भले ही भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में हाल के महीनों में गिरावट दर्ज की गई हो, लेकिन दोनों पुराने दोस्त रिश्तों को जिंदा रखने तथा इसे और मजबूती देने के लिए नये और ज्यादा गहरे रास्ते तलाश रहे हैं। देखा जाये तो ऊर्जा का ग्राफ भले नीचे आया है, पर रणनीतिक साझेदारी की दिशा ऊपर की ओर जाती दिख रही है। हम आपको बता दें कि दिसंबर में भारत के रूसी कच्चे तेल के आयात में महीने दर महीने करीब 29 प्रतिशत की तेज गिरावट दर्ज की गई। यह स्तर उस समय के बाद सबसे निचला था, जब रूसी तेल पर मूल्य सीमा नीति लागू हुई थी। यह गिरावट ऐसे समय पर आई जब कुल तेल आयात में मामूली वृद्धि देखी गई। इस गिरावट की मुख्य वजह रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी द्वारा रूसी तेल की खरीद में लगभग 49 प्रतिशत की कटौती और सरकारी रिफाइनरियों द्वारा 15 प्रतिशत की कमी रही।
हालांकि यह गिरावट स्थायी नहीं दिखती। जनवरी में रूसी तेल की खरीद फिर से रफ्तार पकड़ती नजर आ रही है। जनवरी के 13 दिनों में ही भारत रूस से ग्यारह लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल आयात कर चुका है। वर्ष 2025 में कुल मिलाकर भारत ने रूस से दो करोड़ चार लाख बैरल से ज्यादा कच्चा तेल मंगाया। मूल्य के लिहाज से देखें तो दिसंबर में भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा। भारत ने कुल 23 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन आयात किये, जिनमें 78 प्रतिशत हिस्सा कच्चे तेल का था। कोयला और तेल उत्पाद भी भारत की खरीद का अहम हिस्सा बने रहे। हालांकि अक्टूबर और नवंबर में यह आंकड़ा इससे अधिक था, लेकिन दिसंबर की गिरावट के बावजूद भारत रूस के लिए एक प्रमुख बाजार बना हुआ है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत और रूस के बीच आर्थिक रिश्तों को ऊर्जा से आगे ले जाने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। दिसंबर में हुए वार्षिक शिखर सम्मेलन के बाद दोनों देशों ने संयुक्त उद्यमों, स्थानीय उत्पादन और नये व्यापारिक गलियारों पर जोर दिया है। रूस भारतीय कंपनियों के साथ इंजीनियरिंग, जहाज निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, तेल शोधन और धातु उद्योग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने को इच्छुक है।
रूस का साफ संदेश है कि भारत उसकी विदेशी आर्थिक रणनीति में सर्वोच्च प्राथमिकता पर है। लक्ष्य यह है कि द्विपक्षीय व्यापार में कच्चे माल और ऊर्जा के अलावा मूल्य वर्धित उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़े। भारत को केवल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया और अन्य वैश्विक क्षेत्रों के लिए उत्पादन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
इस सहयोग का एक अहम स्तंभ उत्तरी समुद्री मार्ग भी है। यह मार्ग रूस के आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरता है और यूरोप को एशिया से जोड़ता है। भारत और रूस इस मार्ग पर स्थिर कार्गो आधार, परिवहन लागत और लॉजिस्टिक्स ढांचे को लेकर साझा मानक तय कर रहे हैं। जहाज निर्माण और परिवहन सेवाओं में संयुक्त उद्यमों की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।
हम आपको यह भी बता दें कि भारत ने रूस को अपने निर्यात को दस अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। दोनों देश 2030 तक एक सौ अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें भारत चाहता है कि निर्यात की हिस्सेदारी तीस से पैंतीस अरब डॉलर तक पहुंचे।
देखा जाये तो भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद में आई गिरावट को यदि कोई रिश्तों में ठंडापन मान रहा है, तो वह वैश्विक राजनीति की सतह ही देख रहा है, उसकी गहराई नहीं। सच्चाई यह है कि भारत और रूस अब रिश्तों को एक आयामी ऊर्जा निर्भरता से निकालकर बहुस्तरीय रणनीतिक साझेदारी में बदल रहे हैं। तेल कम हो सकता है, लेकिन भरोसा और आपसी जरूरतें कम नहीं हुई हैं।
हम आपको बता दें कि रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है और उसे ऐसे साझेदार चाहिए जो केवल खरीदार नहीं, बल्कि सह निर्माता और सह निवेशक बनें। भारत इस जरूरत में पूरी तरह फिट बैठता है। वहीं भारत के लिए रूस केवल सस्ता तेल नहीं, बल्कि तकनीक, संसाधन और भू राजनीतिक संतुलन का अहम स्तंभ है। उत्तरी समुद्री मार्ग का उभरना इस साझेदारी को नई ऊंचाई देता है। यह केवल एक शिपिंग रूट नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक व्यापार का वैकल्पिक नक्शा है। जैसे जैसे आर्कटिक क्षेत्र खुल रहा है, वहां शक्ति संतुलन की नई लड़ाई शुरू हो चुकी है। भारत की मौजूदगी उसे दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनाती है। यह चीन के एकतरफा संपर्क अभियानों के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक संतुलन का साधन भी बन सकता है।
देखा जाये तो तेल आयात में उतार चढ़ाव बाजार की जरूरत और मूल्य समीकरण का हिस्सा है, लेकिन संयुक्त उत्पादन, तकनीकी सहयोग और लॉजिस्टिक्स साझेदारी दीर्घकालिक रिश्तों की बुनियाद होती है। रूस का भारत में उत्पादन लगाने का इरादा और भारत की रूस में बाजार विस्तार की चाह इस बात का संकेत है कि दोनों देश भविष्य को लेकर गंभीर हैं। भारत यदि अपने निर्यात को 30 से 35 अरब डॉलर तक ले जाने में सफल होता है, तो यह केवल व्यापारिक उपलब्धि नहीं होगी। यह संकेत होगा कि भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखला में केवल ग्राहक नहीं, बल्कि निर्माता और निर्णायक भूमिका निभाने को तैयार है।
बहरहाल, भारत और रूस का यह नया रास्ता दिखाता है कि वैश्विक दबावों के बीच दोस्ती केवल तेल की पाइपलाइन से नहीं बहती। यह उद्योग, समुद्र, तकनीक और साझा रणनीति के रास्तों से आगे बढ़ती है। और यही इस रिश्ते की असली ताकत है। इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की असली खूबसूरती साफ नजर आती है। वह न तो दबावों में झुकते हैं और न ही रिश्तों को तोड़ने की हड़बड़ी दिखाते हैं। मोदी की कूटनीति टकराव की नहीं, रास्ता निकालने की कला है। जब पश्चिम चाहता है कि भारत दूरी बनाए, तब भी वह बीच का रास्ता खोज लेते हैं। रूस से तेल कम खरीदा तो सहयोग के नये दरवाजे खोल दिये। ऊर्जा घटाई तो उद्योग, समुद्र और तकनीक में साझेदारी बढ़ा दी। मोदी की विदेश नीति की ताकत यही है कि वह दोस्ती को भावनाओं पर नहीं, हितों पर टिकाते हैं और हर दबाव को चुपचाप अप्रासंगिक बना देते हैं। यही कारण है कि आज भारत किसी खेमे का मोहरा नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर खेलने वाला खिलाड़ी बन चुका है।
-नीरज कुमार दुबे
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