Ashadha Ravi Pradosh Vrat 2026: आज रवि प्रदोष व्रत, जानें शिव पूजा का शुभ मुहूर्त
हिंदू धर्म में प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस बार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी रविवार को पड़ने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जा रहा है। शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।
मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति, धन-धान्य और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने वाले भक्तों पर भोलेनाथ की विशेष कृपा बनी रहती है।
शुभ मुहूर्त
रवि प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा के लिए आज का प्रदोष काल शाम 7:16 बजे से रात 9:21 बजे तक रहेगा।
पूजा प्रारंभ: शाम 7:16 बजे
पूजा समाप्ति: रात 9:21 बजे
कुल शुभ अवधि: 2 घंटे 5 मिनट
इसी समय शिवलिंग का अभिषेक और पूजा करना सबसे शुभ माना गया है।
रवि प्रदोष व्रत की पूजा विधि
- प्रदोष काल से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को साफ करके भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करें।
- शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल अर्पित करें।
- इसके बाद दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें।
- बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और अन्य पुष्प अर्पित करें।
- धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना करें।
- प्रदोष व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें।
- महामृत्युंजय मंत्र या 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करें।
- अंत में शिव आरती के साथ पूजा संपन्न करें।
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। शिव कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यही कारण है कि शिव भक्त इस व्रत को पूरे श्रद्धा भाव और विधि-विधान के साथ करते हैं।
Sawan 2026: डाक कांवड़ का क्या है महत्व? जानें क्यों बिना रुके पूरी की जाती है यह यात्रा
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। इन्हीं में डाक कांवड़ एक विशेष प्रकार की कांवड़ यात्रा मानी जाती है, जिसमें समय और अनुशासन का विशेष महत्व होता है।
क्या होती है डाक कांवड़?
डाक कांवड़, कांवड़ यात्रा का ऐसा स्वरूप है जिसमें श्रद्धालु निर्धारित समय के भीतर गंगाजल को शिवलिंग तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। इस यात्रा में अनावश्यक रुकने से बचा जाता है और पूरी यात्रा को तेज गति से पूरा करने का प्रयास किया जाता है।
'डाक' शब्द का संबंध पुराने समय की उस व्यवस्था से माना जाता है, जिसमें संदेश या वस्तु को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता था। इसी भाव के साथ डाक कांवड़ में भी गंगाजल को शीघ्र शिव मंदिर तक पहुंचाने की परंपरा जुड़ी हुई है।
डाक कांवड़ में लगातार यात्रा क्यों की जाती है?
डाक कांवड़ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निरंतर चलने वाली यात्रा है। कई श्रद्धालु समूह बनाकर यात्रा करते हैं, जहां एक व्यक्ति के विश्राम करने पर दूसरा गंगाजल लेकर आगे बढ़ता है। इससे यात्रा बिना रुके जारी रहती है और जलाभिषेक समय पर किया जा सके।
कई स्थानों पर डाक कांवड़ के लिए विशेष रूप से सजाए गए वाहन भी देखने को मिलते हैं। इन पर भगवान शिव की तस्वीरें, फूल और आकर्षक सजावट की जाती है, हालांकि गंगाजल की पवित्रता और यात्रा के संकल्प का विशेष ध्यान रखा जाता है।
धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा, नियम और सच्चे मन से की गई कांवड़ यात्रा भगवान शिव की विशेष कृपा दिलाती है। डाक कांवड़ में समय पर जलाभिषेक करने का संकल्प भक्त की निष्ठा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसलिए सावन में बड़ी संख्या में शिव भक्त इस विशेष यात्रा को अपनाते हैं और पूरे उत्साह के साथ भगवान भोलेनाथ की आराधना करते हैं।
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