वट सावित्री व्रत सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। यह स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से छुड़ाया था।
पूजा विधान
वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए तथा बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं।
वट सावित्री व्रत कथा
मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया। सर्वगुण संपन्न देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप में जन्म लिया। कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया। सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसी दिन महर्षि नारद उनके यहां पधारे। नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहा कि महाराज द्युमत्सेन जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे हो गए हैं और अपनी पत्नी सहित वनों की खाक छानते फिर रहे हैं, उन्हीं के इकलौते पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है।
नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भूरि−भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया। उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परंतु सावित्री ने उत्तर दिया कि आर्य कन्या होने के नाते जब मैं सत्यवान का वरण कर चुकी हूं तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती।
सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारदजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकड़ी काटने जंगल के लिए चला तो सास−श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी। सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया। देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्माजी के विधान की रूपरेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये। 'कहीं−कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डंस लिया था।' सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे−पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी। यही धर्म है, यही मर्यादा है।
सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले कि पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो। सावित्री ने यमराज से सास−श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए। सावित्री यमराज का पीछा करती रही। यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली कि पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा। इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की। तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये। सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही। इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां किस प्रकार बन सकती हूं। अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।
सावित्री की धर्मिनष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा। प्रसन्नचित सावित्री अपने सास−श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया। आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार चारों दिशाएं सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं।
- शुभा दुबे
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आज वट सावित्री व्रत है, हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह त्योहार पति की लंबी आयु, और अच्छी सेहत एवं वैवाहिक जीवन में सुख-शांति का प्रतीक है तो आइए हम आपको वट सावित्री व्रत का महत्व और पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें वट सावित्री व्रत के बारे में
सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। इस साल ज्येष्ठ अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है, इसलिए उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में इसी दिन वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। व्रत के दौरान महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर परिक्रमा लगाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और बुद्धिमानी से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यही कारण है कि इस व्रत को पति की लंबी आयु और अटूट दांपत्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
वट सावित्री व्रत का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस बार अमावस्या तिथि 16 मई 2026, शनिवार के दिन सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो जाएगी। जबकि, अमावस्या तिथि का समापन 16 मई की देर रात 01 बजकर 31 मिनट पर होगा। वट सावित्री व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद वट वृक्ष की पूजा करना शुभ माना जाता है।
इसलिए खास है यह वट सावित्री व्रत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता सावित्री ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज को उनके पति सत्यवान के प्राण लौटाने पर मजबूर कर दिया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यमदेव ने बरगद (वट) के पेड़ के नीचे ही सत्यवान को पुनर्जीवन दिया था। इसीलिए इस दिन पर विशेष तौर से वट वृक्ष की पूजा को साक्षात ईश्वर की आराधना माना जाता है।
वट सावित्री व्रत में जरूर अर्पित करें ये चीजें
पंडितों के अनुसार वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा के दौरान सूती वस्त्र, लाल फूल, सिंदूर, कच्चा सूत, अक्षत (अटूट चावल), जनेऊ, चंदन और पान-सुपारी अर्पित करने चाहिए। इसके बाद पेड़ के पास घी का दीपक जलाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार, पेड़ के चारों ओर 7 या 108 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत या मौली (लाल/पीला धागा) लपेटें। ऐसा करने से वैवाहिक संबंध मजबूत होते हैं।
वट सावित्री व्रत में माता सावित्री को अर्पित करें शृंगार
शास्त्रों के अनुसार व्रत के दौरान केवल पेड़ की ही नहीं, बल्कि माता सावित्री की भी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। माता को सिंदूर, कुमकुम, मेहंदी, चूड़ियां और बिंदी जैसी शृंगार की सामग्री जरूर चढ़ाएं। मान्यता है कि माता सावित्री को सुहाग का सामान चढ़ाने से व्रती महिला को 'अखंड सौभाग्य' का आशीर्वाद मिलता है।
वट सावित्री व्रत है महिलाओं के लिए खास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट अमावस्या का व्रत बहुत प्रभावी माना जाता है जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु एवं सभी प्रकार की सुख-समृद्धियों की कामना करती हैं। इस दिन स्त्रियां व्रत रखकर वट वृक्ष के पास पहुंचकर धूप-दीप नैवेद्य से पूजा करती हैं तथा रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं। साथ ही हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा लेती हैं। जिससे पति के जीवन में आने वाली अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि के साथ लंबी उम्र प्राप्त होती है। वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति व्रत की प्रभाव से मृत पड़े सत्यवान को पुनः जीवित किया था। तभी से इस व्रत को वट सावित्री नाम से ही जाना जाता है। इसमें वटवृक्ष की श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा की जाती है। महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं। सौभाग्यवती महिलाएं श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक उपवास रखती हैं।
वट सावित्री व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास माना जाता है। इसे अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और माता सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन जरूरतमंदों लोगों को कपड़े, भोजन और अन्य जरूरी वस्तुओं का दान करना अत्यंत शुभ फल देने वाला माना जाता है।
वट सावित्री व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार एक समय मद्र देश में अश्वपति नाम का राजा राज करता था। वह अत्यंत ही दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन उसके कोई संतान न थी। जिसके बाद उसके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम उसने सावित्री रखा। जब सावित्री बड़ी हुई तो उसने विवाह के लिए सत्यवान नाम के नवयुवक को चुना। जब यह बात देवर्षि नारद को जब यह बात पता चली तो उन्होंने सावित्री के पिता अश्वपति को बताया कि जिस सत्यवान् से सावित्री विवाह करने जा रही है, उसकी आयु बहुत कम है, ऐसे में उसे कोई दूसरा वर चुनना चाहिए। नारद मुनि से यह बात पता चलते ही राजा अश्वपति ने सावित्री को बहुत समझाने का प्रयास किया, लेकिन सावित्री ने यह तर्क देते हुए अपनी बात पर अड़ी रही कि हिन्दू स्त्रियां वर के रूप में केवल एक ही बार किसी पुरुष को चुनती हैं. इसके बाद राजा अश्वपति ने ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया।
सत्यवान के पिता का नाम द्युमत्सेन था, जिनका राजपाट छिन चुका था. सत्यवान के माता और पिता दोनों की दृष्टि भी जा चुकी थी और वे वन में रहा करते थे। विवाह के बाद सावित्री भी अपने पति के सत्यवान के साथ उसी वन में रहकर अपने पति के साथ सास-ससुर की सेवा करने लगी। कुछ दिनों बाद नारद मुनि सावित्री के पास आए और उसे बताया कि अब सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया है। जब यह बात सावित्री को पता चली तो उसने अपने पति की लंबी आयु की प्राप्ति के लिए उपवास करना प्रारंभ कर दिया। सत्यवान उस दिन जब जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाने लगा तो सावित्र भी उसके साथ गई। जंगल में सत्यवान जब लकड़ी काट रहा था तो उसके सिर में अचानक से बहुत ज्यादा पीड़ा होने लगी औ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। सावित्री ने अचानक देखा कि वहां पर यम देवता अपने दूतों के साथ आ पहुंचे हैं। इसके बाद जब यमराज सत्यवान के प्राण हर ने के बाद दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। सावित्री को पीछे आता देख यमराज ने कहा कि हे पतिव्रता नारी! जहां तक तमु अपने पति का साथ दे सकती थी तुमने दिया, अब तुम वापस लौट जाओ। तब सावित्री ने कहा कि "जहां मेरे पति रहेंगे, मुझे भी उनके साथ वहीं रहना है. यही मेरा पति के प्रति धर्म है।
सावित्री की बात को सुनकर यमराज प्रसन्न हो गये और उन्होंने उससे वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौटाने को कहा। यमराज ने तथास्तु कहते हुए सावित्री को लौट जाने को कहा, लेकिन फिर सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती रही। सावित्री की पतिव्रता को देखते हुए एक बार फिर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर से खोया हुआ राज्य वापस मांगा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मनोकामना भी पूरी कर दी, लेकिन सावित्री फिर भी यम देवता के पीछे-पीछे चलती रही। सावित्री के द्वारा पतिव्रत धर्म को निभाता देख एक बार फिर यमराज ने सावित्री से वर मांगने को कहा, तब उसने बोला मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। यमराज ने सावित्री के पतिव्रता को देखते हुए यह वरदान भी दिया और सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिये। इस प्रकार सावित्री ने न सिर्फ अपने पति के प्राण बल्कि अपने सास-ससुर की दृष्टि और राज्य को भी वापस दिलवा दिया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस वट सावित्री की इस पावन कथा को कहने या सुनने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।
वट सावित्री पर भूल कर न करें ये काम
पंडितों के अनुसार पूजा के बाद बरगद के फल या कोपल (नई पत्ती) को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा जरूर पढ़ें या सुनें, तभी आपका व्रत पूर्ण माना जाता है। चूंकि इस बार यह व्रत शनिवार के दिन पड़ रहा है, जो कि शनिदेव का दिन है, इसलिए इस दिन शनिदेव की पूजा से भी आपको अद्भुत लाभ देखने को मिल सकते हैं।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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