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Diplomatic Comparison: ईरान को झुकाने में कौन रहा ज्यादा असरदार? बराक ओबामा या डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक इतिहास का एक और नया अध्याय जुड़ गया है। दोनों देशों के बीच हुए ताजा शांति समझौते पर डिजिटल सिग्नेचर होने के बाद पूरे पश्चिम एशिया ने राहत की सांस ली है। इस समझौते के सामने आते ही अब वैश्विक स्तर पर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा बेहद तेज हो गई है कि तेहरान को झुकाने और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को चकनाचूर करने में वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अधिक सफल रहे या पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा।

यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि दोनों ही नेताओं ने एक ही लक्ष्य को हासिल करने के लिए दो बिल्कुल विपरीत और अलग रणनीतियों का रास्ता चुना था। जहां ओबामा ने बातचीत और कूटनीति पर भरोसा जताया था, वहीं ट्रंप ने 'मैक्सिमम प्रेशर' यानी अत्यधिक आर्थिक और सैन्य दबाव की नीति को अपना मुख्य हथियार बनाया।

​बराक ओबामा की जेसीपीओए डील और कूटनीति का रास्ता 
अगर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो साल 2013 से 2015 के बीच तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने ईरान के साथ एक बेहद लंबी और जटिल वार्ता की थी। इस कूटनीतिक प्रयास का नतीजा था साल 2015 का ऐतिहासिक परमाणु समझौता, जिसे आधिकारिक तौर पर जेसीपीओए (Joint Comprehensive Plan of Action) कहा गया। इस समझौते के तहत ईरान ने सिद्धांतों और प्रतिबद्धता के साथ अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता को सीमित करने, सेंट्रीफ्यूज की संख्या घटाने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सख्त निरीक्षण को बिना शर्त स्वीकार करने पर सहमति दी थी।

इसके बदले में ओबामा प्रशासन ने ईरान पर लगे कई कड़े वैश्विक और आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए थे ताकि उसकी अर्थव्यवस्था दोबारा पटरी पर लौट सके। इस समझौते को ओबामा की कूटनीति की एक बेहतरीन मिसाल माना गया था, जिसका उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह शांतिपूर्ण दायरे में रखना था।

​ओबामा की डील पर संदेह और डोनाल्ड ट्रंप की सख्त रणनीति 
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ट्रंप के इस नए समझौते को लेकर थोड़ा संदेह जरूर व्यक्त किया है। ओबामा का मानना है कि कोई भी नया समझौता उस पुराने जेसीपीओए समझौते से बहुत ज्यादा अलग नहीं हो सकता है, जिस पर उनकी टीम ने सालों तक बेहद बारीकी से काम किया था। हालांकि, उन्होंने एक सकारात्मक संदेश देते हुए यह उम्मीद जताई है कि इस नए कूटनीतिक कदम से मिडिल ईस्ट में बमबारी रुकेगी और आम लोग युद्ध की विभीषिका से परेशान नहीं होंगे।

ओबामा ने विदेश नीति के कठिन दौर को याद करते हुए कहा कि कभी-कभी यह सोच बहुत आकर्षक लग सकती है कि सिर्फ धौंस जमाकर या सैन्य बमबारी करके समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन असल बात यह है कि कूटनीति का रास्ता अपनाने और समझौतों की संभावनाओं को आजमाने के लिए समय निकालना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, कूटनीति भले ही किसी समस्या का शत-प्रतिशत हल न करे, लेकिन युद्ध की नौबत आए बिना 80 से 90 प्रतिशत मामलों को शांति से सुलझा देती है।

​प्रतिबंधों की मार और ट्रंप के कार्यकाल में उपजा नया संकट 
इसके विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप का दावा रहा है कि उनकी आक्रामक नीतियों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया था। उनके पिछले कार्यकाल के दौरान अमेरिका के जेसीपीओए समझौते से बाहर निकलने के बाद ईरान की मुद्रा रियाल बेहद कमजोर हो गई थी, वहां की घरेलू महंगाई चरम पर पहुंच गई थी और तेल राजस्व में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बावजूद, तेहरान उस समय किसी नई और व्यापक परमाणु डील के लिए तैयार नहीं हुआ, बल्कि उसने धीरे-धीरे जेसीपीओए की कई सीमाओं का उल्लंघन करना शुरू कर दिया।

इस वजह से एक समय ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने का 'ब्रेकआउट टाइम' एक वर्ष से घटकर महज कुछ हफ्तों के स्तर तक आ गया था। इसके बाद के वर्षों में ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों से पूरा पश्चिम एशिया और भारत समेत दुनिया दहल गई थी, जिसमें ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

अब वर्ष 2026 में हुए इस नए समझौते के बाद ट्रंप समर्थकों का दावा है कि इस बार अमेरिका ईरान का न्यूक्लियर डस्ट भी समय के साथ पूरी तरह उठाकर ले जाएगा। बहरहाल, ओबामा ने जहां एक छोटी अवधि के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोक दिया था, वहीं ट्रंप की सख्ती ने ईरान को आर्थिक रूप से बेहद कमजोर किया, जिससे मजबूर होकर तेहरान को अब इस नए समझौते की मेज पर आना पड़ा है।

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