ब्रह्मपुरी में पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर परिवार? निर्माण को लेकर विवाद और पलायन का दावा
उत्तर-पूर्वी दिल्ली का ब्रह्मपुरी इलाका वर्ष 2020 के दंगों के दौरान भी चर्चा में रहा था. अब इसी इलाके से कुछ पुराने हिंदू परिवारों के पलायन का दावा सामने आया है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, ब्रह्मपुरी में कभी ब्राह्मण परिवारों की बड़ी संख्या हुआ करती थी. लेकिन समय के साथ इलाके की आबादी और संपत्तियों के स्वामित्व में बदलाव आया है. कुछ हिंदू परिवारों का आरोप है कि वे अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अपने दशकों पुराने पुश्तैनी मकान बेचकर इलाके से जाने पर विचार कर रहे हैं. न्यूज़ नेशन ने ब्रह्मपुरी की गलियों में जाकर इस पूरे मामले की ग्राउंड रिपोर्ट की और परिवारों, स्थानीय लोगों के साथ-साथ संबंधित पक्ष से भी बात करने की कोशिश की.
घर के बाहर लगा 'हिंदू पलायन' का पोस्टर
ब्रह्मपुरी की संकरी गलियों में एक पुराने मकान के बाहर कुछ पोस्टर दिखाई दिए. इनमें लिखा था— 'ये हिंदू घर बिकाऊ है', 'हिंदू पलायन के लिए मजबूर है' और 'ब्राह्मण परिवार खुद को असुरक्षित समझता है'. यह मकान करीब 60 से 70 साल पुराना बताया जा रहा है. परिवार का आरोप है कि आसपास लगातार नए निर्माण हुए हैं और पड़ोस में बन रहे एक बहुमंजिला मकान की वजह से उनके पुराने घर की दीवारों और पिलरों में दरारें आ गई हैं.
परिवार का दावा है कि पुराने प्लास्टर के झड़ने, दीवारों में आई दरारों और निर्माण की वजह से मकान की स्थिति चिंताजनक हो गई है. घर में बुजुर्ग और बच्चे रहते हैं, इसलिए परिवार को बारिश के दौरान किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है. परिवार इसे केवल निर्माण से जुड़ा विवाद नहीं, बल्कि अपने ऊपर बढ़ते दबाव के तौर पर देख रहा है. हालांकि, 'लैंड जिहाद' जैसे शब्द परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए आरोपों का हिस्सा हैं; इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि न्यूज़ नेशन नहीं करता.
MCD के आदेश और पुलिस को दी गई जानकारी का दावा
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान परिवार ने दिल्ली नगर निगम से जुड़े कुछ दस्तावेज न्यूज़ नेशन को दिखाए. परिवार के मुताबिक, पास में चल रहे निर्माण को रोकने के संबंध में जुलाई महीने में एमसीडी की ओर से कार्रवाई की गई थी. परिवार का दावा है कि निर्माण रोकने से जुड़े आदेश के अनुपालन के लिए स्थानीय पुलिस को भी इसकी जानकारी दी गई थी. इसके बावजूद निर्माण जारी रहने का आरोप परिवार ने लगाया.
परिवार के दोनों भाइयों का कहना है कि उन्होंने मामले को लेकर संबंधित सरकारी विभागों में शिकायत की और कानूनी प्रक्रिया का पालन किया. उनका सवाल है कि अगर निर्माण को लेकर नगर निगम की ओर से आदेश जारी हुआ है, तो मौके पर काम क्यों नहीं रुक रहा?
परिवार का आरोप है कि लगातार निर्माण और दबाव की वजह से इलाके में बचे पुराने हिंदू परिवारों को भी अपने मकान बेचकर कहीं और जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. हालांकि, इस मामले में एमसीडी और दिल्ली पुलिस का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है और उपलब्ध दस्तावेजों तथा संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी.
मुस्लिम पक्ष ने आरोपों को नकारा
न्यूज़ नेशन ने हिंदू परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों पर पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम पक्ष से भी बात करने की कोशिश की. ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से हमारी टीम से आपत्ति जताई गई. कैमरा चलाने और सरकारी गली में रिपोर्टिंग करने को लेकर सवाल उठाए गए. कुछ लोगों ने संवाददाता राहुल डबास से भी तीखे अंदाज में बातचीत की.
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि पड़ोसी परिवार की ओर से उन्हें कानूनी मामलों में फंसाने की कोशिश की जा रही है और उन्हें भी हिंदू पक्ष से परेशानी है. यानी दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं. हिंदू परिवार जहां निर्माण और दबाव के कारण खुद को परेशान बता रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और खुद को भी विवाद में परेशान किए जाने की बात कहता है.
घनी आबादी में पुराने और नए निर्माण की चुनौती
ब्रह्मपुरी दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाकों में शामिल है. यहां कई मकान पुराने हैं और उनके आसपास बेहद कम जगह में नए निर्माण भी लगातार होते रहे हैं. ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान स्थानीय लोगों ने पुराने भवन हादसों से जुड़ी खबरों और समाचार कटिंग का हवाला दिया. लोगों के मुताबिक, क्षेत्र में पहले भी निर्माणाधीन इमारतों और भवनों से जुड़े हादसे सामने आ चुके हैं. पुराने मकानों में दरारें और नए निर्माण को लेकर विवाद ऐसे घने इलाकों में सुरक्षा का गंभीर सवाल बन सकता है. ऐसे में यह जरूरी है कि निर्माण की वैधता, भवन की सुरक्षा और नियमों के पालन की जांच संबंधित सरकारी एजेंसियां करें.
सवाल सिर्फ पलायन का नहीं, सुरक्षा और कानून के पालन का भी. ब्रह्मपुरी की इस कहानी में कई सवाल एक साथ सामने आते हैं.
- क्या पुराने मकान में आई दरारें आसपास हो रहे निर्माण की वजह से हैं?
- क्या संबंधित निर्माण भवन नियमों के मुताबिक हो रहा है?
- एमसीडी के आदेश के बाद भी अगर निर्माण जारी है तो इसकी वजह क्या है?
- और सबसे बड़ा सवाल—क्या वास्तव में पुराने हिंदू परिवार इलाके से पलायन कर रहे हैं या यह संपत्ति और निर्माण से जुड़ा स्थानीय विवाद है?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और मौके की तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है. फिलहाल, ब्रह्मपुरी में रहने वाला यह परिवार अपने पुश्तैनी घर की सुरक्षा को लेकर चिंतित है और पलायन की बात कर रहा है. वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी पक्ष अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज कर रहा है. ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, निर्माण नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए और किसी भी पक्ष की सुरक्षा को लेकर शिकायत है तो उसका समाधान कानून के तहत किया जाए.
नेपाल में बाढ़ राहत के लिए भारत ने भेजी 68.5 टन सामग्री और विशेषज्ञ टीम
शिरीष बी प्रधान काठमांडू, 30 अगस्त भारत ने बाढ़ प्रभावित नेपाल को 68.5 टन राहत सामग्री उपलब्ध कराई है और खोज तथा बचाव अभियानों में सहायता के लिए तकनीकी टीम, फॉरेंसिक विशेषज्ञ और उपकरण भेजे हैं। भारतीय दूतावास ने यह जानकारी दी। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने शनिवार को जारी एक बयान में कहा कि भारत ने एक विशेषज्ञ तकनीकी दल भेजा है, जिसमें सुरंग संबंधी विशेषज्ञ और खोज एवं बचाव अभियानों के लिए सहायक उपकरण शामिल हैं।
यह सहायता उन जलविद्युत सुरंगों के लिए भेजी गई है जहां बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका है। विदेश मंत्रालय ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि 11 टन राहत सामग्री लेकर चौथा विमान रविवार को नेपाल पहुंचा। विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘‘इसमें सुरंग संबंधी विशेषज्ञ दल के साथ-साथ खोज और बचाव अभियानों के लिए सहायक उपकरण, डीएनए विश्लेषण के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों की एक टीम और कंबल, ‘स्लीपिंग बैग’, तिरपाल, प्लास्टिक शीट और स्वच्छता किट सहित राहत आपूर्ति शामिल है।’’ दूतावास ने बताया कि चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों और सुरंग संबंधी विशेषज्ञों की 11 सदस्यीय भारतीय तकनीकी टीम शुक्रवार को काठमांडू पहुंची थी और उसने शनिवार को नुवाकोट जिले के बाढ़ प्रभावित त्रिशूली क्षेत्र में जलविद्युत सुरंगों का मुआयना किया।
राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, टीम ने सुरंग क्षेत्र के आसपास बचाव संबंधी कार्य शुरू करने से पहले चिलिमे और लांगटांग क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण भी किया। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस के जवानों की 82 सदस्यीय संयुक्त सुरक्षा टीम शुक्रवार रात से मलबे को हटाने और सुरंग के भीतर फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए काम कर रही है। आपदा के बाद नेपाल ने ‘डीएनए’ परीक्षण, फॉरेंसिक कार्य और अन्य विशिष्ट कार्यों के लिए कई देशों से मदद मांगी थी।
दूतावास ने बताया कि इसके अलावा 230 फुट लंबे ‘बेली ब्रिज’ के उपकरण लेकर 16 ट्रक नेपाल पहुंच चुके हैं। दूतावास ने कहा, ‘‘सात और बेली ब्रिज तैयार करने के लिए जल्द ही उपकरणों को पहुंचाया जाएगा। उन्हें तैयार करने के लिए तकनीकी टीम भी जल्द पहुंच सकती है।’’ नेपाल ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में परिवहन संपर्कों को बहाल करने के लिए 42 बेली ब्रिज के निर्माण के लिए भारत और चीन से सहायता मांगी है।
इन बेली ब्रिज को भारी मशीनरी या विशेष उपकरणों के बिना जल्दी से जोड़ कर तैयार किया जा सकता है। नेपाल सेना के अनुसार, नेपाली सुरक्षा बलों ने देश में विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों से अब तक 191 कर्मचारियों को निकाला है। हालांकि, सुरंगों के अंदर अधिक लोगों के फंसे होने की सूचना के बाद नेपाल ने भारत से सहायता मांगी।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास रसुवा जिले में अपर त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3ए जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी सुरंगों के अंदर कई लोगों के फंसे होने की आशंका है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी गलियारे में बुधवार को आई अचानक बाढ़ में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और सड़कों, पुलों, मानव बस्तियों और जलविद्युत बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचा।
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