कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के बीच कीमती धातुओं ने पकड़ी रफ्तार, सोने-चांदी में 1 प्रतिशत तक की बढ़त
अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की नाजुक स्थिति के बीच कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने के बीच मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एमसीएक्स) पर हफ्ते के पहले कारोबारी दिन सोमवार को कीमती धातुओं में 1 प्रतिशत तक की बढ़त देखने को मिली.
सोने में शुरुआती गिरावट के बाद लौटी तेजी
सोमवार के सत्र में अगस्त डिलीवरी वाला सोना अपने पिछले बंद 1,47,203 रुपए से 2,093 रुपए की गिरावट के साथ 1,45,110 रुपए प्रति 10 ग्राम पर खुला और शुरुआती कारोबार में यह 0.60 प्रतिशत की बढ़त के साथ 1,48180 रुपए के दिन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. वहीं खबर लिखे जाने तक (सुबह 10.54 बजे के करीब) पीली धातु 849 रुपए या 0.58 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,48,052 रुपए प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रही थी.
चांदी में 1 प्रतिशत से ज्यादा की उछाल
वहीं, जुलाई डिलीवरी वाली चांदी 2,715 रुपए यानी 1.16 प्रतिशत की बढ़त के साथ 2,35,900 रुपए प्रति किलोग्राम पर ट्रेड करती नजर आई. चांदी आज के सत्र में अपने पिछले बंद 2,33,185 रुपए से 3,903 रुपए या 1.6 प्रतिशत की उछाल के साथ 2,37,088 रुपए प्रति किलोग्राम पर खुली और शुरुआती कारोबार में 1.6 प्रतिशत उछलकर 2,37,106 रुपए के दिन के हाई स्तर तक पहुंच गई.
सोने के लिए अहम सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तर
एक मार्केट एक्सपर्ट ने बताया कि एमसीएक्स गोल्ड ने 1,46,000 रुपए के आसपास गैप-डाउन शुरुआत की, लेकिन निचले स्तरों पर खरीदारी आने से इसमें तेजी लौट आई और भाव 1,48,000 से 1,48,400 रुपए के रेजिस्टेंस जोन तक पहुंच गए. यदि कीमतें इस दायरे के ऊपर बनी रहती हैं तो रिकवरी बढ़कर 1,49,500-1,50,000 रुपए और उसके बाद 1,51,000 रुपए तक जा सकती है. वहीं, नीचे की ओर 1,46,000 से 1,45,600 रुपए का क्षेत्र महत्वपूर्ण सपोर्ट है. इस स्तर के नीचे गिरावट आने पर भाव 1,45,000 रुपए तक जा सकते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, फिलहाल बाजार का रुख सतर्क बना हुआ है, हालांकि हालिया रिकवरी ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. तेजी को मजबूती देने के लिए कीमतों का 1,48,000 रुपए के ऊपर टिकना और 1,50,000 रुपए के मनोवैज्ञानिक स्तर को फिर से हासिल करना जरूरी होगा.
चांदी में तेजी जारी रहने की संभावना
एक्सपर्ट ने आगे कहा कि एमसीएक्स सिल्वर ने 2,37,000 रुपए के आसपास गैप-अप शुरुआत की, जो बाजार में मजबूती का संकेत है. यदि कीमतें 2,37,000 से 2,38,000 रुपए के रेजिस्टेंस जोन को पार कर लेती हैं तो तेजी बढ़कर 2,40,000 से 2,42,000 रुपए तक जा सकती है. वहीं, 2,35,000 से 2,34,000 रुपए के नीचे गिरावट आने पर भाव 2,32,000 रुपए और फिर 2,30,000 रुपए तक फिसल सकते हैं. फिलहाल बाजार स्थिर होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मजबूत तेजी के लिए 2,40,000 रुपए के ऊपर टिकना जरूरी होगा. सपोर्ट टूटने पर दोबारा बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है.
कच्चे तेल में आई नरमी
ऊर्जा क्षेत्र की बात करें तो, अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 2 प्रतिशत से अधिक गिरकर लगभग 79 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड 3 प्रतिशत गिरकर लगभग 75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया.
स्रोत-आईएएनएस
Explainer: भगवान जगन्नाथ साल में सिर्फ एक बार ही मंदिर से बाहर क्यों निकलते हैं? जानें यात्रा के पीछे की सुंदर कहानी
Jagannath Rath Yatra 2026: जगन्नाथ महाप्रभु को भगवान श्रीहरी विष्णु का स्वरूप कहते हैं. वे कलियुग के देवता है. उनकी मूर्तियां भी अधूरी है. जगन्नाथ जी और उनके भाई-बहन, तीनों पुरी के श्रीमंदिर में विराजमान है. तीनो विग्रहों के पैर नहीं है, न ही हाथ है. इसलिए, उन्हें दारु मूर्ति कहते हैं. हर साल पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन होता है. रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने गर्भगृह से बाहर निकलते हैं. अपने विशाल रथ में विराजमान होकर वे नगर भ्रमण करते हैं. साथ ही उनके भाई-बहन भी जाते हैं. इस साल रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 को है. वहीं, बहुदा यात्रा 25 जुलाई को है.
क्या आप जानते हैं सनातन धर्म में सिर्फ महाप्रभु श्री जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों की ही असली मूर्तियों को बाहर लाया जाता है. जबकि अन्य देवी-देवताओं की यात्रा होने पर उनकी प्रतिकात्मक मूर्तियों को बाहर लाया जाता है. ऐसा क्यों होता है. इसकी कथा क्या है? आइए इस बारे में विस्तार से इस कथा में जानते हैं.
क्या है रथ यात्रा की परंपरा?
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ मुख्य मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर जाते हैं. इस यात्रा पर भगवान की अपनी मौसी के घर जाने की यात्रा मानते हैं. यहां वे कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुदा यात्रा के माध्यम से वापस अपने धाम को लौटते हैं. दरअसल, गुंडिचा देवी की कोई संतान नहीं थी. इसलिए, जगन्नाथ जी उनके पास मातृत्व प्रेम पाने के लिए हर साल जाते हैं.
गर्भगृह से बाहर आते हैं साक्षात ईश्वर
दरअसल, ओडिशा के पुरी में स्थित श्रीमंदिर माता लक्ष्मी का ससुराल कहलाता है. यह मंदिर सिर्फ सनातन धर्म को मानने वाले लोगों को ही प्रवेश की अनुमति देता है. ऐसे में प्रभु के कई ऐसे भक्त, जो किसी कारण मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं, उन्हें स्वयं दर्शन देने के लिए बाहर आते हैं. जगन्नाथ रथ यात्रा का हिस्सा हर जाति-वर्ग का मुनष्य बन सकता है. रथ यात्रा के दौरान उनके रथ और उनकी मूर्ति का स्पर्श कोई भी कर सकता है. जगन्नाथ जी इसलिए, मंदिर से स्वयं अपने साक्षात रूप में बाहर आते हैं ताकि कोई भी पृथ्वी पर रहने वाला प्राणी उनके दर्शन से वंचित न रहें. इसलिए, रथ यात्रा के पावन पर्व को समानता का पर्व भी कहते हैं. ओडिशा के लोगों के लिए यह सिर्फ पर्व नहीं बल्कि एक भव्य उत्सव होता है.
जगन्नाथ जी की मौसी के घर जाने की सुंदर कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में बताया जाता है कि महाप्रभु जगन्नाथ जी का मंदिर बनाने से पहले समंदर किनारे एक दारु यानी बड़ा लकड़ी का टुकड़ा मिला था. उस समय राजा इंद्रद्युमन को स्वपन में जगन्नाथ जी ने दर्शन दिए थे और मंदिर बनाने का आदेश दिया था. इसके बाद राजा ने राज्य के सभी अलग-अलग बढ़ई को बुलाया ताकि उस लकड़ी के टुकड़े से मूर्तियों का निर्माण किया जा सके. मगर एक से एक महान कारीगर आए पर कोई उस लकड़ी को काट भी नहीं पाया. इसके बाद दो मजदूर स्वयं राजा के महल आए. उनमें से एक बूढ़ा कारीगर था. उन्होंने राजा से कहा की वे मूर्तियों को निर्माण कर सकते हैं. मगर इसके लिए उनकी एक शर्त थी. उन दोनों ने राजा से वचन लिया था कि वे जब तक मूर्तियां बनाएंगे, उनका कक्ष बंद रहेंगे. उस कक्ष में किसी के प्रवेश की अनुमति नहीं होगी. वे स्वयं जब मूर्तियां बन जाएगी तो द्वार खोलेंगे और बाहर आएंगे.
मगर राजा की पत्नी यानी रानी गुंडिचा मूर्ति निर्माण कार्य के दौरान बहुत व्याकुल रहती थी. वे बार-बार राजा से कहती कि एकबार कक्ष का दरवाजा खोले और दोनों कारीगरों को देखें. आखिर मूर्तियां कितनी बनी है. लेकिन राजा हर बार अपने वचन के कारण पीछे हट जाते थे. एक दिन रानी की उत्सुकता बढ़ गई और उन्होंने कक्ष का दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही रानी की आंखे फटी की फटी रह गई क्योंकि जो उन्होंने देखा था, वह बिल्कुल दिव्य था.
दिव्य आलौकिक मूर्तियों के किए दर्शन
रानी ने भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहनों की अधूरी मूर्तियां देखी. ये मूर्तियां इतनी दिव्य और चमत्कारी थी कि रानी देखते ही मनमोहित हो गई. मूर्तियों से एक तेज निकल रहा था, जो अलौकिक था. अचानक रानी ने देखा कि मूर्तियों के पैर नहीं है. सुभद्र के न ही कान है और न ही हाथ-पैर थे. जबकि दोनों भाइयों के हाथ अधूरे थे. इन अधूरी मूर्तियों का पूजन कैसे होगा, यह सोचकर रानी ने सोचा कि मूर्तियों का काम पूरा होने दिया जाएं. मगर ये क्या कक्ष खोलते ही मूर्तियों के तो दर्शन हुए लेकिन दोनों कारीगर वहां नहीं थे. बूढ़ा बढ़ई और उसका साथी वहां नहीं थे. वे अदृश्य हो चुके थे. राजा ने उन्हें ढूंढने के लिए सैनिकों को भेजा लेकिन वह नहीं मिले.
राजा चिंतित हो गए कि शायद उनसे कोई गलती हो गई है और अब भगवान की मूर्तियां अधूरी है तो उनको मंदिर में स्थापित कैसे किया जाए. उस रात राजा के सपने में फिर से जगन्नाथ जी आए. उन्होंने राजा से कहा कि वे उन अधूरी मूर्तियों को ही मंदिर में स्थापित करवाएं. भक्तों को दर्शन से वंचित न रखें. साथ ही बताया कि वे दोनों कारीगर कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे. इसलिए, कक्ष का द्वारा खुलते ही वह अदृश्य हो गए थे. इसके बाद मंदिर में इसी रूप में भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा की पूजा आज भी पुरी में की जाती है.
नवकलेवर उत्सव क्या है?
नवकलेवर उत्सव में भगवान जगन्नात की दारु मूर्तियों का फिर से निर्माण होता है. इन मूर्तियों को बनाने के लिए नीम के पेड़ की लकड़ियों की आवश्यकता होती है. यह उत्सल हर 12 साल से 19 साल के अंतराल में किया जाता है. पिछली बार नवकलेवर उत्सल साल 2015 में हुआ था. इसके बाद अब साल 2034 में इसका आयोजन होने वाला है. नवकलेवर में भगवान जगन्नाथ जी की मूर्तियों में ब्रह्म पदार्थ स्थापित किया जाता है. कहते हैं कि ये भगवान श्रीकृष्ण का हृदय होता है. जब मूर्तियों का निर्माण हो जाता है तो ब्रह्म पदार्थ को नई मूर्तियों में स्थापित करने के लिए पुरी शहर में ब्लैक आउट हो जाता है. सारे शहर का पावर कट होता है और अंधेरा किया जाता है.
स्नान पूर्णिमा और बीमारी की मान्यता
हर साल रथ यात्रा से पहले स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का 108 कलशों के जल से अभिषेक करते हैं. मान्यता है कि इसके बाद भगवान बीमार हो जाते हैं और 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते हैं. इस अवधि को "अनवसर काल" कहते हैं. इसके बाद स्वस्थ होने पर भगवान रथ पर सवार होकर भक्तों के बीच आते हैं, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं. इस भव्य उक्सव को ही रथ यात्रा कहते हैं.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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