भारत के लिए BRICS Summit क्या हैं मायने? देश की आर्थिक स्थिति और राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
BRICS Summit 2026: जब भी कोई इंटरनेशनल समिट होने वाला होता है, तो हर किसी के मन में एक सवाल जरूर उठता है- आखिर इस समिट का फायदा क्या है? इसके मायने क्या हैं? भारत को इससे क्या फायदा मिलेगा? 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भी लोगों के मन में भी यही सवाल है. आखिर BRICS है क्या? क्या यह पश्चिमी देशों के खिलाफ बना कोई गुट है? या फिर कोई पुराने ढर्रे का मिलिट्री एलायंस. असल में भारत के लिए BRICS का मतलब है ठोस और प्रैक्टिकल फायदे. जैसे वैश्विक मंच पर प्रभाव, नए बाजारों तक पहुंच, फंडिंग के अवसर और अपनी विदेश नीति में लचीलापन. इन समिट की मदद से भारत कई बड़े मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है.
भारत किन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का सदस्य है?
BRICS के अलावा, भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया वाले Quad गठबंधन, G7 देशों की मीटिंग्स और वेस्टर्न टेक्नोलॉजी समिट्स का सदस्य है. इसके साथ ही यह BRICS का एक फाउंडिंग सदस्य भी है. यह एक तरह का बैलेंसिंग एक्ट होता है, जो दूर से देखने में भले ही समझ न आए. लेकिन इससे भारत के पास कई नए मौकों के विकल्प बने रहते हैं. इन समिट्स की मदद से भारत यह तय करता है कि वह व्यवस्था देश के हित में काम करे. आइए अब विस्तार से जानते हैं कि ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है.
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1. भारत को एक बड़ा मार्केट मिलता है
ब्रिक्स में दुनिया की कुछ सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं - ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका. और अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे नए सदस्य भी जुड़ चुके हैं. यह संगठन दुनिया की करीब आधी आबादी और करीब 40% ग्लोबल GDP को कवर करता है. इन देशों के साथ भारत का कुल गुड्स ट्रेड FY21 के $203.1 अरब से दोगुना होकर FY26 में $417.5 अरब तक पहुंच गया है. इसी दौरान भारत का इन देशों को एक्सपोर्ट 48.8% बढ़कर $64.3 अरब से $95.7 अरब हो गया. लेकिन इसमें एक पेच भी है. भारत का BRICS के साथ ट्रेड डेफिसिट - यानी इंपोर्ट का एक्सपोर्ट से कितना ज्यादा होना - तीन गुना बढ़कर FY26 में $226.1 अरब तक पहुंच गया. क्योंकि इंपोर्ट, एक्सपोर्ट के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ा. इसलिए भारत सिर्फ ट्रेड वॉल्यूम बढ़ाने की नहीं, बल्कि फेयर मार्केट एक्सेस और बेहतर एक्सपोर्ट मौकों की मांग कर रहा है.
2. न्यू डेवलपमेंट बैंक से फंडिंग मिलती है
बुनियादी ढांचे और सतत विकास परियोजनाओं को फंडिंग करने के लिए ब्रिक्स देशों के संस्थापक सदस्यों ने साल 2014 में न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना की थी. दिसंबर 2025 तक यह बैंक दुनियाभर में 139 प्रोजेक्ट्स के लिए करीब $43 अरब मंजूर कर चुका था. भारत इसमें सबसे ज्यादा फंडिंग पाने वाले देशों में शामिल है. रेलवे, मेट्रो, सड़कों, पानी और क्लीन एनर्जी जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए भारत को $10 अरब से ज्यादा की फंडिंग मंजूर हो चुकी है. इसमें मुंबई मेट्रो (लाइन 2, 6, 7) के लिए $500 मिलियन से ज्यादा, चेन्नई मेट्रो फेज 2 के लिए $346.72 मिलियन, इंदौर मेट्रो के लिए $225 मिलियन, और दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ RRTS के लिए $418 मिलियन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स शामिल हैं. खास बात यह है कि भारत की NDB में करीब 18% हिस्सेदारी है, जबकि IMF में यह सिर्फ 2.6% और वर्ल्ड बैंक में करीब 3% है. यानी NDB में यह तय करने में भारत की आवाज कहीं ज्यादा मजबूत है कि पैसा कहां और कैसे खर्च होगा.
3. ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम बदलने का मौका मिलता है
पिछले कई दशकों से दुनिया की फाइनेंशियल सिस्टम वेस्टर्न इंस्टीट्यूशंस और अमेरिकी डॉलर के इर्द-गिर्द घूमती चली आ रही है. भारत इस व्यवस्था में कुछ बदलाव लाना चाहता है. वो इसका कुछ विकल्प चाहता है. इसलिए RBI लगातार BRICS देशों के बीच लोकल करेंसी में ट्रेड सेटलमेंट और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम्स को तेज करने की कोशिश कर रहा है. BRICS देश अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम्स को आपस में जोड़ने पर भी बातचीत कर रहे हैं, और यह भी देख रहे हैं कि डिजिटल मुद्राओं- जैसे डिजिटल रुपया को डिजिटल युआन जैसी अन्य मुद्राओं के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है. अगर यह योजना सफल होती है, तो भारतीय बिजनेस SWIFT या अमेरिकी डॉलर पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना पेमेंट भेज और पा सकेंगे. इससे लागत और समय दोनों की बचत होगी. यह रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्थापित करने के भारत के लक्ष्य को भी स्थापित करेगा.
4. डिप्लोमैटिक ताकत मिलती है
ब्रिक्स भारत को एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं, एनर्जी प्रोड्यूसर और आबादी वाले देशों के गठबंधन तक पहुंच देता है. इससे भारत की आवाज कई अहम इंटरनेशनल मुद्दों पर और मजबूत हो जाती है. जैसे क्लाइमेट फाइनेंसिंग, फेयर ट्रेड नियम और UN सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार (जिसमें भारत खुद के साथ-साथ किसी एक अफ्रीकी देश के लिए भी परमानेंट सीट की मांग करता है). भले ही चीन भारत का सबसे बड़ा स्ट्रैटेजिक प्रतिद्वंदी बना हुआ है. लेकिन फिर भी BRICS भारत को व्यापार, भुगतान और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे साझा हितों पर बातचीत के लिए एक मंच प्रदान करता है. जबकि दोनों देशों के बीच बॉर्डर विवाद अभी भी द्विपक्षीय स्तर पर हल नहीं हुआ है.
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5. ग्लोबल साउथ तक पहुंच मिलती है
भारत ने लंबे समय से खुद को विकसित और विकासशील देशों के बीच एक पुल के रूप में स्थापित किया है. मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे नए सदस्यों का शामिल होना ब्रिक्स के लिए इस भूमिका को और मजबूत करता है. यह ब्लॉक भारत के लोन, निवेश और राजनीतिक समर्थन जुटाने के प्रयासों को कई गुना बढ़ाने का काम करता है, और इससे ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं - जैसे किफायती इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और क्लाइमेट फाइनेंस पर सहमति बनाने में मदद मिलती है.
6. चीन को मैनेज करने का जरिया मिलता है
बेशक! चीन BRICS के अंदर भारत का सबसे बड़ा स्ट्रैटेजिक प्रतिद्वंद्वी है. लेकिन यही वजह है कि यह प्लेटफॉर्म भारत के लिए और भी अहम बन जाता है. चीन को अमेरिका के दबदबे को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स की एकजुटता चाहिए और भारत के बिना BRICS सफल नहीं हो सकता. इससे भारत को एक तरह की बार्गेनिंग पावर की ताकत मिलती है. उदाहरण के लिए साल 2017 और 2024 में भारत और चीन ने BRICS समिट से ठीक पहले अपने बॉर्डर तनाव को कम किया था. इसके अलावा BRICS क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स और ट्रेड जैसे मुद्दों पर बातचीत का एक अलग रास्ता भी देता है, जो दोनों देशों के तनावपूर्ण द्विपक्षीय रिश्तों से अलग होता है.
7. भारत के पास एक बार्गेनिंग चिप बनी रहती है
भारत के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह BRICS की हर बात से सहमत हो. चीन, ईरान और दूसरे देशों के साथ उसके मतभेद भी हैं, फिर भी वह अमेरिका और यूरोप के साथ अपने मजबूत रिश्ते बनाए रखता है. यह लचीलापन भारत को एक तरह की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी यानी विदेश नीति में आजादी देता है. अगर पश्चिमी देशों को भारत का समर्थन चाहिए, तो भारत के पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं. अगर चीन या रूस को भारत का साथ चाहिए, तब भी भारत के पास अपने विकल्प खुले रहते हैं. एक साथ कई गठबंधनों - Quad, G7, BRICS, SCO का हिस्सा होने से भारत को मजबूत स्थिति से बातचीत करने का मौका मिलता है.
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ऋषिकुल को आयुर्वेद, योग और भारतीय ज्ञान परंपरा के विशिष्ट केंद्र के रूप में विकसित किया जाए: CM धामी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में हरिद्वार स्थित श्री मदन मोहन मालवीय प्राच्य शोध संस्थान, ऋषिकुल के समग्र विकास से संबंधित प्रस्तावित मास्टर प्लान की समीक्षा की. बैठक में मुख्यमंत्री के समक्ष संस्थान के प्रस्तावित स्वरूप एवं विभिन्न गतिविधियों से संबंधित प्रस्तुतीकरण किया गया. मुख्यमंत्री ने कहा कि ऋषिकुल को आयुर्वेद, योग और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाए. इसके समग्र विकास में आयुर्वेद, मेडिकल टूरिज्म, योग, ज्योतिष और वैदिक गणित को विशेष प्रमुखता दी जाए. इन क्षेत्रों में उच्च स्तरीय शैक्षणिक, शोध एवं अध्ययन की व्यवस्थाएं विकसित की जाएं, जिससे यह संस्थान भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शोध के बीच प्रभावी सेतु बन सके.
विकास में प्रमुखता से प्रतिबिंबित किया
मुख्यमंत्री ने कहा कि आयुष, योग और संस्कृत देवभूमि उत्तराखण्ड की प्रमुख पहचान हैं. राज्य की इस विशिष्ट पहचान को ऋषिकुल के विकास में प्रमुखता से प्रतिबिंबित किया जाए. संस्थान में विकसित होने वाली शैक्षणिक गतिविधियां उच्च स्तरीय हों तथा यहां भारतीय ज्ञान, प्राच्य विद्याओं, आयुर्वेद और योग से संबंधित अध्ययन एवं शोध के लिए उत्कृष्ट वातावरण तैयार किया जाए.
स्थापत्य परंपरा की झलक दिखाई
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि परिसर का वास्तुशिल्प प्राच्य एवं पारंपरिक स्थापत्य शैली के अनुरूप हो. भवनों के बाह्य स्वरूप और फसाड में प्राचीन स्थापत्य परंपरा की झलक दिखाई दे, जबकि परिसर में उपलब्ध कराई जाने वाली व्यवस्थाएं एवं सुविधाएं आधुनिकतम हों. उन्होंने कहा कि प्राचीनता और आधुनिकता के संतुलित समन्वय से परिसर की विशिष्ट पहचान विकसित की जाए.
भौतिक और भावनात्मक रूप से आकर्षित करे
मुख्यमंत्री ने कहा कि परियोजना के प्रत्येक पहलू में इसकी मूल अवधारणा स्पष्ट रूप से दिखाई दे. संपूर्ण परिसर को इस प्रकार विकसित किया जाए कि यहां आने वाले लोगों को भारतीय संस्कृति, ज्ञान और अध्यात्म की अनुभूति हो तथा यह उन्हें आध्यात्मिक, भौतिक और भावनात्मक रूप से आकर्षित करे. मुख्यमंत्री ने कहा कि मां गंगा के कारण हरिद्वार का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है. देश-दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक हरिद्वार आते हैं. इसलिए ऋषिकुल के विकास की अवधारणा में हरिद्वार की इस विशिष्टता को केंद्र में रखा जाए. यहां आने वाले लोगों को भारतीय ज्ञान परंपरा, आयुर्वेद, योग और अध्यात्म की समृद्ध विरासत को जानने और अनुभव करने का अवसर मिले.
नियमित समीक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि परियोजना से संबंधित सभी कार्यों को समयबद्ध किया जाए. विभिन्न कार्यों के लिए स्पष्ट चरण और समय-सीमा निर्धारित करते हुए इन्हें चरणबद्ध तरीके से दो वर्ष के भीतर पूर्ण किया जाए. उन्होंने कार्यों की नियमित समीक्षा सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए. प्रस्तुतीकरण में ऋषिकुल को योग एवं ध्यान, उच्च स्तरीय शैक्षणिक गतिविधियों, आयुर्वेद एवं समग्र स्वास्थ्य, भारतीय दर्शन, वैदिक एवं शास्त्रीय अध्ययन, कला-संस्कृति तथा शोध गतिविधियों के समन्वित केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना प्रस्तुत की गई. प्रस्तावित मास्टर प्लान में अकादमिक, योग एवं ध्यान, आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं वेलनेस सहित विभिन्न क्षेत्रों के समग्र विकास की अवधारणा रखी गई है.
बैठक में मुख्य सचिव श्री आनन्द बर्द्धन,प्रमुख सचिव श्री आर.के. सुधांशु, डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम, सचिव श्री धीराज गर्ब्याल, श्री दीपक कुमार, श्री युगल किशोर पंत, श्रीमती रंजना राजगुरू, उपाध्यक्ष हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण श्रीमती सोनिका, अपर सचिव श्री अभिषेक रुहेला एवं वर्चुअल माध्यम से जिलाधिकारी हरिद्वार श्री मयूर दीक्षित उपस्थित थे.
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