हार्दिक ने तिरुमाला मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन किए:: सिर मुंडवाकर पहुंचे ऑलराउंडर; गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा साथ दिखीं
भारतीय टीम के स्टार ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या ने रविवार को तिरुमाला के वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की। इस दौरान हार्दिक पूरी तरह से सिर मुंडवाए हुए नजर आए। वे भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद लेने पहुंचे थे। हार्दिक के साथ उनकी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा भी मौजूद थीं। मंदिर में दर्शन के दौरान हार्दिक और माहिका दोनों ही पारंपरिक सफेद कपड़ों में दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर दोनों की तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, जो तेजी से वायरल हो रहे हैं। फैंस के बीच चर्चा का विषय बना नया लुक हार्दिक का यह नया लुक फैंस के बीच काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। तिरुमाला मंदिर में श्रद्धालु अक्सर आस्था और आभार के प्रतीक के रूप में अपने बाल दान करते हैं। हालांकि, हार्दिक ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि उन्होंने सिर क्यों मुंडवाया है, लेकिन उनकी इस यात्रा ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। IPL 2026 के बाद से मैदान से बाहर यह मंदिर यात्रा हार्दिक के करियर के एक अहम मोड़ पर हुई है, क्योंकि वे चोट से उबरकर वापसी की कोशिश कर रहे हैं। हार्दिक पंड्या IPL 2026 के बाद से चोट के कारण क्रिकेट से दूर हैं। पहले उन्हें पीठ में अकड़न की समस्या हुई, फिर जांघ की चोट ने उनकी वापसी टाल दी। IPL 2026 में उन्होंने मुंबई इंडियंस की कप्तानी की थी, लेकिन पांच बार की चैंपियन टीम प्लेऑफ में जगह नहीं बना सकी। अफगानिस्तान, इंग्लैंड और जिम्बाब्वे दौरे से भी रहे बाहर चोट के कारण हार्दिक अफगानिस्तान के खिलाफ लिमिटेड ओवर सीरीज, इंग्लैंड दौरे की वनडे और टी-20 सीरीज तथा जिम्बाब्वे के खिलाफ व्हाइट-बॉल सीरीज भी नहीं खेल सके। उन्होंने IPL 2026 के बाद से कोई प्रतिस्पर्धी मैच नहीं खेला है। ऐसे में माना जा रहा है कि तिरुमाला में पूजा-अर्चना के साथ वह अब मैदान पर वापसी की तैयारियों में जुट गए हैं। ------------------------------------------------------------ स्पोर्ट्स की यह खबर भी पढ़ें… जसप्रीत बुमराह श्रीलंका टेस्ट सीरीज से बाहर:घुटने की चोट से उबर नहीं पाए, 15 अगस्त से खेली जाएगी सीरीज भारत के तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह श्रीलंका के खिलाफ होने वाली दो मैचों की टेस्ट सीरीज से बाहर हो गए हैं। सीरीज का पहला मैच 15 अगस्त से गॉल में खेला जाएगा। बुमराह बाएं घुटने की चोट से उबर रहे थे। बेंगलुरु में मौजूद BCCI के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में उनका रिहैबिलिटेशन चल रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड की मेडिकल टीम ने उन्हें अभी वापसी न करने की सलाह दी है। उन्हें पूरी तरह ठीक होने तक आराम करने को कहा गया है। पूरी खबर
लहर-लहर:खदानें, इमारतें, कारखाने नहीं... मुल्क की सबसे बड़ी दौलत नौजवान होते हैं
जब मैंने काम शुरू किया, तब मैं अपने से बड़ों के बीच था। मैंने सिप्पी फिल्म्स जॉइन की थी। रमेश सिप्पी साहब की ‘अंदाज’ बन रही थी। उस वक्त मेरी उम्र पच्चीस साल थी और रमेश जी छब्बीस के थे। लेकिन हमारे आसपास लगभग सभी हमसे उम्र में बड़े थे। उनसे हमने सीखा, उन्हें देखा, उनकी बातें सुनीं। फिर वक्त बदला। धीरे-धीरे हमारी उम्र के लोग इंडस्ट्री में आए। उसके बाद हमसे कम उम्र के लोग आने लगे। और आज जिन लोगों के साथ मैं काम करता हूं, उनमें से कई तो मेरे पोती-पोतों की उम्र के हैं। लोग अक्सर पूछते हैं कि इतने साल बाद भी आप अपने आपको प्रासंगिक कैसे बनाए हुए हैं। इसका कोई फॉर्मूला नहीं है, कोई जादू नहीं है। बस एक बात है- अगर आपके भीतर यह विनम्रता बची हुई है कि आप नई पीढ़ी की बात सुन सकें, उनसे सीख सकें और यह मान सकें कि दुनिया बदल रही है, तभी आप समय के साथ चल सकते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि आदमी यह मान बैठे कि ‘मुझे सब पता है।’ जिस दिन आपको यह यकीन हो जाए कि ‘मैं ही सबसे ज्यादा जानता हूं’, उसी दिन आपकी सीखने की उम्र खत्म हो जाती है। अगर आप यह समझने लगें कि आपसे छोटों को दुनिया की कोई समझ नहीं है और बड़े भी आपसे ज्यादा नहीं जानते थे, तो आप अपने चारों तरफ दीवार खड़ी कर लेते हैं। आप तभी प्रासंगिक बने रह सकते हैं जब आपके भीतर इतनी विनम्रता हो कि यह स्वीकार कर सकें कि दुनिया बदल रही है। अगर आप नौजवानों की बात सुन सकते हैं, उनसे सीखने के लिए तैयार हैं और उन्हें समझने की कोशिश करते हैं, तो आप कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। किसी भी मुल्क की सबसे बड़ी दौलत उसकी खदानें, इमारतें या कारखाने नहीं होते; उसके नौजवान होते हैं। अगर नौजवानों के पास खुला दिमाग है, नई बातें सीखने की बेचैनी है और दुनिया को बेहतर बनाने का जज्बा है, तो उस देश का भविष्य सुरक्षित है। हमें नई पीढ़ी का सम्मान करना होगा। सच तो यह है कि हम इस दुनिया में ठहरने की अपनी बारी से कुछ ज्यादा ही ‘ठहर गए’ हैं; यह दुनिया असल में नई जेनरेशन की है। हां, यह भी सच है कि कुछ बातें अनुभव ने हमें सिखाई हैं, जो उन्हें अभी नहीं मालूम हैं, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि आज की दुनिया के बारे में बहुत-सी बातें वे जानते हैं, जिनकी हमें पूरी खबर नहीं। अगर दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे से सीखने के लिए तैयार हों, तभी दोनों आगे बढ़ेंगे। हर नई पीढ़ी अपने साथ कुछ नया लेकर आती है। वह अपने बड़ों से कुछ सीखती है, लेकिन उनकी गलतियों को दोहराने के लिए पैदा नहीं होती। उसका काम है उनसे आगे जाना। अगर हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज्यादा समझदार, संवेदनशील और आजाद न बने, तो तरक्की का मतलब ही क्या रह जाएगा? एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि लोग सुनते नहीं हैं, यानी जब आप बात कर रहे हैं तो मैं सुन नहीं रहा हूं, मैं ‘वेट’ कर रहा हूं कि जब ये चुप हों तो मैं अपनी बात कहूं। तो हम ‘वेटिंग टु टॉक’ हैं, ‘वेटिंग टु लिसनिंग’ नहीं। लेकिन वो एक बात है न कि- हमीं हम हैं तो क्या हम हैं, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो। तो दूसरे के भी ‘पॉइंट ऑफ व्यू’ को देखो। इतना सेल्फ सेंटर्ड एट्टिट्यूड और सेल्फिशनेस होगी तो दुनिया गड़बड़ हो जाएगी। मैं नौजवानों से हमेशा यही कहता हूं- दुनिया को अपनी आंखों से देखिए और उन लोगों की बात भी सुनिए जो आपसे अलग सोचते हैं। किसी बात को सिर्फ इसलिए सच मत मान लीजिए कि उसे बहुत लोग मानते हैं और किसी नए खयाल को सिर्फ इसलिए खारिज मत कर दीजिए कि वह नया है। मैं यह नहीं कहता कि हर पुरानी बात गलत है। मेरा सिर्फ इतना कहना है कि हर विचार- चाहे वह कितना ही पुराना क्यों न हो- तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। जो बात सही होगी, वह और मजबूत होकर सामने आएगी; जो गलत होगी, उसे बदल देना चाहिए। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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