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अमेरिका का वो वकील जो निकोलस मादुरो के साथ खड़ा है

तीन दशकों से अधिक के अनुभव वाले इस अमेरिकी वकील को विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज जैसे हाई-प्रोफ़ाइल और जटिल मुक़दमे लड़ने के लिए जाना जाता है.

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Gen Z को लेकर PM Modi का बयान सही है या Manish Tewari की चिंता सही है?

देश की राजनीति में इन दिनों जेन जी को लेकर एक वैचारिक घमासान तेज हो गया है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जो जेन जी को भारत के भविष्य का वाहक बताते हुए उनसे मानसिक गुलामी की बेड़ियां तोड़ने का आह्वान कर रहे हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी हैं जो एशिया के कई देशों में जेन जी के नेतृत्व में हुए हालिया प्रदर्शनों को चेतावनी की तरह देखते हैं और उसके गहरे निहितार्थों की बात करते हैं।

हम आपको बता दें कि एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं को संबोधित करते हुए साफ कहा कि जेन जी का सबसे बड़ा दायित्व देश को दासता की मानसिकता से बाहर निकालना है। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का सवाल नहीं बल्कि सोच की आजादी का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय तक औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार रहा है जहां अपनी क्षमताओं पर संदेह किया गया और विदेशी मानकों को ही श्रेष्ठ माना गया। मोदी ने कहा कि आज का युवा उस दौर को नहीं जानता जब नीतिगत पंगुता और निर्णयहीनता ने देश की गति को थाम रखा था लेकिन यही युवा अब उस सोच को हमेशा के लिए दफन कर सकता है।

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प्रधानमंत्री ने जेन जी को आत्मनिर्भर भारत का असली सिपाही बताते हुए कहा कि स्टार्टअप संस्कृति, तकनीक आधारित नवाचार, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल भारत जैसी पहलों में युवाओं की भूमिका निर्णायक है। उनका जोर इस बात पर था कि जेन जी को केवल विरोध की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि समाधान और सृजन की राजनीति को आगे बढ़ाना चाहिए। मोदी ने कहा कि भारत का युवा अगर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से जुड़ता है तो वह वैश्विक मंच पर भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।

इसके विपरीत कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी का नजरिया कहीं अधिक सतर्क और चिंतित दिखाई देता है। उन्होंने हाल के महीनों में एशिया के कई देशों में जेन जी के नेतृत्व में हुए आंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रदर्शनों को सिर्फ युवा आक्रोश कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। तिवारी ने कहा कि इन आंदोलनों ने कई जगह सरकारों को हिला दिया और कहीं कहीं सत्ता परिवर्तन तक का कारण बने। उनका कहना है कि यह समझना जरूरी है कि ये आंदोलन केवल स्थानीय असंतोष का परिणाम नहीं हैं बल्कि इनके पीछे वैश्विक राजनीतिक प्रवृत्तियां और डिजिटल माध्यमों की बड़ी भूमिका है।

मनीष तिवारी ने आगाह किया कि सोशल मीडिया और डिजिटल नेटवर्क के जरिये जेन जी तेजी से संगठित होती है और भावनात्मक मुद्दों पर उग्र प्रतिक्रिया देती है। यह शक्ति जितनी रचनात्मक हो सकती है उतनी ही विनाशकारी भी साबित हो सकती है अगर इसे विवेकपूर्ण दिशा न मिले। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अन्य एशियाई देशों के अनुभवों से सबक लेना चाहिए जहां युवा आंदोलनों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव डाला और अस्थिरता पैदा की।

देखा जाये तो दुनिया भर में जेन जी के आंदोलनों ने एक नया राजनीतिक पैटर्न गढ़ा है। ये आंदोलन तेज हैं भावनात्मक हैं और डिजिटल प्लेटफार्म के सहारे सीमाओं को लांघते हैं। लेकिन भारत का संदर्भ अलग है। यहां का जेन जी सामाजिक, सांस्कृतिक विविधता, संविधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक परंपराओं के बीच पला बढ़ा है। यही कारण है कि भारतीय जेन जी को केवल वैश्विक आंदोलनों की नकल करने वाला नहीं बल्कि अपने तरीके से प्रतिक्रिया देने वाला माना जा रहा है।

मोदी और मनीष तिवारी के बयानों के बीच की टकराहट असल में इस सवाल पर आकर टिक जाती है कि युवा शक्ति को प्रेरणा की जरूरत है या नियंत्रण की। मोदी जहां युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना भरना चाहते हैं वहीं मनीष तिवारी इस चेतना को विवेक और सावधानी के साथ देखने की बात करते हैं। हालांकि दोनों ही यह मानते हैं कि जेन जी अब हाशिये पर नहीं बल्कि राजनीति और समाज के केंद्र में है।

देखा जाये तो जेन जी को लेकर चल रही यह बहस भारत के भविष्य की बहस है। प्रधानमंत्री मोदी की बातों में एक स्पष्ट संदेश है कि युवा केवल शिकायत करने वाली पीढ़ी न बने बल्कि देश की दिशा बदलने वाली शक्ति बने। दासता की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान दरअसल आत्मविश्वास और स्वदेशी सोच की पुकार है। वहीं मनीष तिवारी की चेतावनी यह याद दिलाती है कि ऊर्जा अगर दिशा विहीन हो जाए तो वह रचनात्मक कम और विध्वंसक अधिक हो सकती है।

हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी और मनीष तिवारी के बीच चल रही जेन जी को लेकर बहस के समानांतर राहुल गांधी भी युवाओं से संवाद की अपनी अलग रणनीति के कारण चर्चा में रहे हैं। हाल के दिनों में जेन जी के साथ उनकी अनौपचारिक बातचीत के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए हैं जिनमें वे कॉलेज जीवन, प्रेम प्रसंगों, व्यक्तिगत पसंद और युवाओं की रोजमर्रा की चिंताओं पर खुलकर बात करते दिखाई देते हैं। यह संवाद कई बार गंभीर राजनीति से ज्यादा मीम संस्कृति का हिस्सा बन गया। दरअसल, कांग्रेस की रणनीति के तहत यह प्रयास जेन जी को सीधे संबोधित करने और उन्हें लोकतंत्र, संविधान और चुनावी प्रक्रिया से जोड़ने का है। राहुल गांधी बार बार युवाओं से अपील करते रहे हैं कि वह केवल दर्शक न बनें बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाएं खासकर रोजगार, भ्रष्टाचार और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर। उन्होंने कुछ ऐसे बयान भी दिये जिन्हें जेन जी को उकसाने के तौर पर देखा गया। हालांकि यह साफ दिख रहा है कि जेन जी केवल राजनीतिक संदेश सुनने वाला वर्ग नहीं है बल्कि वह खुद विमर्श की दिशा तय करने लगा है।

बहरहाल, भारत का जेन जी इन दोनों ध्रुवों के बीच खड़ा है। उसके पास विरोध की ताकत भी है और निर्माण की क्षमता भी। असली चुनौती यही है कि वह वैश्विक उथल पुथल से सबक लेते हुए भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करे न कि उसे अस्थिरता की ओर धकेले। भारत का युवा अगर सोच समझकर आगे बढ़ा तो वह केवल सत्ता से सवाल नहीं करेगा बल्कि राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी भी उठाएगा। यही संतुलन भारत को बाकी दुनिया से अलग और मजबूत बनाता है।

-नीरज कुमार दुबे

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