Explainer: बारिश नहीं हुई, फिर अचानक नदी में कैसे आया मौत का सैलाब? नेपाल की फ्लैश फ्लड का समझें विज्ञान...
Nepal Flash Flood: नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार सुबह भोटे कोशी नदी में जो सैलाब आया उसने पुरी दुनिया का ध्यान अपनी तरीख खींचा है. सोशल मीडिया पर लोग अब ये सवाल कर रहे हैं कि आखिर जब उस इलाके में उस वक्त तेज बारिश नहीं हो रही थी तो फिर नदी में इतना पानी अचानक आया कहां से आया?
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय जैसी ऊंची पहाड़ी इलाकों में बर्फ की विशाल चट्टानें लगातार पिघल रही होती हैं. यह पिघला हुआ पानी अक्सर ग्लेशियर के पास ही एक प्राकृतिक झील का रूप ले लेता है. अब जब यह झील किसी वजह से अचानक फट जाती है तो उसमें जमा पूरा पानी एक ही झटके में नीचे की तरफ बह आता है. इसी घटना को वैज्ञानिक भाषा में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है.
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का बयान
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➡️ 'भूकंप की वजह से भूस्खलन और हिमस्खलन हुआ'
➡️ 'भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक आई बाढ़'#NepalFlood #FlashFlood #NewsNation | @Madhurendra13 pic.twitter.com/pkModeWF5z
ये झीलें बाढ़ कैसे बनती हैं?
जानकारी के अनुसार जब ग्लेशियर पिघलता है तो उसका पानी अक्सर पत्थरों, मिट्टी और मलबे की एक प्राकृतिक दीवार के पीछे जमा हो जाता है. इस दीवार को मोरेन कहा जाता है. यह मोरेन किसी बांध की तरह काम करता है और पानी को रोके रखता है. अब जब जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पीछे खिसक रहे हैं तो नई-नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें भी आकार में बढ़ती जा रही हैं.
यह मोरेन दीवार अचानक टूटती क्यों है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक मोरेन की यह दीवार बहुत मजबूत नहीं होती है. दरअसल, यह सिर्फ एक ढीली मिट्टी और पत्थरों से बनी होती है. जो आसानी से ढह सकती है. भूस्खलन झील में गिरता है जिससे पानी का स्तर और दबाव अचानक इतना बढ़ जाता है और मोरेन दीवार टूट जाती है.
भोटे कोशी नदी के मामले में क्या आशंका जताई जा रही है?
रसुवा में आई इस बाढ़ में अभी तक कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन अधिकारियों का मानना है कि तिब्बत क्षेत्र में हुई तेज बारिश और ग्लेशियर झील के फटने से इस आपदा आने की आशंका है. बता दें 2025 में भी भोटे कोशी नदी में बाढ़ आई थी, जो ग्लेशियर झील के फटने से आई बताई गई थी.
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क्या ये बाढ़ केवल नेपाल की समस्या है?
नेपाल में आई बाढ़ से यूपी, बिहार को भी खतरा है. इससे पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र को खतरा है. फिलहाल अगले कुछ घंटे भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान जैसे देश अलर्ट पर हैं. जानकारी के मुताबिक इस विशाल पर्वत श्रृंखला में हजारों की संख्या में ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं और जलवायु वैज्ञानिकों के मुताबिक बढ़ते तापमान के साथ इनकी संख्या और आकार दोनों लगातार बढ़ रहे हैं.
यह बाढ़ सामान्य बाढ़ से कितनी खतरनाक होती है?
ग्लेशियर झील से निकलने वाला पानी सामान्य बारिश की बाढ़ से कहीं ज्यादा विनाशकारी माना जाता है. इसकी वजह यह है कि यह पानी बेहद ऊंचाई से और भारी रफ्तार के साथ नीचे आता है और अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर और मलबा भी बहा ले जाता है. इससे बचाव के लिए प्रशासन द्वारा हिमालयी जगहों पर खतरनाक झीलों की पहचान कर उन पर निगरानी बढ़ाने का काम चल रहा है.
नेपाल में मची तबाही पर सीएम योगी का बयान
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➡️ भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ से क्षति अत्यंत चिंताजनक -सीएम योगी
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बर्फ और चट्टानों के विशाल हिमस्खलन
अब तक की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई इस तबाही के पीछे बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन है. हिमस्खलन ने ल्हेंडे नदी के रास्ते को अस्थायी रूप से रोक दिया था जिससे ऊपर पानी जमा हुआ और फिर अचानक अवरोध टूटने पर नीचे की ओर विनाशकारी फ्लैश फ्लड आ गई. हालांकि वैज्ञानिक अभी इस तबाही की तह तक जाने में लगे हैं और मौके पर सरकार का बचाव कार्य जारी है.
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ग्लेशियर झीलें बेहद खतरनाक क्यों?
एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियर झीलें इसलिए बेहद खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि ग्लेशियरों के पिघलने से ऊंचे पहाड़ों पर पानी जमा होकर झील बन जाती है और कई बार उसे रोकने वाला प्राकृतिक बांध बर्फ, मलबे या कमजोर चट्टानों का होता है. भूकंप, हिमस्खलन, भूस्खलन या अत्यधिक पानी के दबाव से यह प्राकृतिक बांध टूट सकता है और कुछ ही मिनटों में भारी मात्रा में पानी, बर्फ और मलबा नीचे की घाटियों में पहुंचकर जानलेवा बाढ़ ला सकता है.
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अयोध्या मंदिर विवाद में चंपत राय के पत्र के नए अंश सामने आए, 4 जून से जुलाई तक के घटनाक्रम पर उठे कई सवाल
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से जुड़े एक विवाद के बीच चंपत राय के पत्र के कुछ और अंश सामने आए हैं. पत्र में 4 जून से लेकर जुलाई तक की घटनाओं का क्रमवार उल्लेख करते हुए धन की कथित हेराफेरी, अंदरूनी पूछताछ, पुलिस में एफआईआर नहीं कराने के निर्णय और मंदिर निर्माण समिति से जुड़े पदाधिकारियों के बयानों को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं.
पत्र में चंपत राय ने घटनाक्रम के अलग-अलग चरणों का विवरण देते हुए बताया है कि 4 जून को मामला सामने आने के बाद संबंधित लोगों से पूछताछ और धन वापस कराने की प्रक्रिया शुरू हुई. इसके बाद 6, 7 और 8 जून को लगातार बैठकों का दौर चला. पत्र के अनुसार, इस दौरान काफी धनराशि वापस भी प्राप्त की गई.
4 जून से शुरू हुआ घटनाक्रम
पत्र के मुताबिक, 4 जून को धन से संबंधित पूरा मामला सामने आया. इसके बाद अंदरूनी स्तर पर जानकारी जुटाने और संबंधित लोगों से धन वापस कराने की कोशिश शुरू हुई. 6 से 8 जून तक चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव समेत अन्य लोग पीएफसी भवन में कई घंटे तक बैठे रहे.
8 जून को मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र और अनुप मित्तल अयोध्या पहुंचे. पत्र में कहा गया है कि उन्हें 4 जून से शुरू हुए पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी गई.
FIR को लेकर भी हुई चर्चा
पत्र में दावा किया गया है कि नृपेन्द्र मिश्र ने सवाल किया कि पुलिस में एफआईआर क्यों नहीं कराई गई. इसके जवाब में चंपत राय ने कथित तौर पर बताया कि यदि पुलिस में मामला दर्ज किया जाता तो जांच और आगे की कार्रवाई पूरी तरह पुलिस के हाथ में चली जाती.
पत्र के अनुसार, उस समय यह आशंका भी थी कि पुलिस जांच में कितना समय लगेगा और उसका परिणाम क्या होगा. साथ ही आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई थी.
सूचना लीक होने को लेकर उठी आशंका
पत्र में यह भी उल्लेख है कि धनराशि वापस मिलने के बाद एक दूसरा सवाल सामने आया कि पूरे मामले की जानकारी अखिलेश यादव तक किस माध्यम से पहुंची. इसी संदर्भ में संगठन के भीतर सूचना लीक होने और किसी ‘भेदिए’ की आशंका का जिक्र किया गया है.
हालांकि, पत्र में इस बात का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है कि जानकारी किस व्यक्ति ने बाहर पहुंचाई.
11 जून को संतों के सामने रखी गई जानकारी
चंपत राय के पत्र के अनुसार, 11 जून की शाम मंदिर परिसर में संतों की मौजूदगी में उन्होंने घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी साझा की. शेषावतार मंदिर पर ध्वजारोहण के बाद करीब 3,000 रामभक्तों के सामने चल रहे कथित दुष्प्रचार को लेकर संतों से अपने विचार रखने का आग्रह किया गया.
इसके बाद संतों के साथ हुई बैठक में गणना कक्ष से संबंधित कथित चोरी और उसके बाद की घटनाओं की जानकारी दी गई. पत्र में कहा गया है कि संतों ने उनकी बात स्वीकार की. इसी दौरान एक संत ने सवाल किया कि नृपेन्द्र मिश्र सार्वजनिक रूप से क्यों बोल रहे हैं.
नृपेन्द्र मिश्र के टीवी इंटरव्यू पर सवाल
पत्र के एक अन्य हिस्से में दावा किया गया है कि करीब 18 जून से नृपेन्द्र मिश्र ने दिल्ली में विभिन्न टेलीविजन चैनलों को इंटरव्यू देना शुरू किया. चंपत राय के अनुसार, लगभग चार दिनों में उन्होंने करीब 14 चैनलों से बातचीत की.
पत्र में कहा गया है कि शुरुआत में नृपेन्द्र मिश्र का दायित्व मंदिर निर्माण तक सीमित बताया जाता था, लेकिन बाद में उनके बयानों में मंदिर की दूसरी व्यवस्थाओं और कथित चोरी को लेकर भी टिप्पणी सामने आई. चंपत राय ने आरोप लगाया कि ‘चोरी’ की जगह ‘डकैती’ शब्द के इस्तेमाल से समाज में अलग संदेश गया.
जुलाई में भी जारी रही अंदरूनी चर्चा
पत्र के अनुसार, जुलाई के पहले सप्ताह में एक संत ने नृपेन्द्र मिश्र को लेकर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘खलनायक’ की भूमिका में बताया. इसके बाद 6 जुलाई को होने वाली ट्रस्ट बैठक में नृपेन्द्र मिश्र के अयोध्या आने की योजना भी चर्चा में रही.
पत्र में दावा है कि यात्रा के लिए टिकट बन चुका था और चालक को भी सूचना दी गई थी, लेकिन 4 जुलाई को अचानक यात्रा रद्द होने का संदेश आया. पत्र में इस बदलाव का कारण स्पष्ट किए जाने की आवश्यकता जताई गई है.
मंदिर की व्यवस्थाओं और हिसाब-किताब पर बड़ा सवाल
11, 12 और 13 जुलाई को नृपेन्द्र मिश्र तथा अनुप मित्तल के अयोध्या आने और चंपत राय से बातचीत का भी पत्र में उल्लेख है. इसके बाद 14 जुलाई को चंपत राय और अनुप मित्तल के बीच अलग से करीब एक घंटे बातचीत हुई.
चंपत राय ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि पिछले छह वर्षों में मंदिर निर्माण समिति की बैठकों में निर्माण से जुड़े तकनीकी मुद्दों पर तो विस्तार से चर्चा होती रही, लेकिन मंदिर की अन्य व्यवस्थाओं और हिसाब-किताब पर सामूहिक चर्चा क्यों नहीं हुई.
पत्र के अनुसार, अनुप मित्तल ने स्वीकार किया कि इन विषयों पर कभी विस्तृत सामूहिक चर्चा नहीं हुई और नृपेन्द्र मिश्र टेलीफोन के माध्यम से निर्देश देते रहे.
अब सामने हैं कई अनुत्तरित सवाल
चंपत राय के पत्र के इन अंशों के सामने आने के बाद विवाद से जुड़े कई सवाल फिर चर्चा में हैं. मसलन, कथित धन हेराफेरी के मामले में पुलिस शिकायत के बजाय अंदरूनी स्तर पर धन वापस कराने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई? सूचना बाहर कैसे पहुंची? नृपेन्द्र मिश्र ने लगातार टीवी इंटरव्यू क्यों दिए? बाद में उनके बयान अचानक क्यों रुक गए? और मंदिर की अन्य व्यवस्थाओं तथा वित्तीय मामलों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा की जरूरत क्यों महसूस हुई?
फिलहाल पत्र में दर्ज घटनाक्रम और सवालों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए. इन आरोपों और आशंकाओं पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, आधिकारिक जांच और संबंधित पक्षों के जवाब सामने आने के बाद ही निकाला जा सकता है.
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