ट्रेलर से पहले ही 2026 की पहचान बन गए ये फ़र्स्ट लुक्स, फैंस के बीच पैदा हुई एक्साइटमेंट
2026 में रामायण, किंग और कई बड़ी फिल्मों की रिलीज़ तय है, ऐसे में सिनेमाघरों का रोमांच अभी से सातवें आसमान पर है. हर फिल्म ने अपने अंदाज़ में माहौल बनाया, लेकिन कुछ फ़र्स्ट लुक पोस्टर्स ऐसे रहे जिन्होंने सिर्फ़ एक तस्वीर में पूरी कहानी का एहसास करा दिया. आइए नज़र डालते हैं उन पाँच फ़र्स्ट लुक्स पर, जिन्होंने ट्रेलर आने से पहले ही दिल जीत लिया.
दायरा
मेघना गुलज़ार के निर्देशन में बनी दायरा के फ़र्स्ट लुक में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन आमने सामने नज़र आए. दोनों के बीच की ख़ामोश टक्कर ही फिल्म के बड़े टकराव का इशारा देती है. बेहद सादगी से तैयार किया गया यह पोस्टर इंसाफ़, नैतिकता और सच जैसे गहरे सवालों की झलक देता है. भव्य विज़ुअल्स के दौर में दायरा ने साबित किया कि दमदार किरदारों वाला फ़र्स्ट लुक भी लंबे समय तक याद रह सकता है.
ईथा
लक्ष्मण उतेकर की ईथा के फ़र्स्ट लुक ने श्रद्धा कपूर को उनके अब तक के सबसे ख़ूबसूरत और अलग अंदाज़ में पेश किया. संस्कृति की खुशबू और भावनाओं से भरपूर इस पोस्टर ने परंपरा और रहस्य का अनोखा मेल दिखाया. ज़्यादा खुलासा किए बिना श्रद्धा कपूर की असरदार मौजूदगी ने दर्शकों को फिल्म की दुनिया में खींच लिया और ईथा साल के सबसे यादगार फ़र्स्ट लुक्स में शामिल हो गई.
हैवान
प्रियदर्शन की हैवान ने आते ही हलचल मचा दी. अक्षय कुमार और सैफ़ अली ख़ान के बिल्कुल अलग अंदाज़ वाले किरदारों ने फिल्म की रहस्यमयी और ख़तरनाक दुनिया की झलक दिखाई. बिना ज़्यादा राज़ खोले, सिर्फ़ सस्पेंस, तनाव और दोनों सितारों की दमदार मौजूदगी के दम पर यह फ़र्स्ट लुक लोगों की उत्सुकता कई गुना बढ़ा गया.
बंटवारा 1947
बंटवारा 1947 के फ़र्स्ट लुक में सनी देओल, शबाना आज़मी और प्रीति ज़िंटा एक साथ नज़र आए. पोस्टर ने भारत के बंटवारे के दर्द और उसके भावनात्मक असर को बेहद संजीदगी से पेश किया. बिना किसी दिखावे के यह पोस्टर किसी ऐतिहासिक तस्वीर जैसा असर छोड़ता है और लंबे समय तक याद रह जाता है.
टॉक्सिक
टॉक्सिक के साथ यश ने वही किया जिसकी उनके चाहने वालों को उम्मीद थी. दमदार, रफ़ एंड टफ़ और देखते ही नज़रें थाम लेने वाला फ़र्स्ट लुक. यश का रौबदार अंदाज़, ख़तरनाक तेवर और बड़े पर्दे वाला करिश्मा इस पोस्टर में साफ़ झलकता है. इसने एक बार फिर साबित किया कि कभी कभी सिर्फ़ एक ज़बरदस्त स्क्रीन प्रेज़ेंस ही फ़र्स्ट लुक को आइकॉनिक बनाने के लिए काफ़ी होती है.
मायावती ने संत रविदास नगर का नाम बहाल होने का किया स्वागत, अन्य जिलों के पुराने नाम लौटाने की मांग
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने संत रविदास नगर का नाम दोबारा बहाल किए जाने के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि राज्य के उन अन्य जिलों के नाम भी फिर से बहाल किए जाएं, जिन्हें पहले संतों, महापुरुषों और समाज सुधारकों के नाम पर रखा गया था.
मायावती ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि बसपा सरकार ने प्रशासनिक मजबूती और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए कई नए जिलों का गठन किया था. इन जिलों के नाम समाज के प्रेरणास्रोत महापुरुषों और संतों के नाम पर रखे गए थे.
बसपा सरकार के फैसलों का किया जिक्र
बसपा प्रमुख ने कहा कि उनकी सरकार के दौरान कई ऐसे प्रशासनिक फैसले लिए गए थे, जिनका उद्देश्य क्षेत्रीय विकास और बेहतर प्रशासन व्यवस्था को मजबूत करना था. उन्होंने दावा किया कि नए जिलों का गठन जनता की सुविधा और प्रशासन को लोगों के करीब पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया था. साथ ही, कई जिलों के नाम संतों, समाज सुधारकों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के सम्मान में रखे गए थे.
1. जैसाकि मीडिया की ख़बरों से सर्वविदित है कि यूपी की वर्तमान सरकार ने, बी.एस.पी. सरकार द्वारा भदोही को राज्य मुख्यालय का दर्जा देते हुये संत रविदास नगर के नाम से नया ज़िला बनाया था और जिसे समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार ने अपनी संकीर्ण जातिवादी मानसिकता के तहत् बदल दिया था, इसे…
— Mayawati (@Mayawati) July 31, 2026
नाम बदलने को लेकर उठाए सवाल
मायावती ने आरोप लगाया कि बाद की सरकारों ने राजनीतिक और जातिगत सोच के चलते कई जिलों के नाम बदल दिए. उन्होंने कहा कि संत रविदास नगर, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर और भीमनगर जैसे जिलों के नाम बदलना उचित नहीं था.
उन्होंने कहा कि महापुरुषों के नाम पर रखे गए जिलों का नाम बदलना उनके सम्मान से जुड़ा विषय है. ऐसे नाम समाज को उनके योगदान और विचारों की याद दिलाते हैं.
कांशीराम के नाम पर बने जिले का नाम लौटाने की मांग
मायावती ने विशेष रूप से कासगंज जिले का उल्लेख करते हुए सरकार से इसका पुराना नाम बहाल करने की मांग की. उन्होंने कहा कि बसपा सरकार ने कासगंज को मान्यवर कांशीराम के नाम पर जिला बनाया था, लेकिन बाद में इसका नाम बदल दिया गया.
उन्होंने मांग की कि मान्यवर कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस 9 अक्टूबर से पहले या उसी दिन उनके नाम पर बनाए गए जिले का मूल नाम वापस किया जाए. मायावती ने कहा कि यदि सरकार ऐसा कदम उठाती है तो यह महापुरुषों के सम्मान की दिशा में सकारात्मक पहल होगी.
महापुरुषों के सम्मान को बताया जरूरी
बसपा प्रमुख ने कहा कि संतों और समाज सुधारकों के नाम से जुड़े स्थानों की पहचान बनाए रखना जरूरी है. उनके अनुसार, ऐसे नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं होते, बल्कि समाज के इतिहास और संघर्षों को भी दर्शाते हैं.
उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार संत रविदास नगर के नाम बहाली के बाद अन्य जिलों के नामों पर भी सकारात्मक निर्णय लेगी.
राजनीतिक गलियारों में तेज हुई चर्चा
मायावती की इस मांग के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जिलों के नाम बदलने का मुद्दा चर्चा में आ गया है. बसपा इसे सामाजिक सम्मान और महापुरुषों की विरासत से जोड़ रही है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे राज्य की सियासत में एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में देख रहे हैं. अब देखना होगा कि सरकार अन्य जिलों के नामों को लेकर क्या निर्णय लेती है.
य़ह भी पढ़ें - जौहर यूनिवर्सिटी पर रुकी बुलडोजर की कार्रवाई तो मायावती ने दिया ये रिएक्शन, योगी सरकार को दी ये सलाह
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation




















