BCI विवाद: Delhi High Court ने कहा- FIR और जांच के लिए BNSS के तहत मजिस्ट्रेट जाएं
दिल्ली हाई कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें 20-21 अगस्त की रात को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) परिसर में वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और CBI से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास मजिस्ट्रेट के सामने एक असरदार वैकल्पिक उपाय मौजूद था। जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत शिकायत दर्ज कराकर संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं, इसलिए किसी एजेंसी को केस दर्ज करने और मामले की जांच करने का निर्देश देने वाली 'रिट ऑफ मैंडमस' (आदेश) जारी करने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट वकील कुणाल यादव और अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को BCI परिसर के अंदर और बाहर वकीलों पर कथित हमले के मामले में FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
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याचिका में BCI परिसर के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और सौंपने, साथ ही BCI को याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई अर्ज़ी पर फ़ैसला लेने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, युवा वकीलों का एक समूह 20 अगस्त को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए BCI ऑफ़िस के बाहर इकट्ठा हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 25-30 लोग, जिनमें से कई वकील की वेशभूषा में थे, रात करीब 1.15-1.20 बजे परिसर में घुस आए और विरोध प्रदर्शन कर रहे वकीलों पर हमला कर दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह घटना पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुई। याचिकाकर्ताओं ने 22 अगस्त को IP एस्टेट पुलिस स्टेशन के SHO को शिकायत और BCI तथा दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को अर्ज़ी सौंपी थी। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ताओं ने BNSS के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार संबंधित DCP (जो सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के बराबर होता है) या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया था।
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कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं दिखाया गया जिससे यह साबित हो कि SHO लापरवाही या कार्रवाई न करने का दोषी था, और न ही याचिका में यह बताया गया कि कानूनी उपाय क्यों असरदार नहीं थे। कोर्ट ने आगे यह भी देखा कि क्या आरोपों से कोई ऐसा संज्ञेय अपराध (cognizable offence) बनता है जिसके लिए FIR दर्ज करना ज़रूरी हो। कोर्ट ने पाया कि उसके सामने रखी गई शिकायतों के आधार पर आरोप यह था कि शामिल लोगों ने बिना किसी हथियार का इस्तेमाल किए याचिकाकर्ताओं को पीटा, थप्पड़ मारा, बुरी तरह मारा-पीटा और घसीटा। जस्टिस कथपालिया ने कहा कि ऐसे आरोप ज़्यादा से ज़्यादा 'भारतीय न्याय संहिता' की धारा 114 के तहत चोट पहुँचाने का अपराध बनते हैं, जो एक असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) है। इसलिए, कोर्ट ने माना कि BNSS की धारा 174 के तहत, मजिस्ट्रेट ही शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए सही अधिकारी थे और ऐसे हालात में कोई पुलिस अधिकारी इस तरह के अपराध की जाँच नहीं कर सकता था।
Jammu and Kashmir Assembly में जबरदस्त हंगामा, विधानसभा अध्यक्ष भी बोले पड़े, 'गुंडागर्दी नहीं चलेगी'
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का शरद सत्र शुरू होते ही सदन सियासी टकराव का अखाड़ा बन गया। पहले ही दिन भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने सरकार को घेरते हुए जोरदार नारेबाजी की, सदन के बीचोंबीच पहुंचकर विरोध जताया और रोजगार, बिजली, दैनिक वेतनभोगियों तथा स्वास्थ्य मिशन से जुड़े कर्मचारियों के मुद्दे उठाए। जवाब में सत्तापक्ष ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली का मुद्दा उछाल दिया। शोर-शराबा इतना बढ़ा कि विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राठेर को कड़ी चेतावनी देनी पड़ी, “गुंडागर्दी नहीं चलेगी।”
सत्र की शुरुआत दिवंगत पूर्व सदस्यों और मंत्रियों को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई। श्रद्धांजलि की कार्यवाही समाप्त होते ही भाजपा विधायकों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा समेत कई सदस्य अपनी सीटों से उठकर विरोध करने लगे और बाद में सदन के बीचोंबीच पहुंच गए। भाजपा ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कर्मचारियों, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, दैनिक वेतनभोगियों तथा आउटसोर्सिंग के जरिये होने वाली नियुक्तियों को लेकर सरकार से जवाब मांगा। बिजली की बढ़ी दरों और बुनियादी सुविधाओं का सवाल भी जोर-शोर से उठाया गया।
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भाजपा के इस विरोध के बीच सत्ता पक्ष ने भी मोर्चा संभाल लिया। नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायकों ने जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर नारे लगाए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक एम.वाई. तारिगामी ने कहा कि दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। सत्ता पक्ष का तर्क रहा कि राज्य का दर्जा बहाल होना जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति से जुड़ा प्रमुख सवाल है।
हंगामे के बीच कांग्रेस विधायकों ने भी केंद्र के खिलाफ नारेबाजी की। सदन में एक तरफ उमर सरकार से रोजगार और जनसुविधाओं पर जवाब मांगा जा रहा था तो दूसरी तरफ राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग गूंज रही थी। नतीजा यह हुआ कि प्रश्नकाल गंभीर बहस की बजाय नारेबाजी में उलझ गया और कार्यवाही बाधित होती रही।
उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार सभी सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष को मुद्दे एक-एक करके उठाने चाहिए। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने आरोप लगाया कि उमर अब्दुल्ला सरकार जनता से जुड़े सवालों से बचने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि बेरोजगार युवाओं, आउटसोर्स कर्मचारियों और दैनिक वेतनभोगियों की समस्याओं पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
वहीं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सत्र को जनता की समस्याओं, आकांक्षाओं और कल्याण से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा का अवसर बताया। लेकिन पहले ही दिन के घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि आने वाले दिनों में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव तेज रह सकता है। रोजगार, बिजली, आरक्षण, आउटसोर्सिंग, कर्मचारियों का नियमितीकरण और राज्य का दर्जा, ये मुद्दे सदन की कार्यवाही की दिशा तय करने वाले हैं। हालांकि पहले ही दिन जिस तरह हंगामे के बीच सदन को दिनभर के लिए स्थगित करना पड़ा जिससे संकेत मिल रहा है कि सत्र के आने वाले दिन भी हंगामेदार रहने वाले हैं।
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