भारतीय रेलवे ने टिकट बुकिंग के साथ शुरू की अतिरिक्त सामान की ऑनलाइन बुकिंग
नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय रेलवे ने यात्रियों की सुविधा बढ़ाने के लिए शुक्रवार को एक नई डिजिटल सेवा शुरू की है। अब ट्रेन में यात्रा करने वाले यात्री टिकट बुक करते समय ही अतिरिक्त सामान की ऑनलाइन बुकिंग और भुगतान कर सकेंगे। इस नई व्यवस्था से यात्रियों को ट्रेन में चढ़ने से पहले अलग से पार्सल कार्यालय जाकर अतिरिक्त सामान बुक कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
अब तक निर्धारित मुफ्त सीमा से अधिक सामान ले जाने वाले यात्रियों को रेलवे के पार्सल काउंटर पर जाकर अलग से बुकिंग करानी पड़ती थी, जिससे अतिरिक्त कागजी कार्रवाई और लंबी कतारों का सामना करना पड़ता था। नई ऑनलाइन सुविधा इस पूरी प्रक्रिया को आसान और तेज बनाएगी।
रेलवे ने स्पष्ट किया है कि यह सुविधा केवल कन्फर्म टिकट वाले यात्रियों के लिए उपलब्ध होगी और केवल उन्हीं श्रेणियों में लागू होगी, जहां निर्धारित शुल्क देकर मुफ्त सीमा से अधिक सामान ले जाने की अनुमति है। एसी फर्स्ट क्लास, एसी 2-टियर, फर्स्ट क्लास, स्लीपर क्लास और सेकेंड क्लास के यात्री इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगे। वहीं, एसी 3-टियर और एसी चेयर कार में यात्रा करने वाले यात्रियों को यह सुविधा नहीं मिलेगी, क्योंकि इन श्रेणियों में अधिकतम अनुमत सामान की सीमा और मुफ्त सामान की सीमा समान है।
रेलवे के मौजूदा सामान नियमों के अनुसार, एसी फर्स्ट क्लास के यात्री बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के 70 किलोग्राम तक सामान ले जा सकते हैं और शुल्क देकर अधिकतम 150 किलोग्राम तक सामान ले जाने की अनुमति है। एसी 2-टियर और फर्स्ट क्लास में 50 किलोग्राम मुफ्त तथा अधिकतम 100 किलोग्राम तक सामान ले जाया जा सकता है।
स्लीपर क्लास के यात्रियों के लिए 40 किलोग्राम तक सामान मुफ्त है और वे शुल्क देकर कुल 80 किलोग्राम तक सामान ले जा सकते हैं। सेकेंड क्लास में 35 किलोग्राम मुफ्त तथा अधिकतम 70 किलोग्राम तक सामान ले जाने की अनुमति है।
दूसरी ओर, एसी 3-टियर और एसी चेयर कार के यात्रियों के लिए 40 किलोग्राम की सीमा ही मुफ्त और अधिकतम अनुमत सीमा दोनों है। इसलिए इन श्रेणियों में अतिरिक्त सामान बुक कराने का विकल्प उपलब्ध नहीं होगा।
रेलवे ने यह भी स्पष्ट किया है कि मुफ्त सीमा से अधिक लेकिन निर्धारित अधिकतम सीमा के भीतर सामान ले जाने वाले यात्रियों को अतिरिक्त सामान शुल्क का भुगतान करना होगा।
वजन सीमा के अलावा, रेलवे ने सामान के आकार को लेकर भी नियम तय किए हैं। सामान्यतः यात्री डिब्बों के भीतर 100 सेंटीमीटर × 60 सेंटीमीटर × 25 सेंटीमीटर तक के ट्रंक, सूटकेस या बक्से ले जा सकते हैं। हालांकि एसी 3-टियर और एसी चेयर कार में यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए सामान का अधिकतम आकार 55 सेंटीमीटर × 45 सेंटीमीटर × 22.5 सेंटीमीटर निर्धारित किया गया है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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भगवान शिव और माता पार्वती की अनोखी चौसर खेल: जब खेल-खेल में हुआ बड़ा विवाद
Lord Shiva and Mata Parvati story: पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती शांत वातावरण में चौसर (पासा) खेल रहे थे। उनके साथ उनके सेवक नंदी भी वहीं मौजूद थे। खेल के दौरान दोनों के बीच हंसी-मजाक और नोकझोंक चल रही थी। खेल आगे बढ़ा तो दोनों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि इस दौर का विजेता कौन है।
माता पार्वती का कहना था कि उनकी चाल सही थी और वे जीत चुकी हैं, जबकि भगवान शिव का दावा था कि जीत उनकी हुई है। दोनों अपनी-अपनी जीत पर अड़ गए और बात इतनी बढ़ गई कि बीच-बचाव के लिए किसी गवाह की जरूरत आन पड़ी।
नंदी की गवाही और माता पार्वती का गुस्सा
जब विवाद ज्यादा बढ़ा, तो भगवान शिव ने अपने प्रिय सेवक नंदी से पूछा कि बताओ इस खेल में किसकी जीत हुई है। नंदी भगवान शिव के प्रति बहुत समर्पित थे, इसलिए उन्होंने बिना किसी संकोच के शिवजी के पक्ष में गवाही दे दी और कहा कि विजेता भोलेनाथ हैं।
जबकि सच्चाई यह थी कि उस दौर में माता पार्वती जीती थीं। नंदी का यह पक्षपातपूर्ण उत्तर सुनकर माता पार्वती बेहद क्रोधित हो गईं। उन्हें लगा कि नंदी ने भगवान शिव के डर या उनके प्रति निष्ठा के कारण झूठ बोला है। गुस्से में आकर माता पार्वती ने नंदी को श्राप दे दिया कि जाओ, तुम्हें अपनी इस बेईमानी और पक्षपात के कारण पृथ्वी पर जाना पड़ेगा और तुम्हें बैल बनकर कष्ट सहना होगा।
माता पार्वती की परीक्षा और प्रायश्चित
श्राप मिलते ही नंदी भयभीत होकर क्षमा मांगने लगे। जब माता पार्वती का गुस्सा शांत हुआ, तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने नंदी से कहा कि प्रदोष काल में तुम्हारी यह पीड़ा दूर होगी। इसके बाद, भगवान शिव और माता पार्वती के बीच का यह विवाद शांत हुआ और उन्होंने इस खेल के जरिए यह सीख दी कि न्याय के समय पक्षपात नहीं करना चाहिए, चाहे सामने कोई भी हो।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पौराणिक ग्रंथों और सनातन संस्कृति की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक नैतिक और धार्मिक मूल्य पहुंचाना है।
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