मध्य प्रदेश: उमंग सिंघार ने रहस्यमयी बीमारी से प्रभावित गांवों का दौरा किया, 19 बच्चों की मौत का आरोप लगाया
बालाघाट/भोपाल, 14 अगस्त (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता (एलओपी) और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उमंग सिंघार ने शुक्रवार को बालाघाट जिले के बैगा आदिवासी बहुल गांवों का दौरा किया। यह दौरा बच्चों में फैली एक रहस्यमयी बीमारी की खबरों के बीच किया गया और उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभावित इलाकों में 19 बच्चों की मौत हो चुकी है।
सिंघार ने कुंडेकासा, बोंडारी और कोरका गांवों का दौरा किया, इलाज करा रहे बीमार बच्चों से मुलाकात की और उनके परिवारों से बातचीत की।
उन्होंने उन्हें मिल रहे इलाज और स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में भी जानकारी ली।
कांग्रेस नेताओं का दावा है कि पिछले ढाई महीनों में प्रभावित गांवों में 19 बच्चों की मौत हुई है।
हालांकि, जिला स्वास्थ्य विभाग ने अब तक आठ मौतों की पुष्टि की है। सिंघार ने प्रभावित गांवों के सभी निवासियों, विशेषकर बच्चों की तत्काल स्वास्थ्य जांच, मुफ्त इलाज, उचित पोषण और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को प्रभावित गांवों में प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर बच्चों की तत्काल जांच करनी चाहिए और मुफ्त इलाज, उचित पोषण, और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना चाहिए।
उन्होंने मौतों की निष्पक्ष जांच की भी मांग की और जिन परिवारों ने अपने बच्चे खो दिए हैं, उनके लिए आर्थिक सहायता की अपील की।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार वास्तविक संख्या छिपाने की कोशिश कर रही है।
सिंघार ने कहा कि आज मुख्यमंत्री (मोहन यादव) तिरंगा यात्रा निकाल रहे हैं, लेकिन उनके पास इन आदिवासी परिवारों के आंसू पोंछने और मासूम बच्चों की जान बचाने का समय नहीं है।
यह दौरा ऐसे समय हुआ जब स्वास्थ्य अधिकारियों ने प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ा दी थी।
सिविल सर्जन निलय जैन ने बताया कि बालाघाट जिला अस्पताल में अभी 39 बच्चे भर्ती हैं, जिनमें से 27 बच्चे वार्ड में और 12 आईसीयू में हैं।
आईसीयू में भर्ती कुछ मरीजों की हालत गंभीर है। अधिकारियों के मुताबिक, 13 अगस्त की रात को 23 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
बीमारी की असल वजह का अभी तक पता नहीं चल पाया है। स्थानीय लोगों ने दूषित पीने के पानी और कुपोषण को लेकर चिंता जताई है, लेकिन अधिकारियों ने बीमारी या मौतों की वजह के तौर पर इनकी पुष्टि नहीं की है।
बालाघाट कलेक्टर कुमार सत्यम ने घुम्मर, कुंडेकासा, कोरका, बोंडारी, मछुरदा, धर्मशाला और गढ़िता गांवों का दौरा किया और स्वास्थ्य टीमों की ओर से किए जा रहे घर-घर जाकर स्वास्थ्य सर्वे और स्क्रीनिंग का जायजा लिया।
उन्होंने पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट को हॉस्टल के पानी की टंकियों की नियमित सफाई करने, हैंड पंप के आस-पास साफ-सफाई बनाए रखने और पीने के पानी में क्लोरीन मिलाने (क्लोरीनेशन) को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
--आईएएनएस
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Independence Day Special: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर देखें बॉलीवुड की ये 5 अंडररेटेड फिल्में, जगा देंगी आप में देशभक्ति का जुनून
Independence Day Special: भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है. 15 अगस्त सिर्फ तिरंगा फहराने और देशभक्ति के गीत सुनने या गुन-गुनाने का दिन नहीं है बल्कि यह उन सच्ची देशभक्ति की कहानी को याद करने का मौका भी है, जिन्होंने देश को आजादी दिलाने में अहम रोल निभाया. बॉलीवुड में देशभक्ति और आजादी को लेकर कई शानदार फिल्में बनाई गई हैं. इनमें कुछ फिल्मों को जबरदस्त पॉपुलैरिटी मिली, तो कुछ को उतना अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला. जिसकी वे हकदार थीं. ऐसी ही पांच फिल्में हैं, जिन्हें आज भी बेहतरीन लेकिन अंडररेटेड फिल्मों में गिना जाता है.
मनोज बाजपेयी की '1971'
मनोज बाजपेयी की फिल्म 1971 उन छह भारतीय युद्धबंदियों की स्टोरी कहानी पर बेस्ड है जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान की जेलों में कैद होते हैं. इन सैनिकों का सबसे बड़ा लक्ष्य अपन वतन की वापसी का होता है कि कैसे वह सहीसलामत अपने भारत देश लौट सकें. फिल्म इसी कोशिश और जेल से भागने की उनके प्लान को बेहत सीरियर तरीके से दिखाती है.
1971 फिल्म की सबसे खास बात इसकी कहानी और कलाकारों की एक्टिंग है. मनोज बाजपेयी के साथ कुमुद मिश्रा, रवि किशन और दीपक डोबरियाल अहम स्टार कहानी को और प्रभावशाली बनाया. इसमें सिर्फ देशभक्ति बड़े-बड़े डायलॉग नहीं बल्कि सैनिकों की बेचैनी और अपने देश लौटने की जिद भी दिखाई देती है. इस फिल्म को रिलीज के समय फिल्म को उतनी कामयाबी नहीं मिली, लेकिन आज इसे मनोज बाजपेयी की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो
श्याम बेनेगल की यह फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लाइफ और देश की आजादी में उनके योगदान को दिखाती है. इसमें उनकी लाइफ के उस दौर को दिखाया गया है, जब वह भारत से बाहर जर्मनी और जापान पहुंचे और आजाद हिंद फौज बनाई. इसमें एक्टर सचिन खेडेकर ने नेताजी का बेहतरीन किरदार निभाया था, जबकि कुलभूषण खरबंदा और दिव्या दत्ता भी अहम किरादार में नजर आए. फिल्म की खास बात यह है कि यह सुभाष चंद्र की लाइफ को सिर्फ रोमांचक तरीके नहीं दिखाया बल्कि इतिहास के जरूरी मुद्दों को बेहतरीन अंदाज में पेश किया गया. फिल्म सभी घटनाओं और संघर्ष को गंभीरता से सामने रखती है. ए.आर. रहमान का म्यूजिक इसकी कहानी के असर को और बढ़ाता है. अपनी लंबी ड्यूरेशन की वजह से शायद यह ज्यादा लोगों के बीच पॉपुलैरिटी नहीं बना सकी. लेकिन इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले इसे एक अच्छी फिल्म मानते हैं. आप स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस फिल्म को देख सकते हैं.
चित्तागोंग: जब स्कूल के बच्चों ने दी थी अंग्रेजों को चुनौती
आजादी की लड़ाई की बात होती है तो महात्मा गांधी, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुष का सबसे पहले जिक्र होता है. लेकिन आजादी की लड़ाई की कहानी इससे कहीं बड़ी थी. 2012 में आई चित्तागोंग इसी कहानी को सामने रखती है. फिल्म 1930 के चटगांव शस्त्रागार छापे की घटना पर बेस्ड है, जिसमें मास्टर दा सूर्य सेन की लीडरशिप में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी थी. खास बात यह थी कि इस आंदोलन में कई युवा और स्कूल के बच्चे भी शामिल हुए थे. फिल्म में मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव और जयदीप अहलावत जैसे बेहतरीन कलाकार नजर आए. इसके बावजूद फिल्म को बॉक्स ऑफिस ज्यादा सक्सेस नहीं मिल सकी. ऐसे में आप इस फिल्म को देखकर देशभक्ति को जुनून का आभास कर सकते हैं.
शौर्य
देशभक्ति की फिल्म का मतलब हमेशा सीमा पर बंदूक चलाने वाले सैनिकों से नहीं होता है. 2008 की शौर्य ने इसी सोच को अलग तरीके से पेश किया. यह फिल्म जम्मू-कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित एक कोर्ट-मार्शल की कहानी को दिखाती है. केके मेनन, राहुल बोस, जावेद जाफरी और मिनिषा लांबा जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म में ड्यूटी, मजहब, कानून और देशभक्ति जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है. इसमें केके मेनन का ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह का किरदार लोगों ने सबसे ज्यादा पसंद किया था. फिल्म की कहानी सीरियस है और शायद यही वजह रही कि इसे उस तरह की सक्सेस नहीं मिल सकी, जैसी आज कल की बड़े स्टार वाली फिल्मों को मिलती है. लेकिन आज भी इसकी स्टोरी और केके मेनन के डायलॉग लोगों को याद हैं.
'प्रहार' में दिखाया गया देशभक्ति को अलग अंदाज में
1991 में आई प्रहार: द फाइनल अटैक को नाना पाटेकर के करियर की यादगार फिल्मों में गिना जाता है. इसमें उन्होंने मेजर चौहान का बेहतरीन किरदार निभाया था, जो एक सख्त कमांडो ट्रेनर होते हैं. फिल्म की कहानी सबसे अहम मोड़ तब आता है जब उनके एक बहादुर कैडेट की हत्या हो जाती है. इसके बाद मेजर चौहान भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं. जिसका मैसेज साफ होता है कि देश की रक्षा सिर्फ सीमा पर दुश्मन से लड़ने तक नहीं होती है बल्कि देश के अंदर मौजूद क्राइम और करप्शन के खिलाफ खड़ा होना भी एक तरह की जिम्मेदारी है. बताया जाता है कि नाना पाटेकर ने इस किरदार को निभाने के लिए सैन्य प्रशिक्षण भी लिया था. इसमें माधुरी दीक्षित, डिंपल कपाड़िया और गौतम जोगलेकर का भी अहम किरादर देखने मिला.
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