समंदर के बीचों-बीच एक फिल्मी ऑपरेशन चल रहा था। हेलीकॉप्टर से ब्रिटिश कमांडो नीचे उतर रहे थे। निशाने पर था रूस की कथित शैडो फ्लट से जुड़ा एक विशाल तेल टैंकर और उसी जहाज पर मौजूद थे 22 भारतीय नाविक। समंदर से इस वक्त एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। जहां ब्रिटेन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसे रूस के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। ब्रिटिश रॉयल नेवी और सुरक्षा एजेंसियों ने रूस की कथित शैडो फ्लट से जुड़े तेल टैंकर सिमट्रोस को इंग्लिश चैनल में रोक लिया है और उसे निगरानी में इंग्लैंड के दक्षिणी तट की ओर ले जाया जा रहा है। करीब 6 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में ब्रिटेन के रॉयल मरीन कमांडो, नेशनल क्राइम एजेंसी और रॉयल एयरफोर्स शामिल रहे। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी फुटेज में हथियार बंद कमांडो हेलीकॉप्टर से रस्सियों के सहारे सीधे जहाज पर उतरते हुए दिखाई दिए। कुछ ही मिनटों में पूरे जहाज को सुरक्षा बलों ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री की स्ट्रामर ने इस ऑपरेशन की पुष्टि करते हुए यह कहा है कि यह रूस की युद्ध मशीन पर सीधा प्रहार है। उनके मुताबिक रूस तेल बेचकर जो पैसा कमा रहा है उसी का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध को जारी रखने के लिए किया जा रहा है। लेकिन ऐसे में सवाल यह है कि आखिर यह शैडो फ्लट है क्या? यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने कथित तौर पर सैकड़ों जहाजों का एक नेटवर्क तैयार किया है। यह रिपोर्ट्स में कहा गया जिसे शैडो फीट कहा जाता है। यह जहाज अक्सर अपना नाम या फिर झंडा और मालिकाना रिकॉर्ड बदलते रहते हैं। जिससे कि इनकी पहचान और ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है। अब ब्रिटेन का दावा है कि रूस के प्रतिबंधित तेल की लगभग 75% धुलाई इसी नेटवर्क के जरिए होती है। यही वजह है कि पश्चिमी देश इसे क्रेमलिन की आर्थिक लाइफ लाइन मानते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस नेटवर्क में 700 से ज्यादा जहाज शामिल है और ब्रिटेन पहले ही इनमें से 500 से अधिक जहाजों पर प्रतिबंध लगा चुका है। दिलचस्प बात यह है कि जिस सिमट्रोस टैंकर को रोका गया है, उस पर 22 भारतीय नाविक भी मौजूद थे। फिलहाल जहाज को इंग्लैंड के दक्षिणी तट के पास निगरानी में रखा गया है और उसके दस्तावेजों और गतिविधियों तथा मालिकाना नेटवर्क की जांच की जा रही है। पड़ताल जारी है। ब्रिटेन के रक्षा अधिकारियों का यह कहना है कि यह सिर्फ एक जहाज को रोकने की कारवाही नहीं है बल्कि रूस की कथित शैडो फ्लट के खिलाफ व्यापक अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस ऑपरेशन में फ्रांस के साथ भी समन्वय किया गया और दोनों देश पिछले कई महीनों से इस नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। ऑपरेशन चला रहे हैं।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि इस कारवाही पर रूस की प्रतिक्रिया रिएशंस क्या कुछ सामने आते हैं। क्योंकि अगर पश्चिमी देशों ने शैडो फ्लड के खिलाफ इसी तरह की कारवाही जारी रखी तो इसका असर सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि सीधे रूस की तेल कमाई और यूक्रेन युद्ध की फंडिंग पर भी पड़ सकता है।
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अमेरिका भारत के खिलाफ जो एक्शन ले रहा है वह दरअसल एक्शन नहीं रिएक्शन है। असली एक्शन तो भारत ले रहा है जिसके बारे में कोई बात ही नहीं कर रहा। भारत पर टेरिफ लगाना, एच1 बी वीजा के खिलाफ बयान देना, भारतीय नाविकों को मारना, अमेरिका यह सब कुछ बेवजह कर रहा है? दरअसल सच यह है कि भारत ने अमेरिका के खिलाफ एक इतना बड़ा एक्शन लिया है जिसका रिएक्शन अमेरिका अपनी बौखलाहट में दिखा रहा है। अमेरिका नाराज है कि भारत अभी तक ट्रेड डील फाइनल नहीं कर रहा। एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक को भारत में घुसने नहीं दे रहा लेकिन भारत सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने अमेरिका की जड़े हिला दी हैं। इस एक फैसले से पीएम मोदी ने अमेरिकी डीप स्टेट के कई खतरनाक लोगों की गर्दन पकड़ ली है। जिसके बाद इन सभी लोगों ने ट्रंप पर भारत के खिलाफ कदम उठाने का दबाव बनाया।
आपने देखा होगा कि पीएम मोदी की सरकार गिराने की कई बार कोशिशें हुई। अमेरिकी डीप स्टेट के एक बड़े खिलाड़ी जॉर्ज सोरोस ने कहा था कि मैं पीएम मोदी को हटाने के लिए 1 बिलियन डॉलर तक खर्च कर दूंगा। अमेरिका में ऐसे कई जॉर्ज सोरोस बैठे हैं जो भारत को अस्थिर करना चाहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना चाहते हैं। अमेरिकी डीप स्टेट जिस विदेशी फंडिंग और एनजीओस का इस्तेमाल करके भारत को अस्थिर करना चाहते थे। अब पहली बार पीएम मोदी ने अमेरिका के उसी हथियार पर हमला कर दिया है। अमेरिका की इसी बौखलाहट का सबसे बड़ा सबूत कुछ दिन पहले देखने को मिला जब पहली बार अमेरिका की डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों ही पार्टियों ने भारत के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी एफसीआरए कानून में प्रस्तावित बदलावों की आलोचना शुरू कर दी है। इसी एफसीआरए कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर अमेरिका और यूरोपीय देश भारत में काम कर रहे एनजीओस को फंडिंग भेजते थे।
क्रिश्चियन मिशनरीज को फंडिंग देते थे। लेकिन अब यह सब कुछ रुक जाएगा क्योंकि भारत ने एफसीआरए कानून में बहुत बड़े बदलावों का ऐलान कर दिया है। पहली बार अमेरिका भारत के किसी घरेलू कानून को रुकवाने के लिए इतना पागल हो गया है। इससे साफ होता है कि भारत ने अमेरिका पर बहुत बड़ी स्ट्राइक की है। अमेरिका के दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने डोनाल्ड ट्रंप से कहा है कि भारत एफसीआरए कानूनों में जो बदलाव ला रहा है उसे किसी भी तरह से रोकना होगा। दरअसल खबर है कि मोदी सरकार 2010 के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट में जो बदलाव कर रही है, उससे अमेरिका का भारत में फंडिंग भेजना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यह कानून अगर पास हो गया, तो अमेरिका और यूरोपीय देश भारत में बैठे क्रिश्चियन मिशनरीज और एनजीओस को आसानी से पैसा नहीं दे पाएंगे। यह बात किसी से नहीं छुपी कि अमेरिका से आने वाले पैसे का इस्तेमाल भारत में किस तरह से होता है। भारत एफसीआरए कानूनों में जो बदलाव कर रहा है उससे अमेरिकी डोनेशन से चलने वाली संस्थाएं और एनजीओस अब गलत काम नहीं कर पाएंगे। अगर यह गलत काम करते पकड़े गए तो इनकी प्रॉपर्टीज जब्त की जा सकती हैं। इनके अकाउंट्स को फ्रीज किया जा सकता है।
सरकार का ऐसे एनजीओस और संस्थाओं पर नियंत्रण और भी ज्यादा बढ़ जाएगा। अमेरिका जिस पैसे से भारत में सरकार गिराने की कोशिशें करता है, समाज में अस्थिरता लाने की कोशिश करता है, कॉकरोच जैसे प्रदर्शनों और किसान आंदोलन जैसे प्रदर्शनों में जो फंडिंग होती है, वो सब बंद हो जाएगी। इसीलिए अमेरिका बौखला गया है। 2010 का एफसीआरए कानून इतना कमजोर और इतने लूप होल वाला था जिसकी वजह से हजारों एनजीओस ने धर्मांतरण और लव जिहाद जैसे कामों के लिए विदेशी चंदा जुटाना शुरू कर दिया। इस कमजोर कानून की आड़ में अलगाववादियों, आतंकवादियों, जिहादियों, नक्सलियों और ईसाई मिशनरियों को फंडिंग मिलनी आसान हो गई थी। भारत विरोधी ताकतों ने इस कानून का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ही कर दिया था। यह नेशनल सिक्योरिटी का इशू बन गया था। लेकिन अब यह सब कुछ रुक जाएगा। अमेरिका इस कानून से इतना डर रहा है कि कुछ समय पहले उसने अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो को सीधे कोलकाता भेज दिया।
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