US Iran War: अमेरिका ने एक महीने बाद फिर किया ईरान पर हमला, तेहरान ने मिसाइल हमलों से लिया बदला
US strikes Iran news: अमेरिका ने रविवार को होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लारक द्वीप पर ईरानी रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया। एक महीने में ईरान पर यह अमेरिका का पहला सैन्य हमला था, जिसके जवाब में तेहरान ने भी जवाबी कार्रवाई की।
अमेरिका के मुताबिक, यह हमला दो ईरानी लॉन्चरों को निशाना बनाकर किया गया, क्योंकि रिवोल्यूशनरी गार्ड के जवानों को इस रणनीतिक जलमार्ग में समुद्री माइनों से लैस रॉकेट लॉन्च करने की तैयारी करते देखा गया था। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कहा कि अमेरिकी हमले में जनहानि हुई, जिसके बाद उसने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।
लारक द्वीप पर दो लॉन्चरों पर हुआ अमेरिकी हमला
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के एक प्रवक्ता ने बताया कि अमेरिकी सेना ने लारक द्वीप पर दो ईरानी लॉन्चरों पर हमला किया। CENTCOM के प्रवक्ता नेवी कैप्टन टिम हॉकिंस ने कहा कि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड फोर्सेज को होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री माइनों वाले रॉकेट लॉन्च करने की तैयारी करते हुए देखा गया था।
अमेरिकी सेना के मुताबिक, इस ऑपरेशन का मकसद ईरान को इस जलमार्ग में और समुद्री माइनें लॉन्च करने से रोकना था। CENTCOM ने पिछले हफ्ते ही ऐलान किया था कि उसने जलडमरूमध्य के अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों से समुद्री माइनें पूरी तरह साफ कर दी हैं। हॉकिंस ने कहा, "अमेरिकी सेना इस क्षेत्र पर करीबी नजर बनाए हुए है और इस अहम जलमार्ग से व्यापार के मुक्त प्रवाह की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है।"
जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर ईरान का जवाबी हमला
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कहा कि अमेरिकी हमले में जनहानि हुई है। बाद में ईरानी सरकारी टेलीविजन ने बताया कि गार्ड्स ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। सरकारी टीवी के मुताबिक, इन हमलों में जॉर्डन के किंग हुसैन और अल-अज़रक एयरबेस पर मौजूद तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, रखरखाव सुविधाएं और अमेरिकी लड़ाकू विमानों के ठिकाने निशाने पर थे। ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि इन हमलों में "भारी नुकसान" हुआ।
यह घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई महीनों से रुक-रुककर जारी संघर्ष में एक नई बढ़ोतरी का संकेत देता है। सोमवार को ईरान ने बताया कि उसने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के एक एयरबेस पर मौजूद अमेरिकी सैन्यकर्मियों को भी निशाना बनाया था, ऐसा सरकारी टीवी ने बताया। सेना के मुताबिक, तेहरान ने UAE के अल मिन्हाद बेस पर तैनात अमेरिकी हेलीकॉप्टरों और जवानों वाले इलाकों को दर्जनों अटैक ड्रोन्स से निशाना बनाया। सेना ने कहा कि यह हमला होर्मुज जलडमरूमध्य के लारक द्वीप पर हुए अमेरिकी हमले के जवाब में किया गया था।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना है संघर्ष का सबसे बड़ा केंद्र
यह ताजा हमला अमेरिका-ईरान युद्ध के छह महीने पूरे होने के कुछ ही समय बाद हुआ है। अप्रैल में हुए संघर्षविराम के बाद सबसे तीव्र लड़ाई थमने के बाद से हालात अपेक्षाकृत शांत बने हुए थे। हालांकि खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास होने वाले छिटपुट हमले लगातार अंतिम शांति समझौते की संभावनाओं के लिए खतरा बने हुए हैं।
यह रणनीतिक जलमार्ग इस पूरे संघर्ष के केंद्र में बना हुआ है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है, जिससे पहले दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल गुजरता था। यह स्थिति 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हवाई हमलों के साथ शुरुआत हुई शत्रुता से पहले की है। ईरान द्वारा इस जलमार्ग को बंद किए जाने से कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और उर्वरक व ऊर्जा की कमी भी देखने को मिली है।
आर्थिक दबाव पर बढ़ा अमेरिका का फोकस
यह ताजा सैन्य हमले ऐसे समय हुए हैं, जब ट्रंप प्रशासन तेहरान के खिलाफ जिसे वह "आर्थिक युद्ध" बता रहा है, उसे लगातार प्राथमिकता देता जा रहा है। अमेरिकी नौसेना की ईरानी बंदरगाहों की काउंटर-नाकाबंदी ने घरेलू उत्पादन में कमी के बीच ईरान में पेट्रोल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा दिया है। पाकिस्तान और कतर सहित मध्यस्थों को शामिल करते हुए महीनों से कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका है।
अप्रैल में संघर्षविराम पर सहमति बनी थी, जिसके बाद जून में अंतिम शांति समझौते की दिशा में एक समझौता ज्ञापन (MoU) भी हुआ था। हालांकि अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया है।
29 जुलाई को हुआ था अमेरिका का आखिरी हमला
रविवार के ऑपरेशन से पहले, ईरान पर अमेरिका का आखिरी हमला 29 जुलाई को किया गया था। अमेरिकी सेना के मुताबिक, वह हमला क्षेत्र में अमेरिकी सेनाओं पर किए गए एक आकस्मिक हमले के प्रयास के जवाब में किया गया था। इससे पहले जुलाई की शुरुआत में CENTCOM ने लगातार 13 रातों तक ईरान पर हमले किए थे।
इस पूरे संघर्ष के दौरान ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी प्रतिष्ठानों और सहयोगी देशों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की है, जिसमें कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और UAE के ठिकाने भी शामिल हैं।
ताजा हमलों के बाद तेल की कीमतों में उछाल
अमेरिका के ईरान पर ताजा हमलों की खबर सामने आने के बाद तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क माने जाने वाले नॉर्थ सी ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर के आंकड़े को पार करते हुए 90.31 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट भी बढ़कर 85.41 डॉलर तक पहुंच गया। यह नई सैन्य झड़प ऐसे समय हुई है, जब अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव नजदीक आ रहे हैं और यह संघर्ष राजनीतिक रूप से विवादास्पद बना हुआ है।
अमेरिकी सीनेटर जैक रीड, जो सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी में शीर्ष डेमोक्रेट हैं, ने शुक्रवार को एक बयान में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस युद्ध को लेकर आलोचना की। रीड ने कहा, "छह महीने बाद भी, एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हो सका है," उन्होंने तर्क दिया कि इस संघर्ष ने मध्य पूर्व और वैश्विक स्तर पर अमेरिका की स्थिति को कमजोर किया है।
नेपाल बाढ़ त्रासदी: न भारी बारिश, न ग्लेशियल झील फटी; 5,200 मीटर से आए हिमस्खलन ने मचाई तबाही
नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई थी। शुरुआती दौर में इसे बादल फटने या ग्लेशियल झील के फटने से जोड़ा जा रहा था। हालांकि, नेपाली वैज्ञानिकों की जांच रिपोर्ट ने इन धारणाओं को खारिज कर दिया है। उपग्रह तस्वीरों, मौसम संबंधी आंकड़ों और जल विज्ञान के विश्लेषण से साफ हुआ है कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए हिमस्खलन और चट्टानों के टूटने के कारण नदियों में मलबे का भीषण बहाव पैदा हुआ था।
5,200 मीटर की ऊंचाई से गिरा 0.56 वर्ग किमी ग्लेशियर का हिस्सा
अध्ययन के मुताबिक, बुधवार (26 अगस्त) सुबह करीब 8:37 बजे रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का विशाल हिस्सा टूटना शुरू हुआ। यह मलबा 2,930 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ल्हेंदे नदी में जा गिरा। सैटेलाइट इमेज से पता चला है कि इस घटना से करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़ा भौगोलिक बदलाव आया और लगभग 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर अलग हो गया।
167 किमी/घंटे की प्रचंड रफ्तार से आगे बढ़ा मलबा
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि बर्फ और चट्टानों का यह मलबा महज 7 मिनट में 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी पहुंच गया। इस दौरान इसकी औसत रफ्तार 167 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई। आगे बेत्रावती की ओर बढ़ते हुए इसकी गति 73 किमी/घंटा और निचले मैदानी इलाकों में 22 किमी/घंटा रह गई। हालांकि, गति कम होने के बाद भी पानी अपने साथ भारी मात्रा में गाद, मिट्टी और विशाल चट्टानें बहाकर ले गया, जिससे भीषण तबाही हुई।
न बादल फटा, न झील फटी: वैज्ञानिकों का तर्क
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में उस दिन कोई असाधारण भारी बारिश दर्ज नहीं की गई थी, जिससे बादल फटने का दावा खारिज होता है। इसके अलावा, बाढ़ आने से कुछ घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी में नदी का जलस्तर घटने लगा था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हिमस्खलन के कारण ऊपर नदी का बहाव कुछ समय के लिए रुक गया था, जिसके अचानक टूटने से नीचे तबाही का सैलाब आ गया।
13 जलविद्युत परियोजनाएं ठप, 3 लाख करोड़ का नुकसान
इस आपदा ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को गहरा घाटा पहुंचाया है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अनुसार, 13 जलविद्युत परियोजनाएं और एक सौर ऊर्जा परियोजना पूरी तरह प्रभावित हुई हैं, जिससे 431 मेगावाट बिजली का उत्पादन ठप हो गया है। सरकार के प्राथमिक आकलन के मुताबिक, इस त्रासदी से देश को करीब 3 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया गया है। 903 मौतों के साथ राहत और बचाव कार्य अभी भी जारी हैं।
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