भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने 'समुद्र मंथन' राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दे दी है। वहीं किसानों के हितों को लगातार प्राथमिकता देने का संदेश देते हुए मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने का फैसला किया है। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में कृषि, ऊर्जा, खेल और हरित विकास पर केंद्रित फैसलों के साथ कुल 4 लाख 41 हजार 209 करोड़ रुपये की योजनाओं को मंजूरी दी गयी है। सरकार का मानना है कि ये निर्णय एक ओर किसानों की आय को स्थिर आधार देंगे तो दूसरी ओर भारत को ऊर्जा, खेल और हरित विकास के क्षेत्र में दीर्घकालिक मजबूती प्रदान करेंगे।
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी मीडिया को दी। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा फैसला प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को लेकर लिया गया है। मंत्रिमंडल ने इस योजना को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने की मंजूरी देते हुए इसके लिए 3 लाख 15 हजार 614 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। योजना के तहत पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को हर वर्ष 6 हजार रुपये की सहायता तीन समान किस्तों में सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती रहेगी। मोदी सरकार का कहना है कि इससे किसानों को बुआई के समय नकदी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी, महंगे साहूकारी कर्ज पर निर्भरता कम होगी और बीज, उर्वरक तथा अन्य कृषि निवेश खरीदने में आसानी होगी। मोदी सरकार के अनुसार अब तक इस योजना के माध्यम से 23 किस्तों में 4.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि किसानों तक पहुंचाई जा चुकी है।
इसके अलावा, स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना के लिए 5,070 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। योजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में 5,000 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर क्षमता विकसित करना है। जलाशयों, नहरों और औद्योगिक जलाशयों पर स्थापित होने वाली ये परियोजनाएं बिना अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाएंगी। परियोजनाओं में ऊर्जा भंडारण प्रणाली भी शामिल होगी, जिससे राज्यों को बिजली की मांग के चरम समय में सहायता मिलेगी। मोदी सरकार का अनुमान है कि इससे हर वर्ष लगभग एक करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन कम होगा तथा 16 से 17 हजार प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
इसके अलावा, खेल क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के उद्देश्य से मंत्रिमंडल ने खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघ सहायता योजना के लिए कुल 36 हजार 441 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। इनमें खेलो इंडिया के लिए 29 हजार 54 करोड़ रुपये तथा राष्ट्रीय खेल महासंघों के लिए 7 हजार 387 करोड़ रुपये का प्रावधान है। मोदी सरकार के अनुसार इस निवेश से खेल अवसंरचना मजबूत होगी, प्रतिभाओं की पहचान और वैज्ञानिक प्रशिक्षण को बढ़ावा मिलेगा तथा भारत के ओलंपिक और पैरालंपिक लक्ष्यों को नई गति मिलेगी। साथ ही महिलाओं, पैरा खिलाड़ियों और पारंपरिक भारतीय खेलों को भी विशेष प्रोत्साहन मिलेगा।
साथ ही ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण निर्णय 'समुद्र मंथन' राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को माना जा रहा है। 84 हजार 84 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत समुद्री क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के लिए भूकंपीय सर्वेक्षण, गहरे समुद्र में ड्रिलिंग, साझा आधारभूत ढांचे के विकास और तेल एवं गैस क्षेत्र के विनिर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य घरेलू तेल और गैस भंडार बढ़ाना, उत्पादन में वृद्धि करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। अश्विनी वैष्णव द्वारा दिये गये प्रस्तुतीकरण के अनुसार योजना से घरेलू हाइड्रोकार्बन भंडार में उल्लेखनीय वृद्धि, विदेशी मुद्रा की बचत और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश तथा रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
देखा जाये तो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से भी 'समुद्र मंथन' योजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना है, लेकिन इसके व्यापक निहितार्थ इससे कहीं आगे जाते हैं। भारत वर्तमान में अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में समुद्री क्षेत्रों में नए तेल और गैस भंडारों का विकास देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले व्यवधानों के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा। इसके साथ ही अपतटीय क्षेत्रों में सर्वेक्षण, ड्रिलिंग और आधारभूत ढांचे का विस्तार हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की तकनीकी और औद्योगिक क्षमता को भी सुदृढ़ करेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि घरेलू विनिर्माण और अपतटीय ऊर्जा अवसंरचना के विकास से दीर्घकाल में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा आपूर्ति की विश्वसनीयता और आर्थिक सुरक्षा को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
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उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनसे अलग रह रहीं उनकी पत्नी पायल अब्दुल्ला के विवाह विच्छेद को मंजूरी दे दी। न्यायालय ने दोनों पक्षों की उस दलील का संज्ञान लिया जिसमें उन्होंने कहा कि वे अपनी अपनी जिंदगी में खुश हैं। न्यायालय ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलीलों पर ध्यान दिया।
उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह विच्छेद के लिए एक अर्जी दाखिल की गई है, क्योंकि दोनों पक्षों ने मामला सुलझा लिया है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा, “हम इसे अपने आदेश का हिस्सा बनाएंगे और उसी के अनुसार इसका निपटारा करेंगे।”
पीठ एक औपचारिक आदेश पारित करेगी। सिब्बल ने पीठ को बताया, “दोनों ने आजादी स्वीकार कर ली है।
मामला सुलझ गया है। अनुच्छेद 142 के तहत अर्जी दाखिल कर दी गई है। माननीय न्यायाधीशगण तलाक मंजूर कर सकते हैं।”
पीठ ने पूछा, “यह अर्जी कब दर्ज हुई?”
बताया गया कि अर्जी 22 जुलाई को दाखिल की गई थी।
सिब्बल ने कहा, “बाकी सभी मामले वापस ले लिए जाएंगे। यह सब (आवेदन में) बताया गया है।”
पीठ दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिनमें उमर अब्दुल्ला की ओर से क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग वाली याचिका भी शामिल थी। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाली उमर अब्दुल्ला की याचिका पर जुलाई 2024 में पायल अब्दुल्ला से जवाब मांगा था।
उच्च न्यायालय ने 12 दिसंबर 2023 को उमर अब्दुल्ला की तलाक की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि उनकी अपील में कोई दम नहीं था। अदालत ने उन्हें तलाक की डिक्री देने से इनकार करने वाले 2016 के कुटुंब अदालत के आदेश को बरकरार रखा था। कुटुंब अदालत ने 30 अगस्त 2016 को उमर अब्दुल्ला की याचिका खारिज कर दी थी।
अदालत ने कहा कि वह “क्रूरता” या “परित्याग” (साथ छोड़ देने) के अपने दावों को साबित नहीं कर पाए, जो तलाक की डिक्री पाने के लिए उनके द्वारा बताए गए आधार थे। तलाक की अपनी अर्जी में, उमर अब्दुल्ला ने कुटुंब अदालत में दावा किया था कि उनकी शादी पूरी तरह से टूट चुकी है और 2007 से उनके बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहा है; साथ ही एक सितंबर 1994 को हुई शादी के बाद यह जोड़ा 2009 से अलग-अलग रह रहा है। अधीनस्थ अदालत में दायर याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि पायल ने उमर अब्दुल्ला के साथ “अनुचित व्यवहार” किया, जिससे राजनेता को पीड़ा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ ने अगस्त 2023 में उमर अब्दुल्ला को अलग रह रही अपनी पत्नी को हर महीने 1.5 लाख रुपये का अंतरिम गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया था। उन्हें उनके दोनों बेटों में से हर एक की पढ़ाई के लिए भी हर महीने 60,000 रुपये देने का आदेश दिया गया। उच्च न्यायालय का यह आदेश पायल अब्दुल्ला और उनके बेटों की उन याचिकाओं पर आया था जो अधीनस्थ अदालत के 2018 के आदेशों के खिलाफ दायर की गई थीं।
इन आदेशों में उन्हें पायल को 75,000 रुपये और बच्चों के बालिग होने तक उन्हें 25,000 रुपये का अंतरिम गुजारा-भत्ता देने की बात कही गई थी।
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