Health News: वजन घटाने वाले इंजेक्शन एक बड़ा खतरा, छोड़ते ही लौट रहा मोटापा; इन परेशानियों से भी जूझ रहे लोग
मोटापे से आज दुनिया भर के लोग परेशान हैं. वे वजन कम करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन्हीं में से एक तरीका है- दवाईयों का सहारा लेना. लोग वजन कम करने के लिए वेगोवी और मौनजारो जैसे इंजेक्शन लगवा रहे हैं. इनको GLP-1 एगोनिस्ट कहा जाता है. दावा है कि दवाएं तेजी से वजन घटाने में मदद करती है. इस बीच, एक स्टडी सामने आ रही है, जिसने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मेडिकल जर्नल BMJ द्वारा हाल में एक रिपोर्ट पेश की गई. रिपोर्ट में सामने आया कि जो लोग GLP-1 इंजेक्शन लेना बंद कर रहे हैं. वे 18 महीनों के अंदर-अंदर घटाया हुआ अपना पूरा वजन दोबार हासिल कर ले रहे हैं. खास बात है कि वजन घटने से कोलेस्ट्रोल और दिल से जुड़े जो फायदे होते हैं, वे भी खत्म हो जाते हैं.
इन परेशानियों से जूझते हैं लोग
मेडिकल एक्सपर्ट का कहना है कि सिर्फ वजन बढ़ना ही समस्या नहीं है बल्कि वजन जो बढ़ता है, वह चर्बी के रूप में बढ़ता है. रिसर्च की मानें तो इन इंजेक्शन्स की वजह से घटने वाले वजन का 25 से 60 प्रतिशत हिस्सा मांसपेशियों से जुड़ा होता है लेकिन वजन जब वापस आता है तो सिर्फ फैट ही बढ़ता है.
डॉक्टरों का कहना है कि इन इंजेक्शनों का साइड इफेक्ट भी है. करीब 70 प्रतिशत लोगों को मतली होती है. इन दवाओं के वजह से पेट खाली होने की प्रक्रिया को बहुत धीमी हो जाती है. आम तौर पर खाना दो से चार घंटे में पच जाता है लेकिन इन इंजेक्शनों की वजह से खाना पचने में आठ से नौ घंटे घंटे लग जाते हैं. इससे बदबूदार डकार, पाचन संबंधी दिक्कतें और गैस होती है. इंजेक्शनों की वजह से मांसपेशियों की कमजोरी, चेहरे का सूखापन, हड्डियों का घनत्व कम होना और फ्रैक्चर का खतरा भी बढ़ जाता है. इससे पेट की स्थाई समस्या और आंखों की गंभीर बीमारी भी होने की आशंका रहती है.
वजन कम कैसे होता है
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंजेक्शन मोटापे को जड़ से सही नहीं करता. वजन घटाने का बेहतर तरीका कम कार्बोहाइड्रेट, हेल्दी फैट वाला भोजन, इंटरमिटेंट फास्टिंग और नियमित व्यायाम है. हालांकि, इन इंजेक्शनों को बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि ये इंजेक्शन सुरक्षित हैं और डॉक्चटरों की निगरानी में ही लेने चाहिए.
पाकिस्तान में खाद्य असुरक्षा का संकट, जनस्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा
नई दिल्ली, 15 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में बढ़ती खाद्य असुरक्षा अब केवल सामाजिक क्षेत्र की समस्या नहीं रही, बल्कि यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य और आर्थिक जोखिम का रूप ले चुकी है। जब देश की लगभग एक-चौथाई आबादी मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है, तो इसके परिणाम स्वास्थ्य खर्चों में वृद्धि, श्रम उत्पादकता में गिरावट और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गरीबी के रूप में सामने आएंगे। यह बात कराची स्थित प्रकाशन बिजनेस रिकॉर्डर में प्रकाशित एक संपादकीय में कही गई है।
संपादकीय में कहा गया है कि ‘हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे (एचआईईएस) 2024–25’ में शामिल फूड इनसिक्योरिटी एक्सपीरियंस स्केल के निष्कर्ष, इस्तेमाल की गई भाषा की तुलना में कहीं अधिक चिंताजनक वास्तविकता पेश करते हैं। रिपोर्ट में जहां “महत्वपूर्ण प्रगति के साथ लगातार चुनौतियों” की बात कही गई है, वहीं आंकड़े खाद्य सुरक्षा की स्थिति में स्पष्ट और लगातार गिरावट दर्शाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा 2018–19 में 15.92 प्रतिशत थी, जो 2024–25 में बढ़कर 24.35 प्रतिशत हो गई है। आबादी के लिहाज से इसका अर्थ है कि लगभग 6.1 करोड़ पाकिस्तानी ऐसे घरों में रह रहे हैं, जहां भोजन तक पहुंच अनिश्चित है।
गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति और भी भयावह है। यह आंकड़ा 2.37 प्रतिशत से बढ़कर 5.04 प्रतिशत हो गया है, यानी करीब 1.26 करोड़ लोग अत्यधिक अभाव की स्थिति में हैं। संपादकीय के अनुसार, ये आंकड़े प्रगति नहीं बल्कि बढ़ती असुरक्षा और कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक, मध्यम खाद्य असुरक्षा का मतलब है कि परिवारों को पर्याप्त भोजन तक भरोसेमंद पहुंच नहीं मिलती और उन्हें भोजन की गुणवत्ता, विविधता या नियमितता से समझौता करना पड़ता है। वहीं, गंभीर खाद्य असुरक्षा कहीं अधिक गंभीर स्थिति को दर्शाती है, जिसमें परिवारों के पास भोजन पूरी तरह खत्म हो जाता है और उन्हें एक दिन या उससे अधिक समय तक भूखे रहना पड़ सकता है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो एचआईईएस के निष्कर्ष केवल असुविधा में वृद्धि नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों के लगातार पोषण तनाव और वास्तविक भूख की स्थिति में पहुंचने का संकेत देते हैं।
संपादकीय में कहा गया है कि इसके दुष्परिणाम केवल खाली पेट तक सीमित नहीं हैं। एफएओ के साक्ष्य बताते हैं कि मध्यम खाद्य असुरक्षा खराब आहार गुणवत्ता, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भरता के कारण बढ़ते मोटापे से जुड़ी है। वहीं, गंभीर खाद्य असुरक्षा शारीरिक बीमारियों, मानसिक तनाव और दीर्घकालिक स्वास्थ्य क्षति के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है।
बच्चों के लिए, बार-बार खाद्य असुरक्षा का सामना करना कुपोषण, लंबाई और वजन में कमी, बौद्धिक विकास में बाधा और कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन की संभावना बढ़ाता है। ये प्रभाव मानव पूंजी और भविष्य की उत्पादकता को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, संपादकीय में चेतावनी दी गई है।
--आईएएनएस
डीएससी
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