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Uncovered With Manoj Gairola: सिंधु समझौते के लिए कितना ‘कॉम्प्रोमाइस्ड’ हुए थे नेहरू? पाकिस्तान को पानी-पैसा दोनों दिया

Uncovered With Manoj Gairola: आज Indus Water Treaty फिर चर्चा में है. इसे भारत ने पिछले साल ठंडे बस्ते में डाल दिया था. इसको लेकर पाकिस्तान आए दिन भारत पर हमला करने की धमकी दे रहा है. जब हम आपको बताएंगे कि ये Treaty भारत ने किन हालातों में साइन की और भारत की क्या मजबूरियां थीं, तो आपका खून खौल उठेगा. आज हम आपको इस Treaty की वो सच्चाई बताएंगे जो शायद आपको पता ना हो. 

करीब 400 साल पहले रहीम ने लिखा था...रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून...और 1960 में अमेरिका ने पंडित नेहरू को एक ऐसी Treaty साइन करने के लिए मजबूर कर दिया, जिससे हमारे देश से बहने वाली नदियों का 80% पानी पाकिस्तान को चला गया. अब सवाल ये है..भारत ने ऐसी एकतरफा Treaty क्यों साइन की?

लोन देने का काम करने वाला वर्ल्ड बैंक कैसे बना समझौते का मध्यस्थ?

कैसे भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के बहाने अमेरिका की एंट्री हुई? कैसे वर्ल्ड बैंक ने इस ट्रीटी में मध्यस्थ और की भूमिका निभाई? जी हां हम उसी वर्ल्ड बैंक की बात कर रहे हैं, जिसका काम लोन देना होता है, जियोपॉलिटिक्स समस्याएं सुलझाना नहीं. साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि आखिर क्यों अमेरिका पाकिस्तान का रहनुमा बना और ऐसी क्या मजबूरियां थीं कि भारत, अमेरिका के प्रेशर में आ गया. 

जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ. पंजाब उन सूबों में था जिनका बंटवारा किया गया. पंजाब यानी की पांच नदियों की धरती. इन नदियों के कारण पंजाब की जमीन बहुत उपजाऊ है. ये पांचों नदियां भारत से होकर पाकिस्तान में बहती है. इन नदियों के साथ ही सिंधु नदी भी भारत से पाकिस्तान में जाती है. इसी सिंधु नदी से हिंदू शब्द निकला है. 

जिस वक्त देश का बंटवारा हो रहा था. उस वक्त इन नदियों को लेकर जिन्ना का बयान था कि "हमें ये मंजूर है कि पंजाब रेगिस्तान बन जाए, लेकिन हम हिंदुओं से इन नदियों के पानी की खैरात नहीं लेंगे." इस पर पंडित नेहरू ने कहा था कि "भारत इन नदियों के साथ क्या करे ये उनका अंदरूनी मामला है. पाकिस्तान को तो 1947 में ही इन नदियों का महत्व समझ में आ गई थी. लेकिन ऐसी क्या मजबूरी थी कि पंडित नेहरू को ये समझौता साइन करना पड़ा?

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अमेरिका ने ऐसे नेहरू पर डाला प्रेशर

इसके लिए हमें देखना होगा कि 1950 के दशक में भारत की आर्थिक हालत कैसी थी. ये वो वक्त था जब भारत सूखे जैसे दौर से गुजर रहा था. 200 साल के अंग्रेजों के शासन ने हमारी कमर तोड़ दी थी. आम आदमी को दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल हो गया था. भारत अनाज के लिए अमेरिका पर निर्भर था और अनाज खरीदने के लिए वर्ल्ड बैंक से लोन लेता था. साथ ही हमें अपनी पंचवर्षीय योजनाओं के लिए भी वर्ल्ड बैंक से लोन लेना होता था. वर्ल्ड बैंक एक तरह से अमेरिका के ही कंट्रोल में है और इस तरह वर्ल्ड बैंक वो हथियार था, जिसके जरिए अमेरिका ने नेहरू पर प्रेशर डालना शुरू कर दिया. 

अमेरिका का मकसद- पाकिस्तान को मजबूत करना

पाकिस्तान में भारत के पूर्व हाई कमिशनर राजीव डोगरा ने अपनी किताब 'Where Borders Bleed' में एक दिलचस्प केबल छापा है. केबल मतलब वह संदेश, जो पाकिस्तान में उस वक्त के अमेरिकी एंबेस्डर जेम्स लेंग्ली ने अपनी सरकार को भेजा था. इसमें लिखा था कि "भारत और पाकिस्तान दोनों दिवालिया होने की तरफ बढ़ रहे हैं. खासतौर से भारत की आर्थिक स्थिति तो बहुत खराब है. अब अमेरिका ऐसी स्थिति में है कि वो कर्ज देने के लिए शर्तें लगा सके और नेहरू को पाकिस्तान के साथ सेटलमेंट करने के लिए मजबूर कर सके. इससे पहले नेहरू पर हमारा हर तरह का दबाव फेल हो चुका है. अब आर्थिक दबाव से ही हमारा मकसद पूरा हो सकता है." और वो मकसद था...पाकिस्तान को मजबूत करना.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो वर्ल्ड ऑर्डर बना उसमें अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना सहयोगी बनाया. इसका एक मकसद साउथ एशिया में इंडिया पर नजर रखना भी था और इसके लिए वर्ल्ड बैंक का इस्तेमाल किया गया. इस तरह वर्ल्ड बैंक इस समझौते का मध्यस्थ और गारेंटर बन गया. 

अब तक के हालात को हम समराइज करते हैं...

  1. 1950s के दशक में भारत में अनाज की कमी थी. दो वक्त का खाना भी मुश्किल से मिलता था. भारत बेहद गरीब था.
  2. भारत अमेरिका से अनाज खरीदने को मजबूर था और वर्ल्ड बैंक से लोन लेने के लिए भी. 
  3. अमेरिका पाकिस्तान को अपना सहयोगी बनाना चाहता था. 

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80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को 20 प्रतिशत पानी भारत को मिला

अमेरिका ने इस मुद्दे में वर्ल्ड बैंक की एंट्री करवा दी. इन नदियों के पानी को बांटने का फॉर्मूला भी वर्ल्ड बैंक ने दिया था. 6 में से 3 नदियां पाकिस्तान को और 3 भारत को. पाकिस्तान के हिस्से वाली 3 नदियां थीं सिंधु, झेलम और चिनाब. भारत के हिस्से में रावी, सतलुज और ब्यास थीं. अब आप कहेंगे कि आधी नदियां उनकी और आधी हमारी. ये फॉर्मूला तो ठीक है. लेकिन असलियत ये है कि भारत के हिस्से वाली नदियों में पानी कम था. टोटल पानी जो भारत से पाकिस्तान की तरफ बहता है उसका केवल 20% ही भारत के हिस्से में आता और बाकी 80% पाकिस्तान को मिलता. यानी टोटल 168 मिलियव एकड़ फीट पानी में से भारत को सिर्फ 33 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलता. 

भारत ने आज के दो बिलियन डॉलर पाकिस्तान को दिए

ये फॉर्मूला 1954 में दिया गया था. लेकिन भारत इसे मानने को तैयार नहीं था. 6 साल तक भारत इसका विरोध करता रहा. लेकिन अमेरिका ने इतना प्रेशर डाला कि नेहरू ने 19 सितंबर 1960 को कराची जाकर इस Treaty को साइन कर दिया. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. वर्ल्ड बैंक के प्रेशर में भारत ने पाकिस्तान को 62 मिलियन डॉलर यानी आज के 2 बिलियन डॉलर भी दिए. और वो भी तब जब भारत भुखमरी की स्थिति से गुजर रहा था. इस भुखमरी से बचने के लिए ही वर्ल्ड बैंक से लोन ले रहा था. 

वहीं, वर्ल्ड बैंक ने 2 बिलियन डॉलर यानी आज के 62 बिलियन डॉलर की रकम पाकिस्तान को दी. जिससे की वो अपने देश में बांध, बैराज और नहरें बना सकें. इस समझौते का जिक्र करते हुए तब के पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने अपनी किताब में लिखा है..."हमने तो चांद मांगा था और मिल भी गया".

देश में हुई समझौते की आलोचना

भारत में इस समझौते की आलोचना हुई. नेहरू ने संसद में बयान दिया कि "इस समझौते के जरिए उन्होंने पाकिस्तान से शांति खरीदी है". नेहरू की ये उम्मीद 5 साल में ही धराशाई हो गई. 1965 में पाकिस्तान ने हमला कर दिया. इसके बाद 1971 में बांग्लादेश युद्ध और 1999 में कारगिल युद्ध हुआ. पाकिस्तान कई बार भारत में आतंकी हमले भी करा चुका है. ये पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी बन चुकी है.  

मोदी सरकार ने पाकिस्तान को हिलाया

हालांकि, 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस ट्रीटी को ठंडे बस्ते में डाल दिया. और चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है. इसके तहत एक टनल बनाकर चिनाब का पानी ब्यास में जोड़ा जाएगा. अभी सिर्फ 2 Million Acre Feet पानी ही ट्रांसफर किया जाएगा. लेकिन इतने में ही पाकिस्तान के पसीने छूटने लगे हैं. 

क्योंकि चिनाब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक बहुत बड़े हिस्से को सींचती है. इस नदी से निकलने वाली नहरों का नेटवर्क लाखों एकड़ कृषि भूमि को पानी देता है. वहां कपास, गेहूं और चावल पूरी तरह चिनाब और उसकी लिंक नहरों पर निर्भर हैं. इसी तरह और भी कई प्रोजेक्ट्स पाइपलाइन में हैं.

भारत को अब अपने स्टैंड पर रहना होगा कायम

मजबूरी में साइन हुई Indus Water Treaty की ये घटना हमें बताती है कि कैसे हमारी गरीबी का फायदा उठाया गया. एक मजबूत देश बनना हमारे लिए कितना जरूरी है. हम आपको बता दें कि एशिया में 57 ऐसी नदियां हैं जो दो या दो से ज्यादा देशों के बीच बहती हैं. बस 4 नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर ही समझौते हुए हैं. इनमें से दो समझौते भारत के हैं. एक पाकिस्तान के साथ और दूसरा बांग्लादेश के साथ.

कोई भी ऐसा देश जहां से नदी निकलती है, वो अपने पानी को लेकर कोई समझौता नहीं करता. नदियों को लेकर चीन का 7 देशों के साथ विवाद है, लेकिन उसने कभी समझौता नहीं किया. भारत को भी अब Indus Water Treaty को लेकर अपने Stand पर कायम रहना होगा.

 

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Swami Ramdev Health Tips: ज्यादा व्यायाम नहीं कर पाते? स्वामी रामदेव द्वारा बताए गए सूक्ष्म और प्राणायाम योग से खुद को रखें फिट

Swami Ramdev Health Tips: आज कल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास लंबे समय तक जिम जाने या कठिन एक्सरसाइज करने का समय नहीं होता. कई लोग उम्र, बीमारी या शारीरिक कमजोरी की वजह से भी अधिक व्यायाम नहीं कर पाते. ऐसे लोगों के लिए योग एक बेहतरीन विल्प साबित हो सकता है. हाल ही योग गुरु स्वामी रामदेव ने अपने फेसबुक लाइव वीडियो के जरिए बताया कि अगर कोई व्यक्ति कठिन व्यायाम नहीं कर सकता, तो उसे रोजाना सूक्ष्म व्यायाम और प्राणायाम जरूर करना चाहिए. इससे शरीर सक्रिय रहता है और मानसिक शांति भी मिलती है. चलिए विस्तार से जानते हैं इसके बारे में. 

यहां देखें लाइव वीडियो 

क्या होता है सूक्ष्म व्यायाम?

सूक्ष्म व्यायाम ऐसे हल्के-फुल्के अभ्यास हैं, जिन्हें हर उम्र का व्यक्ति आसानी से कर सकता है. इसमें शरीर के अलग-अलग अंगों को धीरे-धीरे घुमाना, मोड़ना और स्ट्रेच करना शामिल होता है. इससे शरीर में जकड़न कम होती है और जोड़ों की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहती है. स्वामी रामदेव ने वीडियो के जरिए बताा कि दिन की शुरुआत कुछ मिनट के सूक्ष्म व्यायाम से करने पर शरीर पूरे दिन ऊर्जावान महसूस करता है. यह उन लोगों के लिए भी लाभकारी है जो लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं.

प्राणायाम क्यों है जरूरी?

प्राणायाम केवल सांस लेने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह शरीर और मन को संतुलित रखने का प्रभावी माध्यम माना जाता है. नियमित प्राणायाम करने से फेफड़ों की क्षमता बेहतर हो सकती है. शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है और तनाव भी कम महसूस होता है. स्वामी रामदेव कहते हैं कि रोज कुछ मिनट प्राणायाम करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है. साथ ही शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है. 

स्वामा रामदेव ने बताया ये आसान अभ्यास

अगर आप कठिन एक्सरसाइज नहीं कर सकते हैं, तो अपनी दिनचर्या में कुछ आसान योग अभ्यास शामिल कर सकते हैं.

  • गर्दन को धीरे-धीरे चारों दिशाओं में घुमाएं.
  • कंधों को आगे और पीछे घुमाएं.
  • हाथों और पैरों की हल्की स्ट्रेचिंग करें.
  • टखनों और घुटनों की हल्की मूवमेंट करें.
  • गहरी सांस लेकर धीरे-धीरे छोड़ने का अभ्यास करें.
  • अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम करें.

इन अभ्यासों को रोजाना 15 से 20 मिनट तक करना भी काफी फायदेमंद माना जाता है.

किन लोगों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?

सूक्ष्म व्यायाम और प्राणायाम लगभग हर व्यक्ति के लिए उपयोगी हैं. खासतौर पर इन लोगों को इससे अधिक लाभ मिल सकता है जैसे- बुजुर्ग, ऑफिस में लंबे समय तक बैठकर काम करने वाले लोग, शुरुआती योग करने वाले, हल्की शारीरिक कमजोरी महसूस करने वाले, व्यस्त दिनचर्या वाले लोग, जिनसे भारी एक्सरसाइज नहीं हो पाती, शरीर और मन दोनों रहेंगे स्वस्थ. योग केवल शरीर को फिट रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि नियमित अभ्यास से मन भी शांत रहता है. कई लोग तनाव, चिंता और थकान से परेशान रहते हैं. ऐसे में प्राणायाम मानसिक संतुलन बनाए रखने में मददगार हो सकता है. नियमित अभ्यास से नींद की भी बेहतर हो सकती है और दिनभर फ्रेश महसूस होती है. 

इन बातों का रखें ध्यान

योग या प्राणायाम करते समय जल्दबाजी न करें. हमेशा आरामदायक स्थान पर बैठकर अभ्यास करें. खाली पेट या भोजन के कुछ घंटे बाद योग करना बेहतर माना जाता है. अगर किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी है या हाल ही में सर्जरी हुई है, तो किसी विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही योग शुरू करना चाहिए.

यह भी पढ़ें: Patanjali Chyawanprash: रोजाना करें पतंजलि च्यवनप्राश का सेवन, इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ बच्चों और बड़ों की सेहत का रखें ख्याल

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  Sports

Harbhajan Singh Birthday: ट्रक ड्राइवर बनने चले थे भज्जी, Sourav Ganguly के एक फैसले ने बनाया 'Turbanator'

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व दिग्गज स्पिनर और 'टर्बनेटर' के नाम से मशहूर हरभजन सिंह 03 जुलाई को अपना 46वां जन्मदिन मना रहे हैं। हरभजन सिंह को यह नाम ऐसे ही नहीं मिला। दरअसल, वह सिख हैं और सिर पर पगड़ी पहनते हैं। अंग्रेजी में इसको टर्बन कहा जाता है। जब हरभजन सिंह के सामने ऑस्ट्रेलियाई टीम बेबस नजर आने लगी, तो मीडिया ने उनको भज्जी को 'टर्बनेटर' नाम दिया। तो आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर हरभजन सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

जन्म और परिवार

पंजाब के जालंधर शहर में 03 जुलाई 1980 को हरभजन सिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार सरदेव सिंह और मां का नाम अवतार कौर है। साल 2000 में पिता के निधन के बाद हरभजन सिंह ने अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाली थी।

क्रिकेट करियर

हरभजन सिंह को बचपन से ही क्रिकेट का जुनून था। घरेलू स्तर पर अपनी फिरकी का जादू दिखाने के बाद उनको राष्ट्रीय टीम ने बुला लिया। मार्च 1998 में 17 साल की उम्र में हरभजन सिंह ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच खेलकर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरूआत की। शुरूआती मैचों में उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की डगर उनके लिए आसान नहीं थी।

ट्रक ड्राइवर बनने की सोच रहे थे हरभजन

क्रिकेट करियर की शुरूआत के करीब डेढ़ साल बाद खराब प्रदर्शन की वजह से उनको टीम से बाहर कर दिया गया। वहीं साल 2000 में पिता के निधन के बाद वह बुरी तरह से टूट गए। एक ओर टीम से निकल जाने का दर्द और दूसरी ओर परिवार की गंभीर आर्थिक स्थिति ने उनको परेशान कर दिया। हरभजन सिंह की परेशानी इस कदर बढ़ी की वह अमेरिका में ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना चुके थे।

टर्निंग प्वाइंट

लेकिन भज्जी की बहनों ने इस मुश्किल दौर में उनके अंदर के क्रिकेटर को मरने नहीं दिया। परिवार के विश्वास के दम पर भज्जी ने रणजी ट्रॉफी में वापसी की और इस सीजन में शानदार गेंदबाजी करते हुए 28 विकेट लिए।

ऐतिहासिक कमबैक

साल 2001 में ऑस्ट्रेलिया टीम भारत के दौरे पर थी। वहीं टीम के तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने भज्जी पर भरोसा जताया और उनको टीम में शामिल करने के लिए कहा। गांगुली का यह फैसला भारतीय क्रिकेट के इतिहास को बदलने वाला साबित हुआ। ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज के 3 मैचों में भज्जी ने कंगारू बल्लेबाजों को बेबस करते हुए 32 विकेट चटकाए। कोलकाता टेस्ट में हरभजन सिंह ने शानदार हैट्रिक ली। यह टेस्ट क्रिकेट में किसी भारतीय गेंदबाद द्वारा ली गई पहली हैट्रिक थी। इस सीरीज ने हरभजन सिंह के क्रिकेट करियर को फिर से जीवंत कर दिया।

हरभजन सिंह सिर्फ टेस्ट के नहीं बल्कि सीमित ओवरों के भी किंग थे। वह भारत की दो सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीतों साल 2007 का टी20 वर्ल्ड कप और साल 2011 के वनडे वर्ल्ड कप विजेता टीम में प्रमुख सदस्य रहे।
Fri, 03 Jul 2026 10:22:28 +0530

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