Karnataka Ganesh Chaturthi की शोभायात्रा बनी सियासी मुद्दा, पुलिस की सलाह के बाद बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने
कर्नाटक में गणेश उत्सव के दौरान शोभायात्रा को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर एक पुलिस अधिकारी का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह शोभायात्रा को लेकर कुछ निर्देश देते नजर आ रहे हैं।
पुलिस अधिकारी वीडियो में कहते हैं कि मस्जिद के सामने से शोभायात्रा नहीं निकाली जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि त्योहार को त्योहार की तरह ही मनाना चाहिए और दूसरों की भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए। अधिकारी ने यह भी कहा कि अगर मस्जिद के सामने जाकर पटाखे बजाए जाएंगे, तो वह मामले से अपने तरीके से निपटेंगे।
बीजेपी ने कांग्रेस सरकार पर साधा निशाना
वीडियो सामने आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए उसे हिंदू विरोधी बताया है। बीजेपी सांसद यदुवीर वाडियार ने कहा कि सड़क सभी के लिए होती है। उनके मुताबिक, प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए, न कि शोभायात्रा को रोकने पर।
उन्होंने कहा कि कोई यह तय नहीं कर सकता कि शोभायात्रा कहां से निकलेगी और कहां से नहीं।
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आर. अशोक ने भी उठाए सवाल
कर्नाटक बीजेपी विधायक और नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने आरोप लगाया कि कांग्रेस अलग-अलग जिलों में गणेश चतुर्थी मनाने के लिए आने वाले लोगों को परेशान कर रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर मस्जिद के सामने से जुलूस निकलने पर दिक्कत होती है, तो गुरुद्वारे या जैन समुदाय के मंदिर के सामने से जुलूस निकलने पर ऐसी परेशानी क्यों नहीं होती?
आर. अशोक ने कहा कि अगर किसी जगह पर दिक्कत हो रही है तो कांग्रेस सरकार को यह समझना चाहिए कि असल में समाज के लिए परेशानी पैदा करने वाले लोग कौन हैं।
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त्योहारों को लेकर पहले भी जारी होती रही हैं गाइडलाइन
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इस तरह का वीडियो सामने आया है या त्योहारों के दौरान ऐसे निर्देश दिए गए हैं। समय-समय पर अलग-अलग त्योहारों को देखते हुए प्रशासन की ओर से ऐसी गाइडलाइन जारी की जाती रही हैं।
गणेश उत्सव के दौरान भी प्रशासन का जोर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी तरह के विवाद से बचने पर रहता है। इस बार पुलिस अधिकारी के वीडियो के सामने आने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है।
Balaghat में 30 से अधिक बच्चों की मौत पर कॉजपा प्रमुख Abhijeet Deepke ने ‘छद्म इस्तीफे’ से साधा निशाना
कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बालाघाट जिले में आदिवासी बच्चों की मौत को लेकर रविवार को मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार पर तंज कसा। दीपके ने ‘एक्स’ पर एक व्यंग्यात्मक पत्र साझा किया जिसमें उन्होंने ‘मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री’ पद से अपने ‘‘इस्तीफे’’ की घोषणा की। मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल को 13 अगस्त को लिखे पत्र में दीपके ने कहा है कि वह इस्तीफा दे रहे हैं क्योंकि बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत के बाद ‘‘मेरी अंतरात्मा मुझे इस कुर्सी पर बने रहने की अनुमति नहीं देती।’’ दीपके ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘‘मध्यप्रदेश के लोगों की सेवा करने का अवसर’’ देने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि यह एक ऐसा अवसर था जिसका अधिकतम लाभ उठाने में वह ‘‘स्पष्ट रूप से विफल’’ रहे हैं।
व्यंग्यात्मक पत्र में बालाघाट के मामलों से निपटने के सरकार के तरीके पर निशाना साधा गया है, विशेष रूप से पीड़ित परिवारों के लिए घोषित मुआवजे पर। दीपके ने यह भी सवाल किया कि अगर ये मंत्रियों या विधायकों के बच्चे होते तो क्या 24 लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त था। बालाघाट के अतिरिक्त जिलाधिकारी डीपी बर्मन के मुताबिक, 24 मृत बच्चों के परिजनों को 4-4 लाख रुपये दिए गए हैं, जबकि अन्य को सहायता देने की प्रक्रिया जारी है।
पत्र में दीपके ने कहा कि बच्चों की मौत उच्चतम स्तर पर जवाबदेही की मांग करती है। उन्होंने पत्र के जरिए नल से जल आपूर्ति योजना, शिक्षा और आदिवासी कल्याण पर सरकार के दावों को लेकर भी निशाना साधा है। दीपके ने कहा कि बालाघाट में कुछ आदिवासी परिवार अभी भी नदी के पानी पर निर्भर हैं और कई गांवों में कथित स्कूलों की स्थिति पशु आश्रयों से भी बदतर है।
उन्होंने राज्य में भाजपा नीत सरकार की विफलताओं को रेखांकित करने के लिए बिजली के बिना आदिवासी परिवारों, अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों और बच्चों में कुपोषण के सरकारी आंकड़ों का भी हवाला दिया। अपने ‘छद्म’ इस्तीफे के अंत में दीपके ने कहा कि उन्होंने ‘‘न केवल बालाघाट बल्कि पूरे राज्य के आदिवासियों को निराश किया है और इतने सारे मासूम बच्चों की मौत के बाद उन्हें विश्वास नहीं है कि उन्हें इस पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है।’’ यह पोस्ट दीपके के बालाघाट में बीमारी प्रभावित गांवों के दौरे के एक दिन बाद आया है, जहां सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के एक समूह के साथ टकराव के कारण परिवारों के साथ उनकी बातचीत बाधित हुई थी। इस सप्ताह की शुरुआत में, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने बालाघाट जिले में कथित रूप से संक्रामक रोगों के कारण 30 से अधिक बच्चों की मौत पर राज्य सरकार से जवाब मांगा था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट जिलाधिकारी और अन्य को नोटिस जारी किए। जनहित याचिका में बच्चों के लिए अपर्याप्त उपचार का आरोप लगाया गया और दावा किया गया कि 50 बिस्तरों की क्षमता वाले अस्पताल में लगभग 400 बच्चों का इलाज किया जा रहा है। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रभावित क्षेत्रों में चापाकल से पीले रंग का पानी आ रहा है और बच्चों और महिलाओं को कई महीनों से समय पर पौष्टिक भोजन नहीं मिला है।
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