-मराठी वोटरों की नाराजगी
राज ठाकरे के पुराने बयानों और उत्तर भारतीयों के प्रति आक्रामक रवैये के कारण मुंबई की एक बड़ी आबादी (विशेषकर उत्तर भारतीय और गुजराती) ठाकरे ब्रदर्स के गठबंधन से दूर रही. बीजेपी ने इस वर्ग को पूरी तरह से अपनी ओर एकजुट करने में सफलता हासिल की.
6. विपक्ष में बिखराव (कांग्रेस का अलग होना)
महाविकास अघाड़ी (MVA) के बजाय उद्धव-राज ने अपना अलग गठबंधन बनाया, जबकि कांग्रेस अलग चुनाव लड़ी. इससे विरोधी मतों का बंटवारा हुआ, जिसका सीधा फायदा बीजेपी-शिंदे गठबंधन को मिला.
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