Kerala Travel: मानसून में केरल का नज़ारा दिल जीत लेगा, इन 7 जगहों की विजिट करें; यादगार रहेगी ट्रिप
Monsoon Kerala Travel: बारिश का मौसम आते ही प्रकृति जैसे नई जिंदगी पा लेती है और अगर बात केरल की हो, तो मानसून इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। हरे-भरे पहाड़, धुंध से ढकी वादियां, झरनों की कल-कल आवाज और बैकवॉटर का शांत नज़ारा हर यात्री का दिल जीत लेता है। यही वजह है कि मानसून में केरल घूमने का अनुभव किसी जादुई सफर से कम नहीं माना जाता।
अगर आप इस बारिश के मौसम में फैमिली, दोस्तों या पार्टनर के साथ यादगार ट्रिप प्लान कर रहे हैं, तो केरल की कुछ जगहें आपकी लिस्ट में जरूर होनी चाहिए। यहां प्राकृतिक सुंदरता के साथ एडवेंचर, लोकल संस्कृति और स्वादिष्ट भोजन का भी शानदार अनुभव मिलता है।
घूमने के लिए केरल की 7 बेहतरीन डेस्टिनेशंस
मुन्नार - चाय के बागानों के बीच सुकून भरा सफर
मानसून में मुन्नार की हरी-भरी पहाड़ियां और चाय के बागान बेहद आकर्षक लगते हैं। बारिश के बाद फैली धुंध और ठंडी हवा इस जगह को हनीमून और फैमिली ट्रिप के लिए खास बना देती है।
अल्लेप्पी - बैकवॉटर की खूबसूरती का लें आनंद
अगर आप हाउसबोट में ठहरने का सपना देखते हैं, तो अल्लेप्पी जरूर जाएं। बारिश के मौसम में यहां के शांत बैकवॉटर और चारों ओर फैली हरियाली मन को सुकून देती है।
वायनाड - झरनों और जंगलों का स्वर्ग
वायनाड मानसून में सबसे ज्यादा खूबसूरत नजर आता है। यहां के झरने, ट्रेकिंग ट्रेल्स, गुफाएं और मसालों के बागान प्रकृति प्रेमियों के लिए बेहतरीन अनुभव देते हैं।
थेक्कडी - वन्यजीवों के बीच रोमांच
अगर आपको जंगल सफारी और वन्यजीव पसंद हैं, तो थेक्कडी बेहतरीन विकल्प है। यहां की झील में बोटिंग और आसपास की हरियाली मानसून में और भी मनमोहक हो जाती है।
अथिराप्पिल्ली वॉटरफॉल - बारिश में दोगुनी खूबसूरती
'भारत का नियाग्रा' कहलाने वाला अथिराप्पिल्ली झरना मानसून के दौरान पूरे शबाब पर होता है। तेज बहते पानी और आसपास की हरियाली का नजारा कैमरे में कैद करने लायक होता है।
कुमारकोम - प्रकृति और शांति का अनोखा संगम
कुमारकोम अपने बैकवॉटर, बर्ड सैंक्चुअरी और शांत वातावरण के लिए मशहूर है। मानसून में यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और भी निखर जाता है।
वर्कला - समुद्र और चट्टानों का अनोखा मेल
अगर आप समुद्र किनारे सुकून भरे पल बिताना चाहते हैं, तो वर्कला जरूर जाएं। हालांकि मानसून में समुद्र में उतरने से बचें, लेकिन क्लिफ से समुद्र का दृश्य बेहद शानदार दिखाई देता है।
मानसून ट्रिप पर निकलने से पहले रखें ये बातें ध्यान
- रेनकोट और मजबूत छाता साथ रखें।
- फिसलन से बचने के लिए ग्रिप वाले जूते पहनें।
- होटल और हाउसबोट की बुकिंग पहले से कर लें।
- मौसम का पूर्वानुमान देखकर यात्रा की योजना बनाएं।
- इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए वाटरप्रूफ बैग रखें।
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लेखक: (कीर्ति)
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मूवी रिव्यू: बेबी डू डाई डू:मुंबई की गलियों में खामोश मौत का खेल...फिल्म में सिर्फ स्टाइल है या दमदार थ्रिलर भी?
आजकल क्राइम थ्रिलर फिल्मों में गोलियां, गैंगस्टर और बदले की कहानियां नई बात नहीं रहीं। ऐसे में बेबी डू डाई डू अपने मुख्य किरदार की वजह से अलग नजर आती है। यहां एक ऐसी सुपारी किलर है, जो न बोल सकती है और न सुन सकती है, लेकिन हर मिशन को बिना शोर किए अंजाम देती है। निर्देशक नचिकेत सामंत ने इस कहानी को सिर्फ एक एक्शन फिल्म नहीं बनाया, बल्कि मुंबई शहर की बदलती तस्वीर और उसके अंधेरे चेहरे को भी कहानी का हिस्सा बनाया है। फिल्म हर मोड़ पर चौंकाती नहीं, लेकिन अपने स्टाइल, माहौल और दमदार अभिनय के दम पर अंत तक दिलचस्प बनी रहती है। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 5 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इसे 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है। फिल्म की कहानी कैसी है? कहानी की शुरुआत दो जुड़वां बहनों से होती है, जो बचपन में एक बंद पड़े होटल में पहुंच जाती हैं। वहां वे एक हत्या की गवाह बन जाती हैं। इस घटना में एक बहन की मौत हो जाती है, जबकि दूसरी की जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है। सालों बाद वही लड़की बेबी करमरकर (हुमा कुरैशी) के नाम से मुंबई की सबसे खतरनाक कॉन्ट्रैक्ट किलर बन चुकी होती है। वह गूंगी और बहरी है, लेकिन अपने हर मिशन को बेहद सटीक तरीके से अंजाम देती है। उसकी पहचान उसकी खास छतरी है, जो जरूरत पड़ने पर जानलेवा हथियार बन जाती है। बेबी का पालन पोषण पापा (चंकी पांडे) ने किया है, जो उसे एक के बाद एक मिशन सौंपते रहते हैं। लेकिन हर सुपारी के पीछे बेबी की अपनी एक तलाश भी छिपी है। वह अपनी जुड़वां बहन के हत्यारे तक पहुंचना चाहती है। इसी बीच उसकी जिंदगी में सिद्धू (रचित सिंह) की एंट्री होती है और पहली बार उसे इस खून खराबे वाली दुनिया से बाहर निकलने की उम्मीद दिखाई देती है। क्या बेबी अपने अतीत से बाहर निकल पाएगी? क्या उसे अपनी बहन के हत्यारे तक पहुंचने का मौका मिलेगा? और क्या अपराध की दुनिया उसे इतनी आसानी से जाने देगी? इन्हीं सवालों के जवाब फिल्म धीरे धीरे देती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हुमा कुरैशी हैं। बिना लंबे संवाद बोले सिर्फ आंखों, चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज के जरिए उन्होंने बेबी के दर्द, गुस्से और अकेलेपन को बेहद असरदार तरीके से निभाया है। उनका शांत चेहरा और अचानक हिंसक हो जाने वाला अंदाज फिल्म को अलग पहचान देता है। रचित सिंह कहानी में भावनात्मक संतुलन लेकर आते हैं। उनका किरदार सादगी से लिखा गया है और दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म को राहत देती है। चंकी पांडे अपने अब तक के अलग किरदारों में नजर आते हैं। उनका शांत लेकिन रहस्यमय अंदाज प्रभावित करता है। सिकंदर खेर एक बार फिर ग्रे शेड वाले किरदार में जमे हैं और हर बार स्क्रीन पर आते ही तनाव बढ़ा देते हैं। सीमा पाहवा भी अपने सीमित स्क्रीन टाइम में प्रभाव छोड़ती हैं। फिल्म का डायरेक्शन और तकनीकी पक्ष कैसा है? निर्देशक नचिकेत सामंत ने इस फिल्म को पारंपरिक क्राइम थ्रिलर बनने से बचाने की कोशिश की है। उन्होंने स्टाइल और कहानी के बीच अच्छा संतुलन बनाने का प्रयास किया है। मुंबई यहां सिर्फ लोकेशन नहीं, बल्कि कहानी का एक अहम किरदार बनकर सामने आती है। बारिश में भीगी सड़कें, पुरानी चालें, अधूरी इमारतें और शहर का अंधेरा चेहरा फिल्म के माहौल को मजबूत बनाते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में शामिल है। कई फ्रेम इंटरनेशनल नियो नॉयर फिल्मों की याद दिलाते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट फ्लैशबैक, कम रोशनी वाले दृश्य और रंगों का इस्तेमाल कहानी को अलग पहचान देता है। हालांकि फिल्म पूरी तरह अपनी पकड़ बनाए नहीं रख पाती। पहले हिस्से में रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस होती है। दूसरे भाग में कहानी तेज होती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा किरदार और कई समानांतर ट्रैक फिल्म को थोड़ा उलझा देते हैं। कुछ ट्विस्ट का अंदाजा पहले ही लग जाता है और कुछ घटनाएं जरूरत से ज्यादा सुविधाजनक लगती हैं। इसके बावजूद निर्देशक फिल्म का माहौल और सस्पेंस बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहते हैं। फिल्म क म्यूजिक कैसा है? फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के साथ अच्छी तरह चलता है। कई जगह सन्नाटा भी कहानी का हिस्सा बन जाता है और तनाव बढ़ाता है। गाने कम हैं और कहानी में रुकावट नहीं बनते। हालांकि ऐसा कोई गीत नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद लंबे समय तक याद रह जाए। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? बेबी डू डाई डू उन फिल्मों में से है जो अपनी कहानी से ज्यादा अपने ट्रीटमेंट और माहौल के लिए याद रखी जाएगी। हुमा कुरैशी का दमदार अभिनय, स्टाइलिश प्रस्तुति और मुंबई को कहानी का अहम किरदार बनाने का तरीका फिल्म को अलग बनाता है। हालांकि धीमा पहला हिस्सा, कुछ अनुमानित मोड़ और जरूरत से ज्यादा किरदार इसकी रफ्तार को थोड़ा कमजोर करते हैं। अगर आपको अलग अंदाज की क्राइम थ्रिलर, मजबूत महिला प्रधान किरदार और स्टाइलिश फिल्में पसंद हैं, तो बेबी डू डाई डू एक बार जरूर देखी जा सकती है।




















