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क्या आप जानते हैं मरने के बाद आत्मा कहां जाती है और कब लेती है नया जन्म? गरुड़ पुराण में बताया गया है पूरा सच

Garuda Purana: हिंदू धर्म और सनातम धर्म में मृत्यु को अंत नहीं माना गया है. हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु केवल शरीर का अंत है, जबकि आत्मा अमर होती है. आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है. इसी रहस्य को विस्तार से समझने वाला प्रमुख ग्रंथ है गुरुड़ पुराण. इस पुराण में भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच हुए संवाद का वर्णन देखने को मिलता है. इसमें जीवन, मृत्यु, कर्म, स्वर्ग, नरक और पुनर्जन्म से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख है.  लेकिन कई लोगों के मन में यह जाननें की उत्सुकता रहती है कि मृत्यु के बाद आत्मा कहां जाती है और उसे समय जन्म कब मिलता है. आइए हम आपको इस आर्टिकल में विस्तार से इसके बारे में बताते हैं. 

मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है?

गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तब उसका शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाते है. लेकिन आत्मा शरीर का त्याग करके अपनी आगे की यात्रा शुरू करती है.शास्त्रों में बताया गया है कि मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर के रूप में रहती है. इस दौरान उसे अपने द्वारा किए गए कर्मों का बोध होने लगता है. आत्मा अपने परिजनों, घर और जीवन से जुड़ी घटनाओं को महसूस कर सकती है, लेकिन वह किसी से संपर्क नहीं कर पाती.

क्या आत्मा 13 दिनों तक घर के आसपास रहती है?

गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि मृत्यु के बाद शुरुआती दिनों में आत्मा अपने घर और परिवार के आसपास ही रहती है. इसी कारण हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद 10 दिन, 12 दिन या 13 दिन तक विभिन्न धार्मिक संस्कार किए जाते हैं. मान्यता है कि इन दिनों में किए जाने वाले पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म आत्मा की यात्रा को आसान बनाने में सहायक होते हैं. इसलिए सनातम परंपरा में अंतिम संस्कार और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है. 

यमदूत आत्मा को कहां लेकर जाते हैं?

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद यमदूत आत्मा को यमलोक की ओर ले जाते हैं. यह यात्रा व्यक्ति के कर्मों के अनुसार सुखद या कष्टदायक हो सकती है. जिन लोगों ने जीवन में अच्छे कर्म किए होते हैं, उन्हें इस यात्रा में कम कष्ट होता है. वहीं पाप कर्म करने वालों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. यमलोक पहुंचने के बाद आत्मा के कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है. इस काम में चित्रगुप्त की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है. चित्रगुप्त व्यक्ति के जीवनभर के कर्मों का हिसाब रखते हैं.

कर्मों के आधार पर मिलता है फल

गरुड़ पुराण का मूल संदेश है कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है.  यदि किसी व्यक्ति ने धर्म, दान, सेवा और सत्य का पालन किया है, तो उसे शुभ फल प्राप्त होता है. वहीं अधर्म, हिंसा, छल और अन्य पाप कर्म करने वाले लोगों को उनके कर्मों के अनुसार दंड भुगतना पड़ता है. यही कर्म आगे चलकर व्यक्ति के अगले जन्म को भी प्रभावित करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो वर्तमान जीवन के कर्म ही भविष्य के जन्म की दिशा तय करते हैं.

आत्मा को नया शरीर कब मिलता है?

यह प्रश्न सबसे अधिक पूछा जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को नया शरीर कितने दिनों में मिलता है. गरुड़ पुराण में किसी एक निश्चित समय सीमा का उल्लेख नहीं मिलता. शास्त्रों के अनुसार यह पूरी तरह व्यक्ति के कर्मों, उसकी आध्यात्मिक स्थिति और ईश्वर की व्यवस्था पर निर्भर करता है. कुछ आत्माओं को अपेक्षाकृत जल्दी नया जन्म मिल सकता है, जबकि कुछ को लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है. कई आत्माएं अपने कर्मफल के अनुसार पहले स्वर्ग या नरक का अनुभव करती हैं फिर उसके बाद पुनर्जन्म ग्रहण करती हैं. इसलिए यह मानना कि हर व्यक्ति को निश्चित दिनों या महीनों में नया शरीर मिल जाता है, शास्त्रीय दृष्टि से सही नहीं माना जाता.

अगला जन्म किस रूप में मिलता है?

गरुड़ पुराण और अन्य हिंदू ग्रंथों के अनुसार आत्मा को अगला जन्म उसके कर्मों के आधार पर प्राप्त होता है. यदि व्यक्ति ने श्रेष्ठ कर्म किए हैं, तो उसे बेहतर परिस्थितियों में मनुष्य जन्म प्राप्त हो सकता है. वहीं पाप कर्मों के कारण आत्मा को निम्न योनियों में जन्म मिलने की बात भी कही गई है. सनातन धर्म में कुल 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है. माना जाता है कि आत्मा अपने कर्मों के अनुसार इन विभिन्न योनियों में जन्म ले सकती है. हालांकि मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त करने का अवसर मिलता है.

क्या पुनर्जन्म निश्चित है?

हिंदू दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धांत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. गरुड़ पुराण के अनुसार जब तक आत्मा अपने सभी कर्मबंधनों से मुक्त नहीं हो जाती, तब तक जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है. इसे संसार चक्र या पुनर्जन्म का चक्र कहा जाता है. आत्मा बार-बार विभिन्न जन्म लेती है और अपने कर्मों का फल भोगती है. जब व्यक्ति ज्ञान, भक्ति और सत्कर्मों के माध्यम से आत्मिक उन्नति प्राप्त कर लेता है, तब उसे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है. मोक्ष मिलने पर आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाती है.

आत्मा को कैसे मिलती है मुक्ति? 

आत्मा की शांति और उसे पुनर्जन्म या मोक्ष की ओर ले जाने के लिए गरुड़ पुराण में कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं. अकाल मृत्यु प्राप्त व्यक्ति के परिवार वालों को गया या अन्य पवित्र तीर्थों पर विधि-विधान से पिंडदान करना चाहिए. इससे आत्मा को मुक्ति मिलती है. नारायण बलि पूजा, यह पूजा उन आत्माओं के लिए की जाती है जिनकी मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में हुई हो. यह पूजा आत्मा के मार्ग की बाधाओं को दूर करती है. मृत्यु के बाद 10 से 13 दिनों तक गुरुड़ पुराण का पाठ करने से न केवल मृतक की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि परिजनों को भी जीवन-मृत्यु के बाद 10 से 13 दिनों तक गुरुड़ पुराण का पाठ करने से न केवल मृतक की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि परिजनों को भी जीवन-मृत्यु का सही बोध होता है. वहीं भूखे को भोजन कराना, वस्त्र दान करना और जल की व्यवस्था करना आत्मा के सफर को शुभ बनाता है.  

श्राद्ध और पिंडदान का महत्व क्यों बताया गया है?

गरुड़ पुराण में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को विशेष महत्व दिया गया है. मान्यता है कि ये कर्म मृत आत्मा की शांति और उसकी आगे की यात्रा में सहायक होते हैं. इसी कारण हिंदू परिवारों में मृत्यु के बाद श्राद्ध और तर्पण की परंपरा सदियों से चली आ रही है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का यह एक महत्वपूर्ण माध्यम है.

क्या गरुड़ पुराण का उद्देश्य डर पैदा करना है?

कई लोग मानते हैं कि गरुड़ पुराण केवल मृत्यु और नरक की बात करता है, लेकिन वास्तव में इसका उद्देश्य लोगों को धर्म और नैतिकता का मार्ग दिखाना है. यह ग्रंथ बताता है कि मनुष्य को अपने जीवन में सत्य, दया, सेवा, संयम और सदाचार का पालन करना चाहिए. अच्छे कर्म न केवल वर्तमान जीवन को बेहतर बनाते हैं, बल्कि मृत्यु के बाद की यात्रा को भी सरल बनाने में सहायक माने गए हैं.

यमलोक में होता है कर्मों का मूल्यांकन

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत है. आत्मा शरीर छोड़ने के बाद अपने कर्मों के आधार पर विभिन्न अवस्थाओं से गुजरती है. यमलोक में कर्मों का मूल्यांकन होता है और उसी के अनुसार उसे फल तथा अगला जन्म प्राप्त होता है. नया शरीर कब मिलेगा, इसकी कोई निश्चित समय सीमा नहीं बताई गई है. यह पूरी तरह आत्मा के कर्मों और ईश्वरीय व्यवस्था पर निर्भर माना गया है. सनातन धर्म का संदेश स्पष्ट है कि मनुष्य को अपने जीवन में अच्छे कर्म, धर्म और भक्ति का पालन करना चाहिए, क्योंकि यही उसके वर्तमान और भविष्य दोनों को निर्धारित करते हैं. 

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