Kailash Vijayvargiya के आपत्तिजनक बयान पर MP Congress का हमला, मंत्री पद से मांगा इस्तीफा
मध्य प्रदेश कांग्रेस ने सोमवार को राज्य के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की आलोचना की। उन पर आरोप है कि रविवार को इंदौर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक महिला पार्षद के शारीरिक रूप-रंग पर टिप्पणी की थी। कांग्रेस ने मंत्री से माफ़ी की मांग की है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें विजयवर्गीय उस महिला पार्षद का ज़िक्र करते हुए कहते हैं दीदी की भी चौड़ाई थोड़ी बढ़ गई है" (यानी दीदी का वज़न/चौड़ाई थोड़ी बढ़ गई है)। वीडियो के वायरल होने के बाद कांग्रेस नेताओं ने मंत्री की आलोचना की और उनसे माफ़ी की मांग की। कांग्रेस के सीनियर नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने इस बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि बीजेपी के सीनियर नेता होने के नाते विजयवर्गीय को अपने सार्वजनिक बयानों को लेकर सावधान रहना चाहिए।
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शर्मा ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कैलाश विजयवर्गीय जैसे सीनियर बीजेपी नेता, जो कई बार मंत्री रह चुके हैं और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे हैं, ने ऐसी बात कही। उनके कहे हर शब्द से बीजेपी और आरएसएस की छवि झलकती है। ये कैसे शब्द हैं? उन्हें महिलाओं और आम जनता से माफ़ी मांगनी चाहिए। इसके अलावा, कांग्रेस प्रवक्ता अभिनव बारोलिया ने भी विजयवर्गीय की आलोचना की और राज्य सरकार से मांग की कि उनसे इस्तीफ़ा लेकर कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि ये वही कैलाश विजयवर्गीय हैं जो भाई-बहन के रिश्तों के बारे में बेतुके बयान देते हैं और पत्रकारों को डांटते हैं। अब वे महिलाओं की 'चौड़ाई' के बारे में बात कर रहे हैं। यह किस तरह का आपत्तिजनक बयान है? बीजेपी सरकार को शायद इस पर ध्यान नहीं जा रहा है। वैसे, उन्हें ध्यान क्यों आएगा? जब उनके मंत्री विजय शाह देश की बेटियों और भारतीय सेना का अपमान करते हैं, तब भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया था। तो फिर इस पर क्यों ध्यान देंगे? हमारी मांग है कि पार्टी और सरकार ऐसे लोगों से इस्तीफ़ा ले।
BCI विवाद: Delhi High Court ने कहा- FIR और जांच के लिए BNSS के तहत मजिस्ट्रेट जाएं
दिल्ली हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें 20-21 अगस्त की रात को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) परिसर में वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और CBI से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास मजिस्ट्रेट के सामने एक असरदार वैकल्पिक उपाय मौजूद था। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत शिकायत दर्ज कराकर संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं, इसलिए किसी एजेंसी को केस दर्ज करने और मामले की जांच करने का निर्देश देने वाली 'रिट ऑफ मैंडमस' (आदेश) जारी करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट वकील कुणाल यादव और अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को BCI परिसर के अंदर और बाहर वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
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याचिका में BCI परिसर के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और सौंपने, साथ ही BCI को याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई अर्ज़ी पर फ़ैसला लेने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, युवा वकीलों का एक समूह 20 अगस्त को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए BCI ऑफ़िस के बाहर इकट्ठा हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 25-30 लोग, जिनमें से कई वकील की वेशभूषा में थे, रात करीब 1.15-1.20 बजे परिसर में घुस आए और विरोध प्रदर्शन कर रहे वकीलों पर हमला कर दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह घटना पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुई। याचिकाकर्ताओं ने 22 अगस्त को IP एस्टेट पुलिस स्टेशन के SHO को शिकायत और BCI तथा दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को अर्ज़ी सौंपी थी। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ताओं ने BNSS के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार संबंधित DCP (जो सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के बराबर होता है) या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया था।
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कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं दिखाया गया जिससे यह साबित हो कि SHO लापरवाही या कार्रवाई न करने का दोषी था, और न ही याचिका में यह बताया गया कि कानूनी उपाय क्यों असरदार नहीं थे। कोर्ट ने आगे यह भी देखा कि क्या आरोपों से कोई ऐसा संज्ञेय अपराध (cognizable offence) बनता है जिसके लिए FIR दर्ज करना ज़रूरी हो। कोर्ट ने पाया कि उसके सामने रखी गई शिकायतों के आधार पर आरोप यह था कि शामिल लोगों ने बिना किसी हथियार का इस्तेमाल किए याचिकाकर्ताओं को पीटा, थप्पड़ मारा, बुरी तरह मारा-पीटा और घसीटा। जस्टिस कथपालिया ने कहा कि ऐसे आरोप ज़्यादा से ज़्यादा 'भारतीय न्याय संहिता' की धारा 114 के तहत चोट पहुँचाने का अपराध बनते हैं, जो एक असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) है। इसलिए, कोर्ट ने माना कि BNSS की धारा 174 के तहत, मजिस्ट्रेट ही शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए सही अधिकारी थे और ऐसे हालात में कोई पुलिस अधिकारी इस तरह के अपराध की जाँच नहीं कर सकता था।
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