एक महीने तक चले भीषण सैन्य संघर्ष के बाद, डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच हुआ अंतरिम शांति समझौता दुनिया के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है। वाशिंगटन इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है, तो दूसरी तरफ दुनिया की महाशक्तियों के हमले झेलने के बाद भी ईरान पूरी तरह झुका नहीं है। इस युद्ध में कोई स्पष्ट विजेता भले ही न निकला हो, लेकिन इसके मलबे से एक बात साफ नजर आ रही है। इस पूरे टकराव के सबसे बड़े राजनीतिक शिकार इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन 'बिबी' नेतन्याहू हुए हैं। नए मध्य पूर्व का सपना दिखाने वाले नेतन्याहू आज अपने ही बुने चक्रव्यूह में घिर चुके हैं। पिछले तीन सालों से ईरान, हमास और हिज़्बुल्लाह के साथ लगातार जारी युद्ध ने इज़राइल को मोर्चे पर तो व्यस्त रखा, लेकिन कोई स्थायी शांति या सुरक्षा नहीं दी। अब, जब अक्टूबर में इज़राइल एक बेहद संवेदनशील और जोखिम भरे चुनाव की दहलीज़ पर खड़ा है, तब यह सवाल सबसे बड़ा हो गया है। क्या ईरान-अमेरिका समझौते ने 'बिबी' के राजनीतिक भविष्य पर पूर्णविराम लगा दिया है?
क्या नेतन्याहू सबसे बड़े हारे हुए नेता बनकर उभरे?
इसके विपरीत, नया मध्य पूर्व कुछ इस तरह दिखता है हमास अभी भी गाजा के एक हिस्से पर नियंत्रण रखता है, लेबनान में हिजबुल्लाह का दबदबा कायम है, और एक घायल ईरानी शासन एक नए सर्वोच्च नेता और अधिक शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के साथ अभी भी बरकरार है। इसके अलावा, जबकि इज़राइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के साथ युद्ध छेड़ा, तेल अवीव को शांति समझौते की बातचीत से काफी हद तक अलग रखा गया। ट्रंप द्वारा पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में चुना जाना स्थिति को और भी बदतर बना दिया। कड़वी सच्चाई यह है कि नेतन्याहू ने अपनी जंग पर सब कुछ दांव पर लगा दिया। अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते से इज़राइल के कई लक्ष्य अधूरे रह गए हैं और इससे नेतन्याहू और ट्रंप के रिश्ते भी खराब हो गए हैं। रिश्ते अब वैसे नहीं रहे जैसे फरवरी में थे, जब नेतन्याहू ईरान पर हमले की योजना लेकर व्हाइट हाउस गए थे और ट्रंप को आसानी से प्रभावित कर लिया था। असल में, इस समझौते के कारण चुनाव से चार महीने पहले इज़राइली प्रधानमंत्री के पास दिखाने के लिए कोई उपलब्धि नहीं बची है। ईरान पर हमला करना और हिज़्बुल्लाह जैसे उसके प्रॉक्सी (सहयोगी गुटों) को खत्म करना नेतन्याहू का दशकों पुराना जुनून था। उन्होंने लंबे समय से ईरान और उसके प्रॉक्सी को इज़राइल और मध्य पूर्व के लिए खतरा बताया है। हालांकि, इज़राइली प्रधानमंत्री को व्हाइट हाउस में कोई ऐसा साथी नहीं मिला जो उनका साथ देने को तैयार हो। ट्रंप के दोबारा चुने जाने के बाद नेतन्याहू को एक मौका दिखा। उनका दांव काम आया और इस साल 28 फरवरी को इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर जोरदार हमला किया।
लेबनान के मुद्दे का क्या हुआ
लेकिन जिस बात ने इज़राइल को सबसे ज़्यादा नाराज़ किया है, वह है इस डील में लेबनान को शामिल करना। असल में, यह डील इज़राइल को उस देश में मिलिट्री ऑपरेशन करने से रोकती है। इसके बदले में, ईरान लेबनान में हिज़्बुल्लाह समेत अपने प्रॉक्सी ग्रुप्स को काबू में रखने पर सहमत हो गया है। नेतन्याहू के लिए यह एक चौंकाने वाली घटना थी। देश में होने वाले विरोध की आशंका को देखते हुए, इज़राइली प्रधानमंत्री ने इसी हफ़्ते साफ़ कर दिया कि इज़राइल लेबनान के उन इलाकों से पीछे नहीं हटेगा जिन पर अभी उसका कब्ज़ा है। यह पूरा घटनाक्रम नेतन्याहू के लिए एक कड़ा सबक रहा है। इन घटनाओं से पता चला है कि जब मिलिट्री ऑपरेशन की बात आती है, तो ट्रंप के लिए सिर्फ़ अपना फ़ायदा ही मायने रखता है। जैसा कि भारत ने पिछले साल पाकिस्तान के साथ टकराव के दौरान देखा था। ट्रंप को शांति समझौतों से मिलने वाली तारीफ़ें पसंद हैं और वे नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिए बेताब हैं। इसलिए, उन्हें नेतन्याहू को मुश्किल में डालने या उनकी बलि चढ़ाने में कोई परहेज़ नहीं है।
चुनाव से पहले नेतन्याहू के लिए बड़ी परीक्षा की घड़ी
नेतन्याहू के कार्यकाल की एक और बड़ी मुश्किल अक्टूबर 2023 में हुई सुरक्षा की भारी चूक थी, जब हमास ने इज़राइल पर हमला किया था। एक मज़बूत इंटेलिजेंस सर्विस होने के बावजूद, इज़राइल उस अचानक हुए हमले का अंदाज़ा नहीं लगा पाया, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। ईरान के ख़िलाफ़ एक सफल अभियान नेतन्याहू के लिए एक तरह से अपनी छवि सुधारने का मौका होता, जिसका ज़िक्र वे अपनी चुनावी रैलियों में ज़ोर-शोर से कर सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। असल में नेतन्याहू अक्टूबर 2023 के बाद से एकमात्र ऐसे बड़े नेता हैं जिन्होंने न तो इस्तीफ़ा दिया और न ही माफ़ी मांगी। हमास के हमले की वजह बनी सरकारी नाकामियों की जांच में रुकावट डालने के लिए भी उनकी आलोचना हुई है। आख़िरकार नवंबर 2025 में एक जांच शुरू की गई, लेकिन जांच करने वाली टीम को खुद नेतन्याहू ने ही चुना था।
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