28 फरवरी 2026 से 6 मार्च 2026 के बीच, अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद युद्ध का पहला हफ्ता चल रहा था। युद्ध अपने चरम पर था और ईरानी मिसाइलें ज्वालामुखी की तरह फट रही थीं। पूरे मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में भारी तबाही मची थी।
इसी बीच, समुद्र से मात्र 50 फीट की ऊंचाई पर ईरान अपने साहस और बहादुरी की एक नई कहानी लिखने जा रहा था। ईरान का एक लड़ाकू विमान (फाइटर जेट) फारस की खाड़ी की लहरों के बिल्कुल करीब से उड़ रहा था। यह विमान आसमान में ऊंचाई पर उड़ने के बजाय, समुद्र की लहरों से बिल्कुल सटकर उड़ रहा था। इसे अपना लंबा और गुप्त सफर लहरों के ठीक ऊपर ही पूरा करना था, जहां एक छोटी सी गलती का मतलब सीधे मौत था।
दुश्मन की सोच से परे एक चाल
इस लड़ाकू विमान में ईरान के दो पायलट सवार थे, जो इसे फारस की खाड़ी से कुवैत की ओर ले जा रहे थे। उस दिन कुछ ऐसा होने वाला था, जिसकी कल्पना ईरान के दुश्मनों अमेरिका और इजराइल ने सपने में भी नहीं की होगी। आमतौर पर दुनिया यही मानती थी कि ईरान की वायुसेना बहुत कमजोर है। यह सच है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान के पास बहुत आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं हैं। लेकिन उनकी बहादुरी और सूझबूझ इतनी थी कि आज यह सोच गलत साबित होने वाली थी। ईरान ने अपने तरीके से चाल चली और इजराइल बस देखता रह गया। समुद्र के ठीक ऊपर उड़ने वाला यह ईरानी विमान वियतनाम युद्ध के समय का एक बहुत पुराना 'नॉर्थ F-5' लड़ाकू विमान था। इसे 1979 की इस्लामी क्रांति से बहुत पहले, ईरान के शाही परिवार ने अमेरिका से ही खरीदा था। हथियारों से लैस यह पुराना विमान कुवैत की तरफ बढ़ रहा था।
विमान को इतना नीचे क्यों उड़ाया गया?
अब सवाल यह उठता है कि ईरानी पायलट इस पुराने F-5 विमान को समुद्र के इतने करीब और इतना नीचे क्यों उड़ा रहे थे? क्या इसमें कोई तकनीकी खराबी आ गई थी? इस बात का खुलासा खुद ईरान की वायुसेना के उन पायलटों ने किया है। युद्ध के करीब 100 दिन बाद, इन पायलटों ने ईरानी मीडिया को एक इंटरव्यू दिया (सुरक्षा कारणों से मीडिया ने इनके चेहरे छिपा दिए थे)। ईरान की सेना अपने सैनिकों के बलिदान और अदम्य साहस के लिए जानी जाती है, और इस मिशन में भी उनकी हिम्मत की चरम सीमा देखने को मिली। आमतौर पर दुश्मन के रडार किसी भी उड़ने वाली चीज को पहचान कर बता देते हैं कि वह खतरनाक है या नहीं। अगर वह खतरनाक होती है, तो तुरंत हमला कर दिया जाता है। इसी रडार से बचने के लिए, ईरानी पायलटों ने अपनी योग्यता और तकनीक का इस्तेमाल करते हुए 50 साल से भी पुराने इस विमान को पानी से सिर्फ 50 फीट की ऊंचाई पर उड़ाया। ईरान से कुवैत तक यह विमान केवल 50 फीट की ऊंचाई पर ही उड़ता रहा, जबकि सुरक्षा के लिहाज से लड़ाकू विमानों की ऊंचाई कम से कम 500 फीट होनी चाहिए। पायलटों ने बताया कि कई जगह तो ऐसा भी हुआ कि उनका विमान समुद्र में चल रहे बड़े-बड़े पानी के जहाजों के बराबर या उनसे भी नीचे उड़ रहा था।
हमला और मिशन की कामयाबी
अब इस घटना के दूसरे हिस्से पर आते हैं। रडार की नजरों से बचते-बचाते ईरान का यह F-5 विमान कुवैत में स्थित अमेरिकी बेस 'अली अल सालेम एयर बेस' के ठीक ऊपर पहुंच जाता है। इससे पहले कि अमेरिका की वायु रक्षा प्रणाली (एयर डिफेंस सिस्टम) और वहां तैनात सैनिक कुछ समझ पाते, विमान ने जोरदार हमला कर दिया। इस अचानक हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिक मारे गए। अपना काम (मिशन) पूरा करके ईरान के पायलट तुरंत वहां से सुरक्षित निकल गए।
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55 साल बाद पाकिस्तान एक बार फिर अपनी पुरानी गलती दोहराने का दुस्साहस करता हुआ दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने का नाम नहीं ले रहा और इस बार चीन के साथ मिलकर उसने एक ऐसा दांव खेला है जिससे कई एक्सपर्ट्स उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल भी बता रहे हैं। 1971 की जंग में बंगाल की खाड़ी पाकिस्तान के लिए कब्रगाह साबित हुई थी। भारतीय नौसेना ने ऐसा प्रहार किया कि पाकिस्तान की समुद्री ताकत बहुत बुरी तरह से बिखर गई। उसे दशकों तक उस इलाके से दूर रहना पड़ा। लेकिन अब 55 साल बाद पाकिस्तान फिर उसी बंगाल की खाड़ी में लौटने की तैयारी कर रहा है।
चीन से मिली नई हैंगोर क्लास पनडुब्बी के दम पर पाकिस्तान भारत को आंख दिखाने की कोशिश कर रहा है। सपने देख रहा है। लेकिन क्या पाकिस्तान इतिहास भूल चुका है? बता दें कि पाकिस्तान को हाल ही में चीन से अपनी पहली हैंगोर क्लास पनडुपी मिली है जो कराची पहुंच चुकी है। इसके बाद पाकिस्तानी नौसेना के जो वरिष्ठ अधिकारी हैं यह खुलकर यह दावा कर रहे हैं कि यह पनडुब्बी भविष्य में बंगाल की खाड़ी तक उसकी सैन्य पहुंच बढ़ा सकती है। अब यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है पाकिस्तान को अचानक बंगाल की खाड़ी में लौटने की जरूरत क्यों पड़ गई? क्योंकि 1971 की हार के बाद पाकिस्तान की नौसेना लगभग पूरी तरह अरब सागर तक सीमित हो गई थी। लेकिन अब इस्लामाबाद सिर्फ अपनी समुद्री सीमा की रक्षा नहीं बल्कि हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में भी रणनीतिक मौजूदगी अपनी बनाना चाहता है।
सपने देख रहा है उसके और यहीं से शुरू होती है चीन की एंट्री। पाकिस्तान सिर्फ एक नहीं बल्कि आठ हैंगोर क्लास पनडुपियां शामिल करने की प्लानिंग कर रहा है। इस योजना पर काम कर रहा है। यह सभी पनडुपियां चीन की मदद से तैयार की जा रही है और पाकिस्तान इन्हें अपनी नौसेना का भविष्य बता रहा है। लेकिन आखिर यह हैंगोर क्लास इतनी खास क्यों है? क्यों चर्चा है इसकी? दरअसल आपको बता दें कि इसकी सबसे बड़ी ताकत है एआईपी यानी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपुलेशन तकनीक। आसान भाषा में समझे तो यह तकनीक पनडुब्बी को लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपे रहने की क्षमता देती है। यानी दुश्मन के लिए उसे ढूंढना पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा मुश्किल हो जाता है। लेकिन रुकिए। पाकिस्तान जिस पनडुब्बी को गेम चेंजर बता रहा है उसका जवाब भारत के पास ऐसा है जिसके बारे में पाकिस्तान शायद बात भी नहीं करना चाहता। पिछले कुछ समय में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रिश्तों में तेजी से सुधार देखने को मिला। दोनों देशों के बीच रक्षा संपर्क बड़े हैं, व्यापार बढ़ा है और सैन्य सहयोग को लेकर भी बातचीत काफी तेज है।
यही वजह है कि पाकिस्तान की बंगाल की खाड़ी में बढ़ती दिलचस्पी को सिर्फ एक पनडुपी की कहानी के तौर पर नहीं माना जा रहा है। देखा जा रहा है। कई डिफेंस एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि अगर भविष्य में पाकिस्तान को चीन का लगातार तकनीकी सहयोग और क्षेत्रीय स्तर पर बेहतर सामरिक समन्वय मिलता है तो बंगाल की खाड़ी में उसकी गतिविधियां बढ़ सकती हैं। उसकी एक्टिविटीज़ बढ़ सकती हैं। लेकिन क्या इससे भारत की मुश्किलें बढ़ जाएंगी?
यहीं पर पूरी तस्वीर बदल जाती है क्योंकि जिस क्षेत्र में पाकिस्तान वापसी का सपना देख रहा है वह भारत का सबसे मजबूत समुद्री इलाका माना जाता है। भारत के पास सिर्फ एक नहीं बल्कि कई स्तर की समुद्री ताकत मौजूद है। भारतीय नौसेना के पास दो विमान वाहक पोत हैं। परमाणु पनडुपियां हैं। अत्याधुनिक विध्वंसक युद्धपोत है और लंबी दूरी तक निगरानी करने वाले समुद्री गश्ती विमान है। अगर पनडुब्बी की ताकत की बात करें तो भारत के पास पाकिस्तान की नई हैंगोर क्लास के मुकाबले कहीं ज्यादा उन्नत क्षमताएं मौजूद है। भारतीय नौसेना के बेड़े में परमाणु शक्ति से लेस आईएएस अरिहंत और आईएएस अरिघात जैसी पनडुब्बीयां पहले से ही हैं जो महीनों तक समुद्र के भीतर रह सकती है। इसके अलावा भारत के पास कलवरी क्लास की आधुनिक स्कर्पियन पनडुपियां भी है जिन्हें हिंद महासागर में बेहद खतरनाक माना जाता है। पाकिस्तान तो बहुत पीछे है। इतना ही नहीं भारत की पी8i निगरानी विमान एमए 60R एंटी सबमरीन हेलीकॉप्टर और अंडमान निकोबार की रणनीतिक स्थिति मिलाकर किसी भी संदिग्ध पनडुपी की गतिविधि पर नजर रखने की क्षमता को और भी ज्यादा मजबूत बनाते हैं। यही नहीं भारत के पास आधुनिक एंटी सबमरीन हेलीकॉप्टर उन्नत सोनार सिस्टम और समुद्र के भीतर दुश्मन पनडुब्बियों को ट्रैक करने की मजबूत क्षमता पहले से ही है।
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