पाकिस्तान में खाद्य असुरक्षा का संकट, जनस्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा
नई दिल्ली, 15 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में बढ़ती खाद्य असुरक्षा अब केवल सामाजिक क्षेत्र की समस्या नहीं रही, बल्कि यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य और आर्थिक जोखिम का रूप ले चुकी है। जब देश की लगभग एक-चौथाई आबादी मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है, तो इसके परिणाम स्वास्थ्य खर्चों में वृद्धि, श्रम उत्पादकता में गिरावट और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गरीबी के रूप में सामने आएंगे। यह बात कराची स्थित प्रकाशन बिजनेस रिकॉर्डर में प्रकाशित एक संपादकीय में कही गई है।
संपादकीय में कहा गया है कि ‘हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे (एचआईईएस) 2024–25’ में शामिल फूड इनसिक्योरिटी एक्सपीरियंस स्केल के निष्कर्ष, इस्तेमाल की गई भाषा की तुलना में कहीं अधिक चिंताजनक वास्तविकता पेश करते हैं। रिपोर्ट में जहां “महत्वपूर्ण प्रगति के साथ लगातार चुनौतियों” की बात कही गई है, वहीं आंकड़े खाद्य सुरक्षा की स्थिति में स्पष्ट और लगातार गिरावट दर्शाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा 2018–19 में 15.92 प्रतिशत थी, जो 2024–25 में बढ़कर 24.35 प्रतिशत हो गई है। आबादी के लिहाज से इसका अर्थ है कि लगभग 6.1 करोड़ पाकिस्तानी ऐसे घरों में रह रहे हैं, जहां भोजन तक पहुंच अनिश्चित है।
गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति और भी भयावह है। यह आंकड़ा 2.37 प्रतिशत से बढ़कर 5.04 प्रतिशत हो गया है, यानी करीब 1.26 करोड़ लोग अत्यधिक अभाव की स्थिति में हैं। संपादकीय के अनुसार, ये आंकड़े प्रगति नहीं बल्कि बढ़ती असुरक्षा और कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक, मध्यम खाद्य असुरक्षा का मतलब है कि परिवारों को पर्याप्त भोजन तक भरोसेमंद पहुंच नहीं मिलती और उन्हें भोजन की गुणवत्ता, विविधता या नियमितता से समझौता करना पड़ता है। वहीं, गंभीर खाद्य असुरक्षा कहीं अधिक गंभीर स्थिति को दर्शाती है, जिसमें परिवारों के पास भोजन पूरी तरह खत्म हो जाता है और उन्हें एक दिन या उससे अधिक समय तक भूखे रहना पड़ सकता है।
इस दृष्टिकोण से देखें तो एचआईईएस के निष्कर्ष केवल असुविधा में वृद्धि नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों के लगातार पोषण तनाव और वास्तविक भूख की स्थिति में पहुंचने का संकेत देते हैं।
संपादकीय में कहा गया है कि इसके दुष्परिणाम केवल खाली पेट तक सीमित नहीं हैं। एफएओ के साक्ष्य बताते हैं कि मध्यम खाद्य असुरक्षा खराब आहार गुणवत्ता, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर निर्भरता के कारण बढ़ते मोटापे से जुड़ी है। वहीं, गंभीर खाद्य असुरक्षा शारीरिक बीमारियों, मानसिक तनाव और दीर्घकालिक स्वास्थ्य क्षति के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है।
बच्चों के लिए, बार-बार खाद्य असुरक्षा का सामना करना कुपोषण, लंबाई और वजन में कमी, बौद्धिक विकास में बाधा और कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन की संभावना बढ़ाता है। ये प्रभाव मानव पूंजी और भविष्य की उत्पादकता को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, संपादकीय में चेतावनी दी गई है।
--आईएएनएस
डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
उरुग्वे के राजदूत ने भारत के साथ मजबूत संबंधों का किया समर्थन, पीएम मोदी को बताया 'बहुत प्रभावशाली नेता'
नई दिल्ली, 15 जनवरी (आईएएनएस)। भारत उरुग्वे के मोंटेवीडियो में एक दूतावास खोलने की योजना बना रहा है। दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का समर्थन करते हुए, भारत में उरुग्वे के राजदूत, अल्बर्टो एंटोनियो गुआनी अमरिला ने भारत सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। इस साल के आखिर में दूतावास खोलने की योजना है।
आईएएनएस के साथ एक इंटरव्यू में, राजदूत अमरिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहुत प्रभावशाली नेता बताया और ग्लोबल साउथ के सामने आने वाले मुद्दों को दुनिया के मंच पर उठाने के लिए उनकी सराहना भी की।
जब उनसे पूछा गया कि वह भारत और उरुग्वे के बीच रिश्तों को कैसे देखते हैं, तो राजदूत अल्बर्टो एंटोनियो गुआनी अमरिला ने कहा, मैं कहूंगा कि मैं बहुत खुश हूं क्योंकि हम इस रिश्ते के एक बहुत ही अहम पल में हैं, जो पहले से ही 75 साल पुराना है। हम एक साथ आने के नए तरीके शुरू करने वाले हैं। उनमें से एक यह है कि भारत शायद जून में मोंटेवीडियो में एक दूतावास खोलने जा रहा है, और हम उम्मीद कर रहे हैं कि (विदेश मंत्री) जयशंकर उस मौके पर उरुग्वे आएंगे।
अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में भारत के दूतावास को उरुग्वे से भी मान्यता मिली हुई है। भारत और उरुग्वे के बीच राजनयिक संबंध 1960 में बने थे। उरुग्वे की नई दिल्ली में एक दूतावास और मुंबई में एक ऑनरेरी कॉन्सुलेट है।
पीएम मोदी के वैश्विक नेतृत्व को लेकर अमरिला ने कहा, वह बहुत प्रभावशाली नेता हैं। उन्होंने ग्लोबल साउथ के विचारों को भी समझा है और हमें इस बात पर बहुत गर्व है कि वह इन सभी मुद्दों का ध्यान रख रहे हैं और हम चाहेंगे कि उनकी भूमिका और भी अहम हो।
अमरिला ने कहा कि उरुग्वे भारतीयों के लिए वीजा में ढील देने पर विचार कर रहा है।
उन्होंने कहा, मुद्दा यह है कि हम सोच रहे हैं कि भारतीयों की उरुग्वे यात्रा को आसान बनाना बहुत जरूरी होगा। इसी वजह से हमें इस पर ध्यान देने की जरूरत है और शायद यह कुछ ऐसा है, जो हम इस साल मार्च में दिल्ली में अपनी राजनीतिक बातचीत में कर सकते हैं।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का स्थायी सदस्य बनने की भारत की इच्छा के लिए उरुग्वे का समर्थन जताया। भारत यूएनएससी में स्थायी सीट के लिए सक्रिय रूप से कोशिश कर रहा है। फ्रांस और रूस जैसे कई देशों ने यूएनएससी में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की कोशिश का समर्थन किया है।
उन्होंने आगे कहा, हम इसका (भारत की कोशिश का) समर्थन करते हैं। हम इस बात का समर्थन नहीं करते कि नए सदस्य वीटो के साथ रहें या उनके पास वीटो हो। हम संयुक्त राष्ट्र में वीटो नहीं चाहते, लेकिन हम स्थायी सदस्य बनने के भारत के इरादे और मकसद का पूरा समर्थन करते हैं।
--आईएएनएस
केके/एबीएम
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