सुल्तानपुर के 12 परगनों का इतिहास, मुगल काल से अंग्रेजी हुकूमत तक हुए बदलाव, आज भी राजस्व अभिलेखों में इस शब्द का होता है इस्तेमाल
इतिहासकार राजेश्वर सिंह की पुस्तक सुल्तानपुर इतिहास की झलक के पृष्ठ 33 में परगना शब्द का उल्लेख किया गया है. वह बताते हैं कि परगना शब्द का प्रयोग भूमिकर के भुगतान के लिए सबसे पहले 1210 ईस्वी में किया गया. सीए इलियट ने उन्नाव क्रॉनिकल में लिखा है कि शहाबुद्दीन गोरी के समय में पहली बार परगना शब्द का इस्तेमाल हुआ है. डॉक्टर डब्ल्यू ओलडम ने भी लिखा है कि पहली बार परगना शब्द का प्रयोग प्रारंभिक मुस्लिम काल में जंगलों के मध्य जोती गई भूमि के लिए किया गया था. इस निश्चित भूभाग को एक विशेष वंश और जाति के लोग अपने अधिकार में रखते थे.
क्या आपने खाई बघेलखंड की मशहूर 'बखरी'? स्वाद के आगे खीर-रबड़ी भी फेल, 10 मिनट में होती तैयार
How to make bakhri from rice and milk: रात में बचे चावल का क्या करें? अगर आपके मन में भी ऐसे सवाल आते हैं तो यह खबर आपके लिए है. बचे चावल को फेंकने की बजाय बघेलखंड की मशहूर पारंपरिक मिठाई बखरी बना सकते हैं. इसे दूध, चावल और सूखे मेवों से तैयार किया जाता है. इसे बनाने में 10 मिनट का समय लगता है. आप चाहें तो इसे एकदम गर्मागर्म परोसें या फिर फ्रिज में रखकर ठंडी-ठंडी बखरी का आनंद लें. यह स्वादिष्ट डिश आज मध्य प्रदेश के सतना और पूरे बघेलखंड की पहचान बन गई है. इस डिश के आगे महंगा डेजर्ट का स्वाद भी फीका लगता है. खास बात यह है कि इसे त्योहारों, जन्मदिनों, पारिवारिक आयोजनों और मेहमानों के स्वागत में बड़े चाव से बनाया जाता है. लेकिन परंपरा के अनुसार, इसे हफ्ते के दो दिन रविवार और बुधवार नहीं बनाना कहा गया है. एक बार यह रेसिपी घर में जरूर बनाएं आप खीर और रबड़ी का स्वाद भी भूल जाएंगे. वीडियो में देखिए बखरी बनाने की पूरी विधि...























